पति-पत्नी के मध्य प्रगाढ़ शारीरिक रिश्ते क्लिनिकल दृष्टि से उचित और स्वास्थ्य के लिये  है हितकर

पति-पत्नी के मध्य प्रगाढ़ शारीरिक रिश्ते क्लिनिकल दृष्टि से उचित और स्वास्थ्य के लिये  है हितकर

आयुर्वेद की अद्रव्य चिकित्सा के गूढ़ सूत्र

हितकारी और सुखकारी जीवन ही जीने योग्य जीवन है
बल को बढ़ाने वाले कारकों में वीर्य सबसे बेहतर है

आंख, नाक, कान, जीभ व चमड़ी मन के नियंत्रण हों तो रोग नहीं होते

आलेख : डा० अनुपम आदित्य

श्रीनारद मीडिया‚ सेंट्रल डेस्क:

प्रश्न पूछना और उनका उत्तर देना एक गंभीर कला है| इसमें पूर्व से उपलब्ध साहित्य, संहिताओं, वैज्ञानिक ज्ञान, और अनुभवजन्य ज्ञान की समग्रता को समेटना पड़ता है| आज से कम से कम 5000 वर्ष पूर्व ऐसे ही कुछ कल्याणकारी प्रश्न आचार्य अग्निवेश ने अपने गुरु भगवान आत्रेय से पूछा था|

दरअसल, आयुर्वेद को पूर्ण विस्तार से समझाने-समझने के बाद आचार्य अग्निवेश को लगा कि आहार, विहार, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त, पंचकर्म, रसायन एवं औषधियों के संदर्भ में भगवान आत्रेय प्रत्येक विषय को सम्हालने के लिये अनेकानेक कारक स्पष्ट किये हैं| तो क्या इन तमाम कारकों में से कुछ ऐसे कारक नहीं हैं जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण हों? आचार्य अग्निवेश अपनी जिज्ञासा नहीं रोक पाये और अंत में गुरुदेव से पूछ ही लिया|

“गुरुश्रेष्ठ! आपने आयुविज्ञान को बहुत विस्तारपूर्वक समझाया| जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करने वाले अनेकानेक कारक बताये| परन्तु इन कारकों में कोई तो सबसे महत्वपूर्ण या श्रेष्ठतम होगा? क्या प्राणवर्धन करने वालों में एक, बलवर्धन करने वालों में एक, बृंहण या वृद्धि करने वालों में एक, नंदन या समृद्धि करने वाले कारकों में एक, मन को प्रसन्न करने वालों में एक, और मार्गों में एक सर्वश्रेष्ठ मार्ग है?” –आचार्य अग्निवेश ने पूछा|

आचार्य अग्निवेश के इन प्रश्नों को आप हल्के में नहीं ले सकते| क्यों? बात यह है कि प्राणवर्धन का सबसे महत्वपूर्ण कारक जान लेने से दीर्घायु या लंबी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र तो मिल जायेगा किन्तु ऐसी लम्बी आयु किस काम की है जो बलवान या ऊर्जावान न हो, जो बृंहण या वृद्धि से समुचित भरपूर न हो, जिसमें समृद्धि और प्रसन्नता न हो, और अंततः जिसमें सद्गति या मोक्ष न मिले| इसलिये आचार्य अग्निवेश द्वारा पूछे गये प्रश्नों का यह समुच्चय बेहद रोचक, गूढ़ और कल्याणकारी है| दुर्भाग्यवश, चरकसंहिता के तमाम व्याख्याकार इन प्रश्नों की गहराई, गूढ़ता और निहितार्थ को कभी नाप नहीं पाये| इसलिये आज की चर्चा इन प्रश्नों पर है|

इन प्रश्नों पर भगवान आत्रेय द्वारा दिया गया उत्तर कई कारणों से महत्वपूर्ण हो जाता है| इनकी चर्चा हम करेंगे, पर पहले उत्तर देखिये|

