सुशांत सिंह केस का क्लाइमेक्स सुब्रमण्यम स्वामी के कर कमलो से अभी बाकी है,कैसे?

सुशांत सिंह केस का क्लाइमेक्स सुब्रमण्यम स्वामी के कर कमलो से अभी बाकी है,कैसे?

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

29 मार्च 1999, दिल्ली का अशोका होटल, देश की सियासत तेजी से करवट ले रही थी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और तमिलनाडु की राजनीति में अम्मा के नाम से प्रसिद्ध जयललिता की मुलाकात हो रही थी। यह मुलाकात सोनिया-जयललिता की चाय पार्टी के नाम से चर्चित हुई थी। इस पार्टी के सूत्रधार थे सुब्रमण्यम स्वामी। स्वामी की ओर से आयोजित इस चाय पार्टी में सोनिया और जयललिता की भेंट का नतीजा यह हुआ था कि जयललिता ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी थी। कुछ दिनों बाद लोकसभा में विश्वास मत परीक्षण में अटल सरकार एक वोट से पराजित हो गई थी।

हालांकि इस पर अभी तक मतभेद हैं कि यह एक वोट कांग्रेस के गिरधर गोमांग का था या तब नेशनल कांफ्रेंस के नेता रहे सैफुद्दीन सोज का, लेकिन इस पर कोई दोराय नहीं कि सोनिया और जयललिता के बीच मुलाकात के सूत्रधार सुब्रमण्यम स्वामी ही थे। फिलहाल स्वामी केवल सोनिया गांधी को ही जेल भेजने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपने जीवनकाल में जयललिता के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर कुछ दिन जेल में रहने का श्रेय स्वामी को ही जाता है। स्वामी कब किसके खिलाफ मोर्चा खोल दें, इस बारे में कोई कुछ भी नहीं कह सकता। रामसेतु तोड़ने की परियोजना उनकी वजह से ही रुकी। अयोध्या में रामलला के अस्थाई मंदिर में मरम्मत के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पीछे भी उनकी ही याचिका की भूमिका रही। इसी तरह वोटिंग मशीन से मतदान की पर्ची निकालने की व्यवस्था के पीछे भी उनको ही श्रेय जाता है।

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत  की मौत के मामले में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी  सामने आए हैं और उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की है। एक एक्टर की मौत पर स्वामी का सामने आना ये बता रहा है कि अब इस मौत की मिस्ट्री का क्लाइमेक्स बाकी है। सुब्रमण्यम स्वामी ने सुशांत सिंह की मौत पर 26 सवाल उठाए हैं। जिसमें से सिर्फ दो सवाल खुदकुशी की ओर इशारा करते हैं, जबकि 24 सवाल सुशांत की मर्डर की ओर इशारा कर रहे हैं। सीएम नीतीश कुमार, चिराग पासवान से लेकर कई सांसद और नेता महाराष्ट्र सरकार से सीबीआई जांच कराने की सिफारिश कर चुके हैं।

लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने सीबीआई जांच से साफ इनकार कर दिया है। लेकिन उद्धव सरकार को ये बताते हुए स्वामी ने ट्वीट किया और कहा कि उद्धव मंत्रिमंडल को यह तय नहीं करना चाहिए कि राज्य सीबीआई जांच की अनुमति नहीं देगा, क्योंकि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी मामले की सीबीआई जांच का निर्देश दे सकते हैं। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में एक प्रमुख जाति ने 100 फीसदी अनुसूचित जाति के गांव में धावा बोल दिया, तब उन्होंने ऐसा किया था, जबकि सीएम जेजे ने इसका विरोध किया था।

अंग्रेजी में ऐसे लोगों को ‘मैवेरिक’ कहते हैं। जिन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता, लेकिन व्यवस्था में इनका खास महत्व होता है। सुब्रमण्यम स्वामी भारत की राजनीति में ऐसे ही व्यक्तित्व हैं । भारत की न्यायप्रणाली को लोग जितना भी कोस लें लेकिन समय-समय पर उन्होंने साबित किया है की ऐसी मंद पड़ी व्यवस्था में भ्रष्टाचार पर लगाम कैसे लगायी जा सकती है।  आम लोगों को इस बात की हैरानी होती है कि आखिर उन्हें इतनी गोपनीय जानकारियां मिलती कैसे हैं ? उनमें ऐसा क्या है कि वह सोनिया गांधी, जयललिता से लेकर पी चिदंबरम जैसे राजनेताओं के खिलाफ मोर्चा बुलंद करने से भी नहीं कतराते हैं। टी-20 क्रिकेट के ज़माने में भी टेस्ट के मंझे हुए खिलाड़ी जैसा टेम्परामेंट रखने वाले स्वामी के पास हर नेता, अधिकारी की एक फाइल होती है। उससे खुलासे होते हैं। स्वामी के दावे ऐसे कि अगर सब पर सच की मुहर लग जाए, फैसले आ जाएं, तो राजनीति डांवाडोल हो जाए।

