पहाड़ का सीना चीरने वाले दशरथ मांझी.

 पहाड़ का सीना चीरने वाले दशरथ मांझी.

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

पुण्यतिथि पर विशेष

स्वर्ग से धरती पर गंगा लाने वाले तपस्वी राजा भगीरथ को कौन नहीं जानता. उनके प्रयासों के कारण ही भारत के लोग लाखों साल से मां गंगा में स्नान, पूजन और आचमन से पवित्र हो रहे हैं. आज भी यदि कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से लगातार किसी सद् संकल्प को लेकर काम करता रहे, तो उसे भगीरथ ही कहते हैं. ऐसे ही एक आधुनिक भगीरथ थे, दशरथ मांझी. जिन्होंने संकल्प शक्ति से पहाड़ का सीना चीर डाला.

दशरथ मांझी का जन्म कब हुआ, यह तो पुख्ता रूप से पता नहीं, पर वे बिहार के गया प्रखण्ड स्थित गहलौर घाटी में रहते थे. उनके गांव अतरी और शहर के बीच में एक पहाड़ था, जिसे पार करने के लिए 20 किमी का चक्कर लगाना पड़ता था. वर्ष 1960 में दशरथ मांझी की पत्नी फगुनी देवी गर्भावस्था में पशुओं के लिए पहाड़ से घास काट रही थी कि उसका पैर फिसल गया. दशरथ उसे लेकर शहर के अस्पताल गया, पर दूरी के कारण वह समय पर नहीं पहुंच सके, जिससे पत्नी की मृत्यु हो गयी.

बात दशरथ के मन को लग गयी. उन्होंने निश्चय किया कि जिस पहाड़ के कारण मेरी पत्नी की मृत्यु हुई है, मैं उसे काटकर उसके बीच से रास्ता बनाऊंगा, जिससे भविष्य में किसी अन्य बीमार को अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत्यु का ग्रास न बनना पड़े. उसके बाद सुबह होते ही दशरथ औजार लेकर जुट जाते और पहाड़ तोड़ना शुरू कर देते. सुबह से दोपहर होती और फिर शाम, पर दशरथ पसीना बहाता रहता. अंधेरा होने पर ही वे घर लौटते. लोग समझे कि पत्नी की मृत्यु से इनके मन-मस्तिष्क पर चोट लगी है. उन्होंने कई बार दशरथ को समझाना चाहा, पर दशरथ के संकल्प को शिथिल नहीं कर सके.

अन्ततः 22 साल के लगातार परिश्रम के बाद पहाड़ ने हार मान ली. दशरथ की छेनी, हथौड़ी के आगे वर्ष 1982 में पहाड़ ने घुटने टेक दिये और रास्ता दे दिया. यद्यपि तब तक दशरथ मांझी का यौवन बीत चुका था, पर 20 किमी की बजाय अब केवल एक किमी की पगडण्डी से शहर पहुंचना संभव हो गया. तब मजाक उड़ाने वाले लोगों को उनके दृढ़ संकल्प के आगे नतमस्तक होना पड़ा. अब लोग उन्हें ‘साधु बाबा’ के नाम से बुलाने लगे. दशरथ बाबा इसके बाद भी शान्त नहीं बैठे. अब उनकी इच्छा थी कि यह रास्ता पक्का हो जाये, जिससे पैदल की बजाय लोग वाहनों से इस पर चल सकें. इससे श्रम और समय की भारी बचत हो सकती थी, पर इसके लिए उन्हें शासन और प्रशासन की जटिलताओं से लड़ना पड़ा. वे एक बार गया से पैदल दिल्ली भी गये, पर सड़क पक्की नहीं हुई. उनके नाम की चर्चा पटना में सत्ता के गलियारों तक पहुंच तो गयी, पर निष्कर्ष कुछ नहीं निकला.

इन्हीं सब समस्याओं से लड़ते हुए दशरथ बाबा बीमार पड़ गये. क्षेत्र में उनके सम्मान को देखते हुए राज्य प्रशासन ने उन्हें दिल्ली के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया, जहां 17 अगस्त, 2007 को उन्होंने अन्तिम सांस ली. देहांत के बाद उनका पार्थिव शरीर गांव लाया गया. गया रेलवे स्टेशन पर बिहार के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. उनकी कर्मभूमि गहलौर घाटी में ही पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें भू समाधि दी गयी. राज्य शासन ने ‘पद्मश्री’ के लिए भी उनके नाम की अनुशंसा की. दशरथ मांझी की मृत्यु के बाद बिहार के बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में एक पाठ जोड़ा गया है. उसका शीर्षक है – पहाड़ से ऊंचा आदमी. यह बात दूसरी है कि पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाने वाले इस आधुनिक भगीरथ के संकल्प का मूल्य उनके जीवित रहते प्रशासन नहीं समझा.

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