“आयुर्वेद को जानने वाले ऐसा मानते हैं कि प्राणियों के प्राण बढ़ाने वाले कारकों में सबसे श्रेष्ठ अहिंसा, बलवर्धन करने वालों में वीर्य (जोश, बहादुरी या वीर्य) बहादुरी, बृंहण या वृद्धि करने वालों कारकों में विद्या, समृद्धि करने वालों में इंद्रियों पर विजय, मन को प्रसन्न करने वाले कारकों में तत्वज्ञान या सच्चाई का ज्ञान, और मार्गों में ब्रह्मचर्य सबसे उत्कृष्ट है|” –आत्रेय का उत्तर था|

आत्रेय के उत्तरों की तीन विशिष्टतायें देखना आवश्यक है|

पहली विशेषता यह है कि उत्तर में जिन एक-एक सर्वश्रेष्ठ कारकों को दर्शित किया गया है उनमें एक भी द्रव्य नहीं है बल्कि सभी अद्रव्य कारक हैं| जीवन में केवल द्रव्य ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि अद्रव्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं| उदाहरण के लिये प्राणवर्धक तो आहार भी है किन्तु अहिंसा ही उत्कृष्ट है क्योंकि हिंसा प्राणघातक और अहिंसा प्राणवर्धक होती है| अद्रव्य होने से हम इनका सदैव और अनवरत उपयोग तो कर ही सकते हैं, साथ ही ये बिना किसी अतिरिक्त आर्थिक लागत हमें सदैव उपलब्ध हैं|

दूसरी विशेषता यह है कि आत्रेय ने यहाँ उत्तर केवल अपने ज्ञान को आधार मानकर नहीं दिया| यहाँ पर उन्होंने प्रश्नों का उत्तर देने के लिये उस वैज्ञानिक विधि का सहारा लिया है जिसे वर्तमान में “एक्सपर्ट-जजमेंट” के नाम से जाना जाता है| यही कारण है कि आत्रेय ने अपने उत्तर में इस स्पष्टीकरण का समावेश किया है कि “आयुर्वेद को जानने वाले ऐसा मानते हैं”| इसका अर्थ यह है कि तत्समय में आयुर्वेद के विद्वानों के मत का निचोड़ आत्रेय ने अग्निवेश को दर्शित किया है| आत्रेय के इन उत्तरों का स्पष्ट अभिप्राय यह भी है कि “ऐसा केवल मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि मैंने आयुर्वेद के विद्वानों के मध्य उपलब्ध ज्ञान को एक्सपर्ट-जजमेंट के आधार पर प्राप्त कर, आज की भाषा में कहें तो “प्रिंसिपल कॉम्पोनेंट एनलिसिस” से ज्ञात हुआ सबसे महत्वपूर्ण कारक दर्शित किया है| यहाँ एक महत्वपूर्ण सन्देश यह भी है कि जब प्रश्न का उत्तर व्यापक प्रयोज्यता के लिये हो या अनेक कारकों में से एक प्रधान कारक की खोज पर चिंतन चल रहा हो तो अनेक विद्वानों के विचार को समाहित कर समग्र उत्तर देना उपयोगी है|

तीसरी बात यह है चरकसंहिता में यह प्रसंग वस्तुतः हृदयरोगों से बचाव के वर्णन के तुरंत बाद निरंतरता में आया है| इस तथ्य के प्रकाश में देखने पर एक यह सन्देश भी स्पष्ट होता है कि अहिंसा, वीर्य, विद्या, इन्द्रियजय, तत्वबोध और ब्रह्मचर्य जैसे अद्रव्य, किन्तु सभी नागरिकों पूर्णतः क्रियान्वयन-योग्य, भावों की हृदय रोगों से बचाव में भी विशेष भूमिका है| यदि इस दिशा में ध्यान दिया जाये तो भारत को हृदयरोग सहित तमाम गैर-संचारी रोगों की वैश्विक राजधानी होने के कलंक से मुक्ति मिल सकती है|

इस चर्चा का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है? वस्तुतः इस बात को समझने के लिये उत्तरों के निहितार्थ समझना आवश्यक है| सबसे पहला सन्देश तो यह है कि केवल लंबी आयु किसी काम की नहीं है| बीमार शरीर में लम्बे समय तक प्राण तो अटके रह सकते हैं परन्तु ऐसी आयु सुखायु और हितायु की श्रेणी में नहीं गिनी जाती| आयु ऐसी हो जिसमें मानसिक और शारीरिक बल और वृद्धि हो, समृद्धि हो, आनंद हो और जो इन्द्रिय-संयम के मार्ग पर चले| इन प्रश्नों और उत्तरों में इस महत्वपूर्ण समुच्चय का पूरा पूरा ख्याल रखा गया है|