स्वामी का सतत रंगमंच

सुब्रमण्यम स्वामी का सपना अपने पिता की तरह गणितज्ञ बनने का था। गौरतलब है कि उनके पिता सीताराम सुब्रमण्यम प्रसिद्ध गणितज्ञ थे। सुब्रमण्यम स्वामी ने हिंदू कॉलेज से गणित में स्नातक की डिग्री ली। इसके बाद वे आगे की पढ़ाई के लिए भारतीय सांख्यिकी इंस्टीट्यूट कोलकाता चले गए। स्वामी के जीवन का विद्रोही गुण पहली बार कोलकाता में ज़ाहिर हुआ। उस वक्त भारतीय सांख्यिकी इंस्टीच्यूट, कोलकाता के डायरेक्टर पीसी महालानोबिस थे, जो स्वामी के पिता के प्रतिद्वंद्वी थे। लिहाजा उन्होंने स्वामी को ख़राब ग्रेड देना शुरू किया। स्वामी ने 1963 में एक शोध पत्र लिखकर बताया कि महालानोबिस की सांख्यिकी गणना का तरीका मौलिक नहीं है, बल्कि यह पुराने तरीके पर ही आधारित है।

सुब्रमण्यम स्वामी ने महज 24 साल की उम्र में ही हॉवर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली थी। इसके बाद 27 साल में उन्होंने हॉर्वर्ड में ही गणित की टींचिंग शुरू कर दी थी। बाद में अमर्त्य सेन ने 1968 में स्वामी को दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया और स्वामी दिल्ली आ गए। साल 1968-69 में अमर्त्य सेन ने दावा किया था कि केएन राज और सुखमय चक्रवर्ती ने स्वामी को दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर नहीं बनने दिया। साल 1969 में वे आईआईटी दिल्ली से जुड़े। उन्होंने आईआईटी के सेमिनारों में ये कहना शुरू किया कि भारत को पंचवर्षीय योजनाएं खत्म करनी चाहिए और विदेशी फंड पर निर्भरता हटानी होगी। इसके बिना भी भारत 10 फ़ीसदी की विकास दर को हासिल कर सकता है।

इंदिरा गांधी ने 1970 के बजट के दौरान अवास्तविक विचारों वाला सांता क्लॉज करार दिया था। स्वामी ने इन टिप्पणियों को दरकिनार करते हुए अपने कार्य को जारी रखा। स्वामी के अलग-अलग सेमीनारों में दिए गए आर्थिक सुधार संबंधी विपरीत बयानों से इंदिरा गांधी नाराज हो गईं और स्वामी को दिसंबर, 1972 में आईआईटी दिल्ली की नौकरी गंवानी पड़ी। वे इसके ख़िलाफ़ अदालत गए और 1991 में अदालत का फ़ैसला स्वामी के पक्ष में आया। वे एक दिन के लिए आईआईटी गए और इसके बाद अपना इस्तीफ़ा दे दिया।

इंदिरा को सीधा चैलेंज

नानाजी देशमुख ने स्वामी को जनसंघ की ओर से राज्यसभा में 1974 में भेजा। आपातकाल घोषित होने पर उन्होंने इंदिरा गाँधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था और इंदिरा गांधी को ललकारते हुए संसद में प्रवेश कर गए थे। आपातकाल के 19 महीने के दौर में इंदिरा सरकार उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर सकी। आपातकाल के दौरान स्वामी शरण लेने के लिए अमेरिका चले गए थे। लेकिन वहां जाने से पहले उन्होंने कई बार गुजरात की यात्रा की थी, इंडिया डुडे की रिपोर्ट के अनुसार उस वक्त आरएसएस ”अक्सर स्वामी को स्टेशन से लेने के लिए एक युवा प्रचारक को भेजा करता था…वे प्रचारक नरेंद्र मोदी थे।

