भाजपा की सारी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का केंद्र बंगाल है-अभय कुमार दुबे

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

अगर सब कुछ भाजपा और उसकी सरकार की योजना के मुताबिक हुआ तो 2 मई की तारीख मोदी सरकार के लिए कई उलझनों का हल साबित हो सकती है। शर्त यह है कि इस दिन आने वाले चुनाव नतीजों में भाजपा एक बार फिर असम में सरकार बनाती हुई दिखे, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को पराजित करके कमाल का नतीजा निकाले, पुडुचेरी में उसका गठजोड़ ही शपथ ले, तमिलनाडु में उसके गठजोड़ पार्टनर को सत्ता मिले और केरल की विधानसभा में उसकी मौजूदगी पहले से बेहतर हो जाए।

लेकिन, क्या ऐसा हो सकता है? भले ही दक्षिण भारत में उनकी उम्मीदें पूरी न हों, भाजपा के रणनीतिकार इतना तो कम से कम चाहेंगे ही कि असम में उसकी वापसी हो और बंगाल में कमल का परचम लहराए। लेकिन, अगर असम और बंगाल में से चुनाव करने के लिए कहा जाए, तो भाजपा असम में अपने नुकसान की कीमत पर भी बंगाल का चुनाव जीतना पसंद करेगी। अर्थात, भाजपा की सारी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का केंद्र बंगाल है।

केवल एक बार जीते जा चुके असम को जीतने से कुछ नहीं होने वाला। दरअसल, इस समय भाजपा के सभी मर्जों की वैक्सीन बंगाल के चुनाव की जीत में निहित है। इसलिए उसने सारे संसाधन, सारे नेता, सारी रणनीतियां और सारी युक्तियां बंगाल में ही झोंकी हुई हैं।

इसका मुख्य कारण यह है कि मोदी सरकार इस समय जिस तरह के चौतरफा संकट में घिरी हुई है, उससे केवल एक जबरदस्त चुनावी जीत ही निकाल सकती है। यह ठीक वैसी ही स्थिति है जैसी मोदी के पहले कार्यकाल में 2015 में पैदा हुई थी। दिल्ली और बिहार के चुनाव में अपमानजनक पराजय के बाद परामर्शदाता मंडल के ठंडे बस्ते में बड़े बुजुर्ग नेता भी आवाज उठाने लगे थे। उनकी खतो-किताबत से पार्टी में भगदड़ मच गई थी। किसी तरह से उस संकट का प्रबंधन किया गया। लेकिन साख गिरने का डर सिर पर मंडराता रहा। फिर आया 2017 और उत्तरप्रदेश में लगभग दो दशक बाद भाजपा ने असाधारण सवा तीन सौ सीटें जीतकर संकट से छुटकारा प्राप्त कर लिया। मोदी ने इसके बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

एक तरह से आज का संकट 2015 से भी बड़ा है। किसानों ने दिल्ली में ऐतिहासिक घेरा डाला हुआ है। पिछले तीन महीनों से प्रतिदिन मोदी सरकार के दबदबे को खुली चुनौती मिल रही है। धीरे-धीरे आर्थिक मांगों पर शुरू हुआ आंदोलन भाजपा विरोधी सामाजिक गोलबंदी में बदलता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों को अगर सही मानें तो GDP केवल दशमलव चार प्रतिशत ही है। राजस्व की आमदनी रसातल में है, इसलिए पेट्रोल, डीजल, गैस और रेलवे टिकटों के जरिये जनता की जेब से रुपया खींचा जा रहा है। इसकी सीमा क्या है, यह अभी तक सरकार तय नहीं कर पाई है।

भाजपा उप्र चुनाव जीतेगी, इसकी कोई गारंटी नहीं थी। ठीक उसी तरह बंगाल चुनाव जीतने की भी कोई गारंटी नहीं है। एक तरह से यह ज्यादा मुश्किल है। चुनौतियां तीन तरह की हैं। पहली, भाजपा को अपना लोकसभा का प्रदर्शन विधानसभा में दोहराने की गारंटी करनी होगी। मुश्किल यह है कि प्रदेशों में भाजपा के वोट लोकसभा के मुकाबले 10-12% गिर जाते हैं।

उत्तर प्रदेश ही इस नियम का अपवाद है। क्या दूसरा अपवाद पश्चिम बंगाल बनेगा? दूसरी, कांग्रेस और माकपा के गठजोड़ को चुनावी लड़ाई तीन तरफा बनाने से रोकना होगा। अगर ऐसा न हुआ तो ममता बनर्जी को तीसरी बार शपथ लेने से भाजपा नहीं रोक पाएगी। तीसरी, किसी तरह ममता के बराबर मुख्यमंत्री का चेहरा न होने कमी की भरपाई करनी होगी। दिक्कत यह है कि स्वयं भाजपा भी नहीं जानती कि ऐसा वह कैसे कर पाएगी।

 

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