अहिंसा प्राणवर्धक कारकों में श्रेष्ठतम कैसे है? दरअसल, हिंसा के सभी प्रकार, डांट-डपट, चिल्लाना, मारपीट करना, प्रताड़ित करना आदि जीवित कोशिकाओं में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इन्फ्लेमेशन को बढ़ा देते हैं| ऐसी दशा में बुढ़ापा जल्दी आता है और समय-पूर्व मृत्यु की संभावना बढ़ती है| स्वाभाविक है कि अहिंसा प्राणवर्धन में सबसे श्रेष्ठ है|

इसी प्रकार बल को बढ़ाने वाले कारकों में वीर्य सबसे बेहतर है| वीर्य या जोश आत्मविश्वास को बढ़ाता है| व्यक्ति को बलशाली बनाने में जोश का अद्वितीय योगदान रहता है| इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जब सेना-नायकों ने अपनी फौज में जोश दिलाकर हारे हुये युद्ध जीते हैं|

बृंहण या वृद्धि करने वाले कारकों में विद्या को सबसे उत्तम माना गया है| वस्तुतः शारीरिक और मानसिक विकास में विद्या, जिसमें ज्ञान और कौशल शामिल हैं, का बड़ा योगदान है| जानकारी, ज्ञान कौशल के बिना शरीर का पोषण या वृद्धि नहीं हो सकती| विद्या-विहीन व्यक्ति आहार, विहार, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त, पंचकर्म, रसायन और औषधियों के महत्त्व को कभी नहीं समझ सकता| और इन सबकी समझ और क्रियान्वयन के बिना समुचित मानसिक और शारीरिक पोषण, विकास या वृद्धि नहीं होती|

समृद्धि देने वाले कारकों में इंद्रियों पर विजय सबसे महत्वपूर्ण है| वास्तव में आंख, नाक, कान, जीभ व चमड़ी मन के नियंत्रण हों तो रोग नहीं होते| आरोग्य या रोगरहित हुये बिना समृद्धि नहीं प्राप्त हो सकती| असल में आरोग्य के बिना अर्थ, धर्म, काम या मोक्ष कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता| जीवन में खुशी चाहिये तो याद रखिये कि आरोग्य ही सुख है और विकार ही दुःख है| इसीलिये समृद्धि में इन्द्रिय-जय का अद्वितीय योगदान है|

प्रसन्नता देने वाले कारकों में तत्वबोध या सच्चाई का ज्ञान सबसे महत्वपूर्ण कारक है| यथार्थ ज्ञान के बिना व्यक्ति निरुद्देश्य भटकता रहता है| ऐसे व्यक्ति जीवन के महत्वपूर्ण लक्ष्यों को भी नहीं साध पाते| तत्वबोध मन को प्रसन्न करने वाले कारकों में इसीलिये सर्वश्रेष्ठ कहा गया है|

अंततः, मार्गों में ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ मार्ग है| ब्रह्मचर्य का मूल दर्शन वस्तुतः मैथुन के पूर्ण प्रतिबन्ध पर नहीं बल्कि इन्द्रिय-संयम और आत्म-नियंत्रण पर केन्द्रित है| आयुर्वेद का मत है कि मैथुन की अधिकता से अनेक रोग होते हैं किन्तु यदि सेक्स की इच्छा को दबाया जाता है या शुक्र-वेग धारण किया जाता है तो स्वास्थ्य-विषयक अनेक समस्यायें जैसे जननेंद्रिय, टेस्टिकल्स, शरीर और हृदय में दर्द, और मूत्र-विसर्जन में रुकावट और दर्द के लक्षण खड़े हो जाते हैं| मैथुन न करने से प्रमेह, मोटापा, तथा शारीरिक शिथिलता होती है| आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों में भी इन तथ्यों की पुष्टि होती है| इन समस्याओं से बचने के लिये पति-पत्नी के मध्य प्रगाढ़ शारीरिक रिश्ते क्लिनिकल दृष्टि से उचित और स्वास्थ्य के लिये हितकर हैं| चरकसंहिता में वाजीकर द्रव्यों और अद्रव्यों के माध्यम से चिकित्सा का विस्तृत वर्णन यह स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि गृहस्थों के लिये सेक्स पूर्ण-त्याज्य कभी नहीं रहा| पर इस बात को ध्यान रखें कि इन्द्रियों के संयम के बिना मानव का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय अस्तित्व सदैव संकट में ही रहता है|