आपातकाल के समय स्वामी के साहस के किस्सों ने उन्हें आरएसएस प्रचारकों का हीरो बना दिया था। इन किस्सों में बिना बताए अमेरिका से सीधे संसद पहुंचना और चुपचाप गायब हो जाने से पहले दुख जाहिर करना कि ”लोकतंत्र मर चुका है” शामिल है।  सुब्रमण्यम स्वामी 1977 में जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। साल 1977 की जनता पार्टी सरकार में मोरारजी देसाई स्वामी को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की वजह से ऐसे नहीं हो सका था। 1990 के बाद स्वामी जनता पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। स्वामी एक समय राजीव गांधी के करीबी थे और उन्होंने बोफोर्स कांड के दौरान राजीव गांधी का समर्थन करते हुए सदन में सार्वजनिक तौर पर कहा था कि राजीव ने कोई पैसा नहीं लिया है।

स्वामी को प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार में वाणिज्य एवं कानून मंत्री बनाया गया था। दावा यह भी किया जाता है कि मनमोहन ने उनका आर्थिक सुधार का ब्लू प्रिंट ही लागू किया। नरसिम्हा राव सरकार के समय भी विपक्ष में होने के बावजूद उनको कैबिनेट रैंक का दर्जा मिला हुआ था।

1998 में सरकार बनाने के लिए स्वामी ने सरकार बनाने के लिए अटल बिहारी और जयललिता के बीच मध्यस्थता की, दावा ये है कि वाजपेयी स्वामी को वित्त मंत्री बनाने के वादे से मुकर गए। जिसके बाद सोनिया गांधी से दोस्ती कर एनडीए की पहली सरकार गिराने में भूमिका निभाई। साल 2000-01 में बीजेपी, कांग्रेस और जयललिता ने स्वामी से किनारा काट लिया और लोकसभा हाथ से निकल गई। हावर्ड में फिर विजिटिंग प्रोफेसर बन गए। 2008 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मोबाइल स्पेक्ट्रम बैंड के अवैध आवंटन पर ए.राजा पर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी।  वाजपेयी के रहते स्वामी भाजपा में पैर नहीं जमा पाए, लेकिन 11 अगस्त, 2013 को नरेंद्र मोदी ने स्वामी को वापस बीजेपी में शामिल करा लिया। साल 2016 में एनडीए की तरफ से राज्यसभा के लिए नामित कर दिए गए।

निजी करिश्मा भी चर्चा के काबिल

स्वामी का अपना निजी करिश्मा भी है। वे जितनी आसानी से किसी को दुश्मन बना सकते हैं, उतनी ही आसानी से दोस्त भी बना लेते हैं। एक लेख में उन्होंने मांग की कि ‘मुसलमान गर्व के साथ कहें कि वे भले ही मुसलमान हैं, लेकिन उनके पूर्वज हिंदू हैं। कुछ साल पूर्व उन्होंने दिल्ली हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके हिंदू अखबार के तत्कालीन संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को हटाने की मांग की थी, क्योंकि वे अमेरिकी नागरिक थे। स्वामी का कहना था कि किसी भारतीय अखबार के संपादक को सिर्फ भारत का निवासी ही नहीं, बल्कि भारत का नागरिक भी होना चाहिए। उनके निजी संबंध भारत की विविधता का दर्शन कराते हैं। उदाहरण के लिए स्वामी की पत्नी पारसी हैं, उनके दामाद मुस्लिम हैं। जैसा कि स्वामी खुद कई इंटरव्यू में कह चुके हैं कि रिश्ते में उनकी एक बहन ईसाई हैं और रिश्ते में एक भाई यहूदी हैं। हालांकि ये बातें उनके सार्वजनिक रूप से लिए गए रुख को हल्का नहीं करती हैं, लेकिन उन्हें अजीब तो बनाती ही हैं।

स्वामी और चीन

  • 1975 में स्वामी ने एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था “इकनोमिक ग्रोथ इन चाइना एंड इंडिया,1952-1970: ए कम्पेरेटिव अप्रैज़ल।
  • स्वामी ने सिर्फ 3 महीने में चीनी भाषा सीखी (किसी ने उन्हें एक साल में चीनी भाषा को सीखने की चुनौती दी थी) स्वामी को आज भी चीनी अर्थव्यवस्था और भारत और चीन के तुलनात्मक विश्लेषण के प्राधिकारी का दर्जा प्राप्त है।
  • सुब्रमण्यम स्वामी के अथक प्रयास का ही परिणाम है कि कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए भारत और चीन की सरकारों के बीच एक समझौता हो सका है।
  • हिन्दू तीर्थयात्रियों के लिए स्वामी ने गंभीर प्रयास किए हैं। इसके लिए स्वामी ने 1981 में ही अभियान छेड़ा था। उन्होंने चीन के शीर्ष नेता देंग जियाओपिंग से मुलाकात की थी।

