मकर संक्रांति भारत देश की विविधता का प्रतीक पर्व है, यह एकात्मकता और एकीकरण का त्योहार है

मकर संक्रांति भारत देश की विविधता का प्रतीक पर्व है, यह एकात्मकता और एकीकरण का त्योहार है

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

मकर संक्रांति का पर्व शास्त्रीय भी है और लौकिक भी। यह कृषि पर्व है तो ऋषि पर्व भी। यह एक पुण्य अवसर है जो संपूर्ण भारत में अलग-अलग नामों, अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। इसे छत्तीसगढ़, गोवा, ओडिशा, हरियाणा, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, असम, राजस्थान, सिक्किम, उत्तराखंड, बंगाल, गुजरात, जम्मू सर्वत्र मनाया जाता है। यह तमिलनाडु में पोंगल है, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में माघी है तो असम में भोगाली बिहू। जम्मू-कश्मीर में यह शिशिर संक्रांत है तो उत्तर प्रदेश, बिहार में खिचड़ी। पंजाब में लोहड़ी तो बंगाल में पौष संक्रांति। यह एक ऐसा पर्व है जिस दिन संपूर्ण भारत विविध नामों से विविध भाषाओं में आनंद उत्सव मनाता है। यह भारत की विविधता का प्रतीक पर्व है। यह एकात्मकता का पर्व है। एकीकरण का पर्व है। यह जनोत्सव है। लोकोत्सव है।

इस दिन सूर्य धनु से मकर राशि में जाकर मकर रेखा को संक्रांत करता है

इस दिन सूर्य मकर रेखा को संक्रांत करता है। धनु से मकर राशि में जाता है। यह प्रक्रिया धरती के लिए विशेषत: भारत की धरती के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 15 वर्ष पूर्व तक उत्तरायण भी इसी के साथ होता था, लेकिन अयन खिसकता है इसलिए उत्तरायण पहले हो जाता है, मकर संक्रांति बाद में होती है। अभी यह 14 या 15 तारीख को होती है। 70 या 75 साल पहले 13 या 14 तारीख को आती थी और 100 साल पहले 12 या 13 तारीख को। विवेकानंद का जन्म मकर संक्रांति के दिन हुआ था यानी तब मकर संक्रांति 12 तारीख को होती थी, पर अब 12 तारीख को न होकर 15 तारीख को होती है या 14 तारीख की रात को होती है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि अयन स्थान से खिसकता है।

संक्रांति विशुद्ध खगोलीय घटना है और सौरमंडल का सीधा प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है

संक्रांति विशुद्ध खगोलीय घटना है और सौरमंडल का सीधा प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। मनुष्य का जीवन, उसका भोग और मोक्षमूलक जीवन, भौतिक और आध्यात्मिक जीवन सब कुछ सूर्य पर निर्भर करता है। भारत में सूरज संक्रांति के साथ उष्मधर्मा होता है। सूर्य की किरणें सीधी होने लगती हैं। परिणामत: ऊष्मा बढ़ती है, गर्मी बढ़ती है, दिन बड़ा होने लगता है। काम के घंटे बढ़ते हैं। पूरे देश में कृषि का वातावरण निर्मित होता है। धरती में सर्जन की संभावनाएं बढ़ने लगती हैं। फलों और फूलों से लदी हुई धरती शस्य श्यामला धरती प्राणी मात्र को पोषण का आश्वासन देती है। जब ऊष्मा बढ़ती है तो सिंचन के लिए जल की आवश्यकता होती है। इसलिए मकर संक्रांति के अवसर पर जल का विशेष महत्व है।

दाल और चावल मिलाकर एकरस और समाज समरस होकर पोषित होता है

जल में स्नान का और जल से सिंचन का, कुंभ में जल भरने का और पूर्ण कुंभ को जल में मिलाने का महत्व है। यह मिलाने का क्रम केवल सूर्य की रोशनी और जल की शीतलता का नहीं है, बल्कि इसमें अनाजों को मिलाते हैं। दाल और चावल मिलाते हैं। दोनों को मिलाकर एकरस करते हैं। फिर दोनों पोषक तत्व के रूप में परिवर्तित होते हैं। समाज समरस होकर पोषित होता है। जीवन के समरस होकर प्रकाशित होने से सर्वत्र कल्याण की, भद्र की, शुभता की सृष्टि करता है।