ध्यान दीजिये आचार्य अग्निवेश के प्रश्न और आत्रेय के उत्तर वस्तुतः जीवन की समग्रता और उसे सम्हालने वाले श्रेष्ठ कारकों को समेटे हुये हैं| यहाँ केवल प्राणवर्धन या दीर्घायु मात्र का सूत्र जानने की जिज्ञासा नहीं है बल्कि ऐसे सूत्र जानने की जिज्ञासा है जिसमें दीर्घायु, हितायु और सुखायु अपनी समग्रता में हो| ऐसी लम्बी उम्र किस काम की होगी जिसमें शरीर में बल न रहे| इसीलिये दूसरा प्रश्न बलवर्धन पर केन्द्रित है| इसी प्रकार, लम्बी आयु और बल के साथ-साथ वृद्धि, समृद्धि और हर्ष और अंततोगत्वा सर्वाधिक महत्वपूर्ण मार्ग को समझने का प्रयास किया गया है|

हितकारी और सुखकारी जीवन ही जीने योग्य जीवन है| आचार्य अग्निवेश के प्रश्नों और उनके महान गुरु आत्रेय द्वारा दिये गये उत्तरों के निहितार्थ समझिये| और उसी के अनुरूप अहिंसा, वीर्य, विद्या, इन्द्रियजय, तत्वबोध और ब्रह्मचर्य को सहेजिये| ये अद्रव्य कारक बिना किसी अतिरिक्त धन का निवेश किये आपके पास सदैव उपलब्ध हैं| आजीवन मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और सुखी रहेंगे|

 

Dr Anupam Aditay
MD
Arohi Clinic
Fatepur
Siwan
Mb 8084071830

सन्दर्भ

1. अथ खल्वेकं प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतममेकं बलवर्धनानामेकं बृंहणानामेकं नन्दनानामेकं हर्षणानामेकमयनानामिति| — च.सू.30.15 “Isn’t there one most important leading factor, amongst others, for bestowing longevity, improving strength, anabolism or nourishing, promoting happiness and ecstasy and one as a path for self-realization?”— Asked Acharya Agnivesha to his great teacher Lord Atreya.
2. तत्राहिंसा प्राणिनां प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतमं, वीर्यं बलवर्धनानां, विद्या बृंहणानाम्, इन्द्रियजयो नन्दनानां, तत्त्वावबोधोहर्षणानां, ब्रह्मचर्यमयनानामिति; एवमायुर्वेदविदो मन्यन्ते|| — च.सू.30.15 “Yes, there are! As per the understanding of Ayurveda scholars, ‘non-violence’ is the best amongst those bestowing longevity of living beings. ‘Valor’ (prowess/virility) is the best amongst those promoting strength (energy), ‘knowledge’ is the best amongst the factors which should always be increased (as it is the best amongst nourishers), ‘self-control’ is the best amongst those that confer happiness(delight), ‘discovery’ or realization of true knowledge is the best amongst those promoting ecstasy, and celibacy is the best amongst the path to self-realization.”— Replied the Lord Atreya.
3. बृहत्त्वं यच्छरीरस्य जनयेत्तच्च बृंहणम्| (च.सू.22.10,पूर्वार्ध) Whatever increases the bulk of the body and makes it strong is known as Brimhana (nourishing therapy).
4. मेढ्रे वृषणयोः शूलमङ्गमर्दो हृदि व्यथा| भवेत् प्रतिहते शुक्रे विबद्धं मूत्रमेव च|| तत्राभ्यङ्गोऽवगाहश्च मदिरा चरणायुधाः| शालिः पयो निरूहश्च शस्तं मैथुनमेव च|| (च.सू.7.10-11) In case of health problems developed due to suppression of sexual desire, massage, sitz bath, medicated alcoholic, chicken, shali rice, milk, niruh basti, and proper sexual intercourse to ejaculate semen are prescribed.

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