सियासत की नयी राह बनाने वाले स्वामी

सुब्रमण्यम स्वामी ऐसे शख्स हैं जो देश की राजनीति को कानून के रास्ते बदलते-बिगाड़ते रहे हैं। पिछले  तीन दशकों में कई मौकों पर उन्होंने ऐसा किया है। कई लोग उन्हें वकील समझने की भूल कर जाते हैं। लेकिन उन्होंने कानून की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली है। बल्कि मशहूर वकीलों के नोट्स को पढ़कर उन्होंने कानून की बारिकयों को सीखा है।

दांव से नहीं बचा कोई 

रामकृष्ण हेगड़े केस : सुब्रमण्यन स्वामी सबसे पहले तब सुर्खियों में आए, जब उन्होंने कर्नाटक के तत्कालीन सीएम रामकृष्ण हेगड़े पर टेलिफोन टैपिंग कांड का आरोप लगाया था। इस मुद्दे पर खूब राजनीतिक हंगामा हुआ था और बाद में हेगड़े को इस्तीफा तक देना पड़ा. यहीं से उनका राजनीतिक पतन भी हो गया।

जयललिता-शशिकला आय से अधिक संपत्ति: आय से अधिक संपत्ति मामले में जयललिता और शशिकला को निचली अदालत ने दोषी भी ठहरा दिया था। जया को सीएम पद की कुर्सी छोड़नी पड़ी, जिसके बाद पन्नीरसेल्वम पहली बार सीएम बने। हालांकि बाद में हाई कोर्ट ने दोनों को बरी किया था। लेकिन कर्नाटक सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। बाद में जया और केंद्र सरकार के बीच बेहतर संबंध के मद्देनजर स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में केस दाखिल नहीं किया।

2जी घोटाला: यूपीए-2 सरकार को जिस केस में सबसे अधिक फजीहत मिली, वह 2जी घोटाला ही था। इस केस से सरकार की साख को करारी चोट पहुंची। केस के कोर्ट तक पहुंचने और इसके खिलाफ कानूनी और राजनीतिक जंग लड़ने वालों में स्वामी सबसे बड़े खिलाड़ी थे। मामले में ए. राजा सहित कई लोगों को जेल हुई और मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के विपक्ष के आरोपों को इससे जबरदस्त ताकत मिली। हालांकि साल 2017 में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

नेशनल हेराल्ड केस : इस केस में स्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी को निशाने पर लिया। स्वामी ने कोर्ट में आरोप लगाया कि गलत तरीके से सरकार से आवंटित संपत्ति का दुरुपयोग किया गया और इसमें करप्शन हुआ है।

राम मंदिर केस : स्वामी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर भी सक्रिय रहे। सुप्रीम कोर्ट में इस बारे में केस दर्ज करते हुए मामले की जल्द सुनवाई, मंदिर बनवाने की मांग को लेकर वह अदालत और अदालत के बाहर राजनीतिक जंग भी लड़ रहे।

पी चिदंबरम केस: वर्ष 2006 में चिदंबरम पर एयरसेल-मैक्सिस केस में वित्तमंत्री  चिदंबरम को अनुचित तरीके से लाभ पहुंचाने के आरोप भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने लगाए थे।

वर्तमान में स्वामी सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में खुलकर सामने आए हैं। उन्होंने कहा है कि अब सीबीआई जांच के अलावा इस मामले में कोई विकल्प बचा ही नहीं है।सुब्रमण्यन स्वामी ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सुशांत की मौत के मामले की सीबीआई जांच किए जाने की मांग की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने उनके पत्र को संज्ञान में भी लिया था। साथ ही स्वामी ने सुशांत के फैन्स से भी अनुरोध किया था कि जिन्हें भी सुशांत के निधन पर शक है अपने इलाके के सांसदों को लिखें और पीएम से सीबीआई जांच का अनुरोध करें। जांच पुलिस से हटकर सीबीआई के पाले में जाती है? सुशांत को इंसाफ मिलता है या नहीं? सुशांत के असली कातिलों को सजा मिलती है या नहीं? ये तमाम सवालों का जवाब तो भविष्य की गर्त में छुपा है। लेकिन एक बात तो तय है कि एक एक्टर की मौत पर अपने कानूनी दांव से बड़े-बड़े को चित्त करने वाले स्वामी के खुलकर सामने आने से ये लगने लगा है कि अब इस मामले का फैसला हो ही जाएगा।

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