बीत रहा दशक (2010-2020) बड़े राजनीतिक बदलावों का रहा है,कैसे?

बीत रहा दशक (2010-2020) बड़े राजनीतिक बदलावों का रहा है,कैसे?

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

बीतता दशक बड़े राजनीतिक बदलावों का दशक रहा है। 1989 से 2014 तक 25 साल का एक सिलसिला था, जब मिली-जुली सरकारों ने शासन किया। वह एक तरह से अल्पमत की ही सरकारें थीं। बीतते दशक में ऐसा लग रहा है कि हम फिर एकदलीय सरकार के युग में वापस चले आए हैं। विगत दशकों में कई दिग्गज प्रधानमंत्री रहे हैं, लेकिन यह कहना होगा कि इंदिरा गांधी के बाद पहली बार इस तरह के एक अभ्यस्त राजनेता नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, जिन्हें इसी दशक में लगातार दो बार बहुमत मिला है। अखिल भारतीय स्तर पर उन्हें एक जननेता माना जा सकता है, जिनका राजनीति और प्रशासन पर मजबूत प्रभाव है। एकदलीय सरकार की वापसी और एक दिग्गज नेता का उत्थान इस दशक के दो बड़े बदलाव हैं। बेशक, साल 2014 के बाद सियासी हालात बहुत बदले हैं।

इस दशक के खत्म होते-होते राजनीति भी निशाने पर आई है। स्पष्ट है, पहले जो आर्थिक विकास दर थी, उसमें कमी आई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि जिस तरह से लोगों को पहले ऋण मिलते थे, अब नहीं मिल रहे। बैंक भी ऋण वसूली पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। उत्तर से दक्षिण तक अनेक छोटे-बड़े उद्योगों की हालत खस्ता है। यह ध्यान रखना चाहिए, आर्थिक संकट जब आता है, तब बडे़ उद्योग समूह ज्यादा ताकतवर होकर उभरते हैं। उनके पास संसाधन होते हैं, मुश्किल हालात में भी वे व्यापार करने में सक्षम होते हैं। उदारीकरण का जो दौर 1991 से चल रहा है, उसमें चार-पांच उद्योग समूह हैं, जिनका बहुत फैलाव हुआ है। कई लोगों का कहना है, अभी भारत में जिस तरह के बदलाव हो रहे हैं, अमेरिका में उसी तरह के बदलाव 1900 और 1910 के बीच हुए थे। तब वहां तीन-चार बड़ी कंपनियों का वर्चस्व बन गया था, जैसे स्टैंडर्ड ऑयल का। वहां बहुत प्रतिरोध हुआ था और सरकार ने एंटी ट्रस्ट लॉ बनाकर उन बड़ी कंपनियों को तुड़वाया था। भारत में भी आज चर्चा हो रही है, लेकिन वैसे हालात क्या यहां आगामी दशक में बनेंगे? हम नहीं जानते। वैसे पंडित नेहरू के समय में भी वामपंथी कहते थे कि टाटा-बिड़ला पल रहे हैं, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कई बार कहा। हालांकि, आज हालात उससे बहुत अलग हैं।

समय के साथ राजनीति पर पूंजी व व्यापार का प्रभाव बढ़ा है। आज राजनीति या कूटनीति से परे जाकर तमाम देश व्यापारिक हितों के लिए गठजोड़ बना रहे हैं। पूंजी का प्रवाह बढ़ा है। फिर भी हमें गौर करना चाहिए कि हमारे यहां ज्यादा विदेशी पूंजी शेयर बाजार में आई है। भारत में विदेशी पूंजी का आना पहले से तो बहुत बढ़ा, लेकिन उस तरह का नहीं है, जैसा चीन, मलेशिया और ताईवान में है। दूसरा, विकसित अमेरिका, जापान, यूरोपीय देशों से निर्यात का जो सिलसिला था, वह थम रहा है। संरक्षणवाद की लहर हर देश में चल रही है, जिससे वैश्वीकरण इस दशक में कुछ हद तक कमजोर पड़ा है। जब निर्यात के मोर्चे पर भारत की मुश्किलें बीतते दशक में तेजी से बढ़ी हैं, जब हम अपने उत्पादन के लिए भी विदेशी आयात पर निर्भर हो रहे हैं, तब यहां के उद्योगों को खत्म होने से कैसे बचाया जाएगा? यह सवाल आगामी दशक में भी पीछा करेगा।

भारत में विकास का सवाल आसान नहीं है। भारत और बाकी लोकतंत्रों में बड़ा फर्क है। यहां अनेक प्रांतों, भाषाओं, धाराओं को एक सूत्र में पिरोना मुश्किल है। अभी भी 45 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं, ऐसी स्थिति अन्य किसी देश में नहीं है। दूसरी बात, कई ऐसे देश हैं, जहां औद्योगिकीकरण तब हुआ, जब वहां लोगों के पास मत डालने का हक नहीं था। भारत में विकास की राजनीति इसलिए भी ज्यादा मुश्किल नजर आती है, क्योंकि सबकी आकांक्षाओं, रंगों, आकारों को एक नीति में ढालना कठिन है। किसान, मध्यवर्ग, श्रम संगठन अभी खत्म नहीं हुए हैं। ये लोग सवाल उठाएंगे और यहां बडे़ उद्योगों पर दबाव बना रहेगा। बडे़ कॉरपोरेट का राजसत्ता से कैसा नाता रहेगा, क्या हमारे बडे़ नेता उनके काबू में रहेंगे? क्या पारदर्शिता रहेगी? ऐसी चिंताएं, बीतते दशक में लगातार बनी रही हैं और आगे भी बनी रहेंगी।
जाति, धर्म इत्यादि का प्रभाव भी इस दशक में राजनीति में बढ़ा है। पहले मिली-जुली संस्कृति का दबाव था, पर पिछले छह-आठ वर्षों में परिवर्तन हुआ है। हिंदुत्व व हिंदू राष्ट्र की चर्चा बढ़ी है।

अब करीब 35 से 40 प्रतिशत वोट वाली भाजपा ने 30 साल पहले जो सवाल खडे़ किए थे, राममंदिर, अनुच्छेद 370, गाय इत्यादि, वे हल हो चुके हैं। अब हमारी राजनीति का व्याकरण बदल गया है,  लेकिन उससे भी बड़ा बदलाव है कि विरोधी दल, खासकर कांग्रेस भी विरोध नहीं कर रही है। आगामी दशक में शायद ऐसी ही राजनीति जारी रहेगी। संस्थान, संगठन, सांस्कृतिक जगत, शिक्षा इत्यादि में काफी कुछ होना बाकी है। वैसे भी भाजपा के दिग्गज नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इशारा कर चुके हैं कि हम दिल्ली राज करने ही नहीं, समाज बदलने आए हैं। देश बदलने के लिए कांग्रेस ने लंबा रास्ता तय किया था और भाजपा भी वैसी ही राह पर दिखने लगी है।

बेशक, बीतते दशक में राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका बहुत बढ़ी है। सोशल मीडिया चलाने वाली कुछ कंपनियां इतनी मजबूत हो गई हैं कि सवाल उठने लगे हैं। क्या बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां भी राजनीति की दिशा तय करेंगी? गूगल, फेसबुक इत्यादि पर इसी दशक में मुकदमे शुरू हो चुके