क्या वोटतंत्र की भूख के आगे लोकतंत्र नतमस्तक है?

क्या वोटतंत्र की भूख के आगे लोकतंत्र नतमस्तक है?

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

राजनीति के पल-पल बिगड़ते स्वरूप से अब चुनावी रैलियों, नेताओं के बयानों और सोशल मीडिया पर जिस तरह के जहरीले शब्द उछाले जा रहे हैं, वह बेहद शर्मनाक है। लगता तो यही है कि भारतीय चुनाव प्रक्रिया चुनाव आयोग के हाथ से निकलकर सीधे नेताओं के कब्जे में आ गई है। चुनावों से पहले किस तरह नफरत का वातावरण बनाया जाता है, झूठ-सच के सौदे होते हैं और किस किस्म की खरीद फरोख्त होती है, यह स्वरूप लोकतंत्र के लिए उचित नहीं कहा जा सकता।

क्या चुनाव आयोग चुनाव में इस्तेमाल हो रही भाषा शैली, सद्भाव बिगाड़ने की साजिशों और जोड़तोड़ को रोकने की दिशा में कोई सख्त आचार संहिता नहीं बना सकता? आचार संहिता तो बनी हुई है लेकिन कोई भी दल उसे मानने को तैयार नहीं है और चुनाव आयोग उस पर एक्शन लेने की बजाय खामाेशी में ही अपनी भलाई समझता है।

चुनाव जितना साफ सुथरा होगा, नि:संदेह लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा, लेकिन वोटतंत्र की भूख के आगे लोकतंत्र नतमस्तक है। मार्च के पहले सप्ताह में 5 राज्यों असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुड्‌डुचेरी में चुनाव की घोषणा होने वाली है। पुड्‌डुचेरी में चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस की सरकार जिस तरह गिरी, उसे क्या कहा जाए? विधायकों में महत्वाकांक्षा, पद की लालसा इतनी भारी हो गई है कि वे कुछ भी करने को तैयार हैं!

किसी ने कहा है कि ‘बाजार में खरीदार तब ही आएंगे, जब कोई बिकने को तैयार हो’। यह घटनाक्रम हम पुड्‌डुचेरी से पहले मध्यप्रदेश में भी देख चुके हैं। बंगाल में चुनाव भाषागत नजरिए से अब मुखर हो चुका है। न किसी का जुबां पर नियंत्रण है, न कोई आचार संहिता की गरिमा की परवाह कर रहा है। सारी सीमाएं टूट रही हैं। हर मुश्किल दांव आजमाए जा रहे हैं।

धर्म से लेकर देवी-देवता तक चुनाव मैदान में उतार दिए गए हैं। सबसे शर्मनाक पहल हुई है कि चुनाव को देवी बनाम श्रीराम बनाने के प्रयास हो रहे हैं? यह क्या है? हम विधायक चुन रहे हैं या किसी मंदिर के पुजारी या मस्जिद के मौलवी को? राजनीति में धर्म का इस्तेमाल कोई भी पार्टी करे, इस पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान है लेकिन कोई रुकता नहीं। असम भी पीछे नहीं है।

वहां राजनीति एक अलग ही माेड़ पर है। फूट डालो और राज करो के फॉर्मूले से आप चुनाव तो जीत सकते हैं लेकिन देश का दिल नहीं। जिस दिन देश की जनता विकास के मुद्दे पर प्रत्याशियों का चयन करेगी, उसी दिन देश में लोकतंत्र का उदय होगा। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस, सब बेकाबू हैं। ऊपर से असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की सभाओं में इस्तेमाल हो रही असभ्य भाषा ने इन चुनावों का जायका ही बिगाड़ कर रख दिया है।

‘चुनाव’ कहने को एक पवित्र शब्द है लेकिन मैदान में यह एक फ्री हैंड दंगल जैसा है। न कोई कहने वाला है, न रोकने वाला। दरअसल जिम्मेदारी आम मतदाताओं की है वे इस चुनाव को पटरी पर ला सकते हैं। उन्हें ही तय करना चाहिए कि उनके लिए किसी भी पार्टी से पहले देश है और वे देश के साथ खड़े हैं।

जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हों, वहां सोशल मीडिया पर पूरा नियंत्रण चुनाव आयोग अपने हाथ में क्यों नहीं लेता? हो यह रहा है कि हर बयान की प्रतिक्रिया हो रही है और मतदाता धर्म और जाति में बंट रहे हैं। ऐसे में हम चुनाव तो जीत जाएंगे, लेकिन हमारी सदियों पुरानी सद्भाव की परंपरा हार जाएगी।

Rajesh Pandey

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