कश्मीर का भारत से एकीकरण

कश्मीर का भारत से एकीकरण

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

ऐसे भी वक्त आते हैं, जब इतिहास शख्सीयतें खड़ी करता है, वरना अमूमन तो इंसान ही इतिहास का रचयिता हुआ करता है. पिछले सोमवार एक ऐसे ही इतिहास पुरुष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अतीत को सुधारने के द्वारा भविष्य को पुनर्परिभाषित करने के उद्देश्य से एक नये वर्तमान की रचना कर डाली.
उनकी सलाह पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर ने संविधान के अनुच्छेद 370 को अप्रासंगिक बना दिया. एक ही घंटे बाद गृह मंत्री अमित शाह ने संसद को सूचित किया कि अब जम्मू-कश्मीर किसी विशेष दर्जे से युक्त राज्य नहीं, बल्कि भारत का नवीनतम केंद्र शासित प्रदेश बन गया है.
वर्ष 2019 में ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के नारे को महज एक जुमला बताया गया, पर जो काम 70 वर्षों से दूर की कौड़ी बना था, मोदी ने उसे 70 मिनट से भी कम समय में संपन्न करते हुए कश्मीरियों को भारत की राष्ट्रीय आस्था में समाहित कर उन पर ‘भारतीय’ होने की मुहर लगा दी.
चूंकि उन्हें रोजगार और संपत्ति की तलाश में समूचे भारत में कहीं भी आने-जाने का पूर्ण अधिकार प्राप्त था, प्रधानमंत्री मोदी ने कश्मीर में रहनेवाले भारतीयों को भी यही अधिकार दे दिये. मोदी के पिछले कार्यकाल में कश्मीर के स्थानीय लोगों ने मोदी की पहलकदमियां खारिज कर दी थीं, जिसने उन्हें स्तब्ध कर दिया था.
क्योंकि, वे ऐसे पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने घाटी में बाढ़ के वक्त की दिवाली गुजारी और केंद्र ने बाढ़ से बचाव एवं राहत के लिए अपने खजाने खोल दिये. परंतु, उनकी सदाशयता का जवाब आतंकवादी हिंसा की बाढ़, भड़काऊ तकरीरों और पत्थरबाजी के रूप में मिला. प्रधानमंत्री मोदी ने यह महसूस किया कि अब राज्य की ताकत का एक सशक्त प्रदर्शन करना वक्त की जरूरत है.
अपने पूर्णकालिक ‘संघ प्रचारक’ होने के दिनों से ही मोदी की आस्था ‘एक राष्ट्र, एक संविधान’ में रही है, जो जम्मू एवं कश्मीर के लिए एक विशिष्ट प्रावधान को भारत की भौगोलिक तथा राजनीतिक पहचान और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए एक सतत खतरा मानती थी. घाटी का संवैधानिक अलगाव ही उसके अलगाववाद एवं गरीबी के लिए जिम्मेदार बना रहा, जबकि शेष भारत तेजी से विकास की ओर अग्रसर होता गया.
जब उनके राजनीतिक नेता और अलगाववादी क्षत्रप पूरे राज्य को लूट रहे थे, तो वहां के गरीब लोग आतंकवादियों की गोलियों और बमों का शिकार हो रहे थे. अलगाववादियों और पाक प्रायोजित नाराजगी की वजह से रोजगार की जड़ता के मारे बेरोजगार युवाओं को सांप्रदायिक उन्माद की घुट्टी पिलाकर अपने ही लोगों के विरुद्ध हथियार उठाने को उकसाया गया.
इस अनुच्छेद के द्वारा कश्मीर को शेष भारत से पृथक करने के षड्यंत्र की कीमत पिछले सात दशकों के दौरान राष्ट्र को अरबों रुपयों और हजारों जानों से चुकानी पड़ी.
कश्मीर कई गैर-सरकारी संगठनों, पत्रकारों, सेवानिवृत्त रक्षा विशेषज्ञों और पैरवीकारों के लिए एक दुधारू गाय बन गया, जिसका उपयोग उन्होंने वार्ताकारों और बिचौलियों के रूप में नाम, यश और पैसे कमाने के लिए किया. भारत सरकार ने अब इन रास्तों को हमेशा के लिए बंद कर दिया है. प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि अनुच्छेद 370 नहीं होता, तो 1989 से लेकर आज तक 41 हजार जानें नहीं जातीं.
 हालांकि इस विवादास्पद अनुच्छेद को रद्दी की टोकरी में डालने के बाद भी कश्मीर घाटी को शेष भारत के साथ एकाकार करने में अभी वक्त लगेगा, लेकिन अब उस प्रक्रिया को प्रारंभ कर दिया गया है. प्रधानमंत्री ने अपने विश्वस्त सलाहकारों की टोली के साथ एक सावधानीपूर्ण योजना बनाने और विस्तृत मंथन के बाद ही यह साहसिक कदम उठाने का फैसला किया है.
फारूख अब्दुल्ला की इस शेखी ने कि ‘यदि मोदी दस बार प्रधानमंत्री बन जाएं, तो भी वे अनुच्छेद 370 हटाने का साहस नहीं जुटा सकेंगे,’ ने प्रधानमंत्री को सोचे गये वक्त से भी पहले ही यह कदम उठाने को बाध्य कर दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मीलों आगे की सोच रखनेवाले एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है, जो आज जिस मिशन पर कार्य आरंभ करते हैं, उसके नतीजे महीनों या कभी-कभी तो बरसों बाद नजर आते हैं.
उन्होंने पिछले आम चुनावों के पूर्व से ही अनुच्छेद 370 हटाने की तैयारी शुरू कर दी थी. अपने विश्वस्त सत्यपाल मालिक को उन्होंने तब राज्य के राज्यपाल पद पर बिठाया, जब पीडीपी-भाजपा सरकार के पतन के बाद जम्मू और कश्मीर उद्वेलित था.
 उसके बाद अनुच्छेद 370 को भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र का एक अहम हिस्सा बनाया गया. फिर चुनाव के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी मंत्रिपरिषद का पुनर्गठन किया, तो उन्होंने राजनाथ सिंह को गृह मंत्रालय के बजाय रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी देकर गृह मंत्रालय का कार्यभार अमित शाह को सौंपा. पहले ही दिन से शाह का ध्यान सुरक्षा उपायों की मजबूती पर केंद्रित हुआ.
उन्होंने न केवल कई कानूनों के द्वारा सुरक्षा बलों एवं एजेंसियों को और अधिकारसंपन्न बनाया, बल्कि भ्रष्ट स्थानीय राजनेताओं और अलगाववादियों पर भी नकेल कसी, जिनका भविष्य घाटी में अशांति पैदा करते हुए अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेश भेजने पर टिका था. यहां तक कि विभिन्न भ्रष्टाचार-निरोधक एजेंसियों ने पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती तक से पूछताछ की.
फिर उन्होंने अपनी विधिक टीम को ऐसी योजना बनाने को कहा, जिसके द्वारा अनुच्छेद 370 को औपचारिक रूप से निरस्त किये बगैर उसकी प्रभावशीलता को शिथिल किया जा सके. इसके साथ ही उन्होंने महान्यायवादी तुषार मेहता को भी वह कानूनी ढांचा तैयार करने का कार्य सौंपा, जिसके अंतर्गत जम्मू और कश्मीर को संविधान में कोई संशोधन किये बगैर अन्य राज्यों की बराबरी में लाया जा सके. और, इस तरह वह संपूर्ण योजना बनी, जिसे संसद की मंजूरी हेतु पेश किया गया.
प्रधानमंत्री मोदी की यह पहलकदमी, जिसने उनके कट्टर समर्थकों के साथ ही देश के प्रायः तटस्थ मध्यम वर्ग का दिल जीत लिया है, कश्मीर की स्थानीय आबादी को भी भारत की विकास यात्रा में शामिल होने के लिए आकृष्ट करेगी. मगर, उनके उदारवादी विरोधी उन पर संविधान की अनदेखी करने का आरोप मढ़ेंगे. इतिहास मोदी का वस्तुपरक एवं विषयपरक दोनों ढंग से मूल्यांकन करेगा और मोदी हर कसौटी पर देश के नये सरदार के रूप में सराहे जायेंगे.

Leave a Reply