पारंपरिक श्रद्धा व आस्था के साथ असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक दशहरा हुआ संपन्न

पारंपरिक श्रद्धा व आस्था के साथ असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक दशहरा हुआ संपन्न

विभिन्न स्थानों पर हवन-पूजन एवं कन्या भोज का आयोजन कर की गई सर्व समाज के कल्याण की कामना

कमल सिंह सेंगर, ब्यूरो,
सीतापुर (उ.प्र.) : सीतापुर जिले भर में विभिन्न स्थानों पर हवन-पूजन व कन्या भोज के साथ असत्य पर सत्य व अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक दशहरा व दुर्गा पूजा जिले भर में पारंपरिक श्रद्धा व आस्था के साथ संपन्न हुआ। महानवमी के दिन श्रद्धालुओं की ओर से हवन-पूजन व कन्या भोज व विभिन्न स्थानों पर विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। नैमिषारण्य स्थित शक्ति पीठ मां ललिता देवी के दर्शन-पूजन हेतु भक्तों की काफी भीड़ उमड़ी।
इसी क्रम में के जवाहरपुर स्थित डालमिया चीनी मिल कॉलोनी परिसर में श्री दुर्गा सप्तशती पाठ के समापन पर महा नवमी को विशेष रुप से हवन-पूजन कर सर्व समाज के कल्याण की कामना की गई। चीनी मिल के वरिष्ठ महाप्रबंधक आगा आसिफ बेग, जीएम जीबी यादव, सुधीर वर्मा, मनीष कुमार द्विवेदी, मनीष जैन, विद्याचरण शुक्ल, आशीष बंसल, कपिल सिंह चौहान, मनोज त्रिपाठी, अजय तिवारी, आरसी मौर्य, आरके सचान, आरके जायसवाल, संजय सिंह, एसपी सिंह, मनोज मिश्राआदि ने महानवमी की अधिष्ठात्री देवी सिद्धिदात्री की हवन-पूजन कर सर्व समाज के कल्याण की कामना किया। अष्टमी से नवमी तक कन्याभोज जारी रहा है। क्योंकि नवरात्रि व्रत अनुष्ठान का समापन कन्या भोज के साथ होता है। कन्याओं को साक्षात देवी मानकर नवरात्रि में उनकी पूजा देवी मानकर करने की पुरानी परम्परा है। नवरात्रि में शक्ति की पूजा की जाती है। बिना शक्ति के कोई बड़ा कार्य नहीं किया जा सकता है। साल में दो बार नवरात्रि आती है। एक को शारदीय और दूसरे को चैत्रीय नवरात्रि कहते हैं। नवरात्रि के महत्व एवं महिमा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि चैत्रीय नवरात्रि के अंतिम दिन नवमी को भगवान विष्णु का अयोध्या में राम के रूप में अवतरण हुआ। और शारदीय नवरात्रि समापन के दूसरे दिन उन्हें अवतरण का लक्ष्य मिला। दशमी को भगवान राम रावण का वध करके युद्ध समाप्त कर दिया था। ईश्वर ने जन्म और जीवन लक्ष्य दोनों नौ दिनों तक शक्ति की आराधना करने के बाद प्राप्त किया। जिस शक्ति के बिना भगवान भी अधूरे रहते हैं। उस महाशक्ति को हम नमन वंदन अभिनन्दन कर उनके चरणों में विश्व, देश, गाँव व परिवार की सुख शान्ति के लिये गुहार लगाते हैं। जगत जननी मां दुर्गा भवानी के नवस्वरूपों का प्राकट्य देवहित व धर्महित में पहली बार तब हुआ था। जब भगवान विष्णु के कान की मैल से मधु कैटभ नामक दो महाबली दानव निकले और ब्रह्मा जी को मारने के लिए उन्हें दौड़ाया था। उस बुरे वक्त में विष्णु भगवान भी सो रहे थे। इसलिए उन्हें जगाने के लिए उन्हें उनकी महाशक्ति योगमाया की प्रार्थना करनी पड़ी थी। इसके बाद दूसरी बार जगत जननी का प्रादुर्भाव तब हुआ जब महिषासुर जैसे निशाचर देवताओं को स्वर्ग से खदेड़ कर खुद स्वर्ग के राजा बन गया। और शक्ति के घमंड में महाशक्ति को भूलकर उनसे शादी करने के लिये बाध्य करने लगा। देवताओं के तमाम अनुनय विनय करने पर एक महातेज पुंज देवी के रूप में प्रकट हुई। जिसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश व देवेन्द्र ने वस्त्र, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र प्रदान किया। वह महापुंज ही महाशक्ति जगत जननी मां दुर्गा भवानी थी। इसी तरह एक बार शुम्भ निशुम्भ नामक निशाचरों ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। तब देवताओं ने हिमालय पर जाकर महाशक्ति का आवाह्वान किया था। उस समय शिवप्रिया माता पार्वती गंगा स्नान करने आई थी। देवताओं की चीख पुकार सुनकर उनके शरीर से शिवाशक्ति देवी के रूप में प्रकट हुई। हिमालय पर ही शिवादेवी जिन्हें कौशिकी भी कहते हैं, वह विराजमान हो गई। शुम्भ निशुम्भ के दूतों ने जब महाशक्ति को देखा। तो इसकी जानकारी उनको दी और महातारीफ करते हुये उससे शादी करने की सलाह देना लगे। मदान्ध निशाचरराज दोनों भाईयों ने चंड मुंड नामक उन्हीं दूतों को देवी के पास शादी करने के लिये राजी करके लाने और न आने पर पर जबदस्ती घसीटते हुए लाने भेजा। मायावी शक्तिशाली निशाचरों से अकेले निपटना आसान नहीं था। इसीलिए मां को अपने विभिन्न स्वरूप धारण करने पड़े। निशाचरों से संहार के बाद महाशक्ति जगत जननी दुर्गा भवानी ने देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर वचन दिया था। कि जब भी वह लोग भी याद करेंगें तब तब आऊँगी तथा अपने आने के कुछ अलग अलग अपने नामों के साथ बताये थे।

आज दुनिया शुम्भ निशुम्भ व महिषासुरों से परेशान है। हम महामाया महाशक्ति आदिशक्ति जगत जननी माँ दुर्गा से पुनः अवतरित होकर आतंकी रूपी निशाचरों का सर्वनाश करने की विनती करते हैं।नवरात्रि महाशक्ति को प्रसन्न करके मनोकामना पूरी करने का सुनहरा अवसर होता है। हम अपने सुधीजन पाठकों को महानवमी व विजयादशमी की शुभकामना व सभी के लिये मंगल की कामना करते हैं।
* कमल सिंह सेंगर,
सीतापुर (उ. प्र.)

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