हरिहर क्षेत्र में मेले की शानदार तवारीख पर कोरोना का दागदार हनक में बेनूर है, सोनपुर

हरिहर क्षेत्र में मेले की शानदार तवारीख पर कोरोना का दागदार हनक में बेनूर है, सोनपुर
# बोझिल हो रही पहचान में सिर्फ गंडक – गंगा स्नान तक सीमित

श्रीनारद मीडिया‚ राणा परमार अखिलेश‚ छपरा (बिहार)

 

” गर्दिश में जमाना रहता है ।
दिन-रात बदलते रहते हैं ।”

लिहाजा, इंसानियत के दिमाग़ी खुराफात से जाहिर कोविड 19 ने खुबसूरत हरिहर क्षेत्र मेले की सूरत को ही बदसूरत बना दी। बहरहाल, शानदार जानदार खुबसूरत तवारीख पर स्याह साया इस साल कोरोना के दागदार हनक ने दाग गहरे कर दिया ।

कब शुरू हुआ हरिहर क्षेत्र मेला:     गो कि सोनपुर मेले का आगाज द्वापर युग से माना जाता है और राजा हर्षवर्धन के जमाने तक मेला अपने सबाब पर था। गुप्त काल,मौर्य काल , शुंग काल, राजपूत काल से लेकर तुर्क अफगान काल तक मेला संस्कृति किसी तरह कायम रही।भक्त नाभादास को हृदय राम को लिखे पद्यात्मक पत्रानुसार सोनपुर मेला संवत 1626में लगा था। बांग्ला-पत्रिका ‘ कुमुदी’ के 21 दिसंबर 1822 में प्रकाशित समाचार के अनुसार सोनपुर मेले का आगाज 1822 में हुआ था । उन दिनों कोनहरा घाट, दीघा, हथिसार, जौहरी बाजार यूसुफपुर व मीना बाजार वर्तमान हाजीपुर तक लगता था। 1830 में यह मेला हाजीपुर की बजाए सोनपुर में लगने लगा और लार्ड डलहौजी ने इसकी तरक्की पर पूरी नजर रखा। पहली जंगे-आजादी की तैयारी में देशी राजाओं, नरेशों, नवाबो, ताल्लुकेदारों, जमींदारों की पोशिदा मीटिंग को देखते हुए इस्ट इंडिया कंपनी बहादुर ने जगह बदल दी।

 

यार्कशायर,बकिंघम व तिब्बत के मिलते थे, कपड़े व सामान: एस विलियम ने मेले की खूबसूरती का वर्णन करते हुए लिखा है ” मेले की छोटी मगर, सजी-धजी दुकानों में मैनचेस्टर, बकिंघम, यार्कशायर,तिब्बत, भूटान, अफगानिस्तान वगैरह मुल्कों के कपड़े व सामान यहाँ 1852 तक आते थे। भागलपुरी रेशम, सहारनपुरी लकड़ी पर नक्काशी सामान,जयपुरी पत्थर के सामान, कश्मीरी पसमीना शाॅल, लुधियाना का कंबल , कानपुरी खादी व फर्नीचर 1980 तक आते थे।2019 तक तो नहीं आए थे।

एशिया का मशहूर पशुमेला   :   हरियाणावी बैल व गाय, जूनागढ़ी गाय, भदावरी भैस, सरयूपारी गाय, बकरी, अरबी,ईरानी सिंधी,पंजाबी बलहोतरा, सिंधबाज, खगड़ा भूटिया घोड़े, खच्चर, गदहे, पहाड़ी तोंते, मैना,हंस, बतख, बाज, मोर, बंदर, लंगूर,खरगोश, बिलायती चूहे,उड़नबाज कबूतर, तितर , बटेर ,बुलडाॅग, डोबरमैन,जर्मन शेफर्ड, भुटिया कुत्ता, पामेलियन डाॅग आदि मेले की खूबसूरती बढ़ाते थे, कर्नाटक, केरल, असम के हाथी आदि की खरीद बिक्री का गजब नजारा था।

 

सूबे व मुल्कों की तहजीब व होते थे तमद्दून काबिले-    नुमाईश एशिया के मशहूर पशुमेला में हर सूबे का तहजीब व तमद्दून काबिले-नुमाईश होते थे। राजाओं नवाबों व अंग्रेजी सल्तनत के हुकमराने के शाही तंबू से लेकर आम अवाम की खातिर कथकली, कुच्चीपुरी, असमिया, बांग्ला, पहाड़ी लोकगीतों नृत्यों नाच, नकल नौटंकी, बिरहा गायकी जैसे हर फन के फनाकार, अदाकारों की अदाकारों नुमाईशी की यादगारें सालों रहती थी। माडर्न ब्रेक डांस व कैबरे डांस पर सरकारी रोक तो लगी मगर , कुछ हद तक ही। 1983 में वगलगर व अश्लील प्रदर्शन पर तत्कालीन एसपी डीएन गौतम ने रोक लगा दिया था। फिर भी थिएटर कंपनियों का प्रोग्राम चलता रहा। इस बार तो उम्मीद ही नहीं है।

 

घुड़सवारी व नौकायन दंगल अब इतिहास बन चुके :   घुड़दौड़ , नौकायन व दंगल अब इतिहास बन गए । अव्वल घोड़े व घुड़सवार , तांगा दौड़ में अव्वल, बैल, गाय पशुपालक पुरस्कार पाते थे। 2002 में राजद सुप्रिमो का घोड़ा व तत्कालीन विधायक विनय कुमार सिंह का घोड़ा सुर्खियों में रहा। तत्कालीन मंत्री ददन पहलवान का घोड़ा भी चर्चा में रहा। लालू जी का घोड़ा चेतक व विनय का घोड़ा हीरा प्रतिस्पर्धा में नहीं उतारे गए। मौत का कुंआ , पैरासेलिंग भी पिछले साल से बंद हैं । हाथी सिर्फ नुमाईश को आते रहे । 2019 से चिड़िया बाजर भी बंद है ।
छठ के बाद से ही मेला यात्रियों का होता था आना शुरू बैल गायें घोड़ा, हाथियों का मेले में आना शुरू हो जाता था । बैलहट्टा समेत पशु बाजारों में उड़ रहे धुएँ में गोहरी के साथ मेले की लिट्टी चोखा, गुड़ की जलेबी, मियाँ मिठाई, मिट्टी के घिरनी , सीटी, सूप आदि अब इतिहास बन चुके हैं ।
सोनपुरवासियों को सालों भर की कमाई होती थी एक महीने के मेले में। सोनपुर के लोगों की लागत पूंजी के अनुसार सालों भर की ठोस कमाई सोनपुर मेले के एक महीने में हो जाती थी। कोरोना ने वह भी रोक दी।

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