संक्रांति का अर्थ ही है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना, प्रकाश का गतिशील होना है

संक्रांति का अर्थ ही है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना अर्थात गतिशील होना। सूर्य का गतिशील होना आगे की ओर बढ़ना प्रकाश का गतिशील होना है, ज्ञान का गतिशील होना है। जब मकर रेखा से संक्रांत होता हुआ सूर्य भारत में अपनी राशियों को प्रसारित करता है तो ऋतुराज के आगमन की दस्तक होने लगती है। सर्वत्र आशावादिता होती है।

मकर और कर्क दो संक्रांतियां हैं जो उत्तरायण और दक्षिणायन के नाम से जानी जाती हैं

इस पर्व की विशेषता है सर्वत्र आशा का प्रसार, लेकिन सवाल मन में जरूर उठता है कि जब सूर्य सभी 12 राशियों पर संक्रांत होता है तो संक्रांति का ही विशेष महत्व क्यों है? वस्तुत: यही है जो भारत को संपूर्ण ब्रह्मांड के भूगोल से जोड़ता है। यह दो संक्रांति अर्थात मकर और कर्क अयन से जुड़ी हुई है। उत्तर और दक्षिण अयन से जुड़ी हुई है। उत्तर और दक्षिण अयन को ही हम उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के रूप में जानते हैं। मकर और कर्क दो संक्रांतियां हैं जो उत्तरायण और दक्षिणायन के नाम से जानी जाती हैं। एक से प्रकाश और ऊष्मा बढ़ती है तो दूसरे से घटती है। इसी प्रकार दो और संक्रांतियां हैं मेष और तुला जब दिन रात बराबर होता है।

सूर्य रात्रि में संक्रमित होता है इसीलिए मकर संक्रांति पर पुण्य कार्य दिन में होता है

अब पर्व है तो पुण्य की दृष्टि होगी इसलिए अपने लाभ के लिए संक्रांति के दिन में स्नान और दान आदि किए जाते हैं। सूर्य रात्रि में संक्रमित होता है इसीलिए मकर संक्रांति पर पुण्य कार्य रात्रि में नहीं होता। पुण्य कार्य दिन में होता है। सूर्य किरणों से पूरित दिन में ही स्नान और दान का विधान है। अपने देश में यह त्योहार धार्मिक पर्व तो है, लेकिन इसमें जो करणीय है वह धार्मिक कृत्य कम होकर सामाजिक अधिक है। यही इसकी विशेषता है। इसमें उपवास नहीं है।

मकर संक्रांति का पर्व बिना किसी कर्मकांड और पुरोहित के होता है

मकर संक्रांति का पर्व बिना किसी कर्मकांड और पुरोहित के होता है। पूजा है, पुरोहित नहीं है। क्रियाएं हैं, कर्मकांड नहीं है। स्नान है, पवित्रता है, लेकिन छुआछूत नहीं है। समरसता है, समता है। इस पर्व से प्रेरणा लेने वाली एक बड़ी बात यही है। सभी प्रकार के अज्ञान सभी प्रकार की अशुचिता तिरोहित हो और सूर्य की रश्मि जैसा तेजस्वी जीवन हो, यही इस पर्व की कामना है।

यह त्योहार लोक और शास्त्र दोनों के लिए और भारतीय समाज के लिए भी विशिष्ट है

सामान्य सामाजिक मान्यता है कि जो तिल का दान करता है, वह डूबता नहीं है। तिल का उबटन लगाकर पवित्र होकर दूसरों के लिए तर्पण करना, अग्नि में तिल जला कर पर्यावरण को शुद्ध करना, तिल का दान करना और वही खाना ऐसा कृत्य है जो इस अवसर पर पूरे देश में होता है। उत्तर में भी होता है। दक्षिण में भी होता है। यह त्योहार लोक और शास्त्र दोनों के लिए और भारतीय समाज के लिए भी विशिष्ट और उपादेय है।

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