भाषा बहता नीर… समय, समाज और परिवेश के साथ बदल रही हिंदी

भाषा बहता नीर… समय, समाज और परिवेश के साथ बदल रही हिंदी

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

दिवस पर विशेष

हजार साल लगे हिंदी को बोली से भाषा बनने में. एक स्वतंत्र, स्वायत्त, समर्थ भाषा बन जाने के बावजूद जो पहचान इसने आज भी बचा कर रखी है, वह है इसकी लोकप्रियता और लोकग्राह्यता. इसकी विकासशीलता पिछले हजार सालों में कभी मंद नहीं पड़ी. वह आज भी बदस्तूर कायम है.

इस देश में संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी को तो सत्ता का संरक्षण मिला, लेकिन हिंदी को उस अर्थ में आज भी नहीं मिला. आज यह समय के साथ चलती हुई समृद्ध हुई है तो इसका श्रेय केवल इसकी जिजीविषा और प्रतिकूलताओं के विरुद्ध लड़ने की अंतर्निहित शक्ति के कारण है.

जब-जब इसे राष्ट्रभाषा बनाने की मुहिम शुरू हुई, इसका सहज विकास बाधित हुआ. भारत में हिंदी के साथ-साथ बहुत सारी भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं, सबका अपना समृद्ध इतिहास है, उपलब्धि है, खूबसूरती भी. हिंदी एक ऐसी भाषा है, जिसका विकास बहुभाषी राष्ट्र में सहअस्तित्व की भावना के साथ हुआ है.
हिंदी के विकास में वे लोग व्यवधान पैदा करते हैं जो संस्कृत भाषा से मोहान्ध हैं. हिंदी को संस्कृत बनानेवाले लोग, भाषा विकास के नियम से सर्वथा अनभिज्ञ हैं. हर भाषा की अपनी स्वाभाविक प्रकृति होती है. हिंदी शब्द संपदा के कई स्रोत हैं. संस्कृत के साथ अन्य भारतीय एवं विदेशी भाषाओं के भी ढेर सारे शब्द यहां मिलते हैं.

हिंदी के विकास में उन मजदूरों का योगदान भी कम नहीं है, जो आजीविका के लिए मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम जैसे देशों में गये. यहां के मजदूर पूरे भारत में बसे हैं. हिंदी को अहिंदी भाषी क्षेत्रों में सुगम और सुग्राह्य बनाने में उनका योगदान भी किसी से कम नहीं है.

आज यह भाषा, शिक्षा के साथ-साथ विज्ञान, व्यवसाय, शोध, जनसंचार आदि तमाम क्षेत्रों में प्रयुक्त हो रही है. रोजगार से जुड़ी होने के कारण भी इसके प्रयोग का दायरा बढ़ा है. इसमें विकास की अनंत संभावनाएं हैं जो समय के साथ उजागर होती रही हैं.

हिंदी फिल्मी गीतों ने भी इस भाषा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है लोगों का दिल जीतने की इसमें अदभुत क्षमता है. हिंदी की मिठास और कर्णप्रियता ही है कि वर्तमान समय में बहुत सारे विदेशी कलाकार भारतीय हिंदी सिनेमा और हिंदी गाने की ओर रुख कर रहे हैं.

हाल-फिलहाल के एक सर्वे में एक खबर जो आश्चर्यचकित कर देने वाली है कि विश्व के सभी अलग-अलग भाषाओं में बने वेब-सीरीजों में हिंदी भाषा के वेब-सीरीज ने टॉप-10 में अपनी जगह बनायी है. और तो और, यह दूसरे देशों में भी बिना किसी भाषायी रुकावट के खूब देखी और समझी जा रही है.

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. सामान्य जन भी डिजिटल माध्यम से हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं को खूब पढ़ रहे हैं. ये हिंदी भाषा की मजबूती और प्रसार ही है कि गूगल जहां पहले सिर्फ अंग्रेजी में कोई कंटेंट उपलब्ध करा पाता था, अब उसे हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध कराता है.

हिंदी ने अंग्रेजी के क्षेत्र में भी अतिक्रमण किया है. कई व्यापारिक विदेशी कंपनियों को अपना हिंदी एेप लॉन्च करना पड़ा. इससे उन्हें वो फायदा मिला जो अंग्रेजी एेप के मुकाबले कई गुणा ज्यादा था. हिंदी के ही अतिक्रमण का दूसरा प्रमाण यह है कि 2017 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में पहली बार हिंदी के कुछ शब्द शामिल किये गए.

कबीरदास ने कहा है – ‘भाषा बहता नीर’. समय, परिवेश और समाज के साथ भाषा भी बदलती है. कुछ पुरानी चीजें छूट जाती हैं, तो नयी चीजें जुड़ती भी तो हैं. स्थिरता से सड़न पैदा होगी. प्रवाह, गति देता है.

सोशल मीडिया में हिंदी भाषा का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है. ये अब सिर्फ बुद्धिजीवियों और प्रगतिशीलों की भाषा नहीं रह गई है. आम जन तक आसानी से पहुंच होने के कारण, खासकर स्त्री और दलित समाज की यह भाषा बन कर मुखर हुई है. स्त्री साहित्य और दलित साहित्य जो एक परिधि तक ही सीमित था, सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर आकर वो हिंदी में अपनी पीड़ा, दुख-दर्द, संत्रास, कुंठा लिख रहे हैं. यह यदि संभव है तो हिंदी भाषा के लोकग्राह्य होने के ही कारण.

हिंदी पूरे विश्व में पांचवी सबसे ज्यादा बोली और पढ़ी समझी जानेवाली भाषा है. आजादी की लड़ाई के दरम्यान इसने सभी भाषाओं को एक साथ जोड़ने में पुल का काम किया था. आज भी राष्ट्रीय एकता-अखंडता कायम करने में इस भाषा की अग्रणी भूमिका है. इसलिए तो हमारी भाषा हिंदी इतनी सम्माननीय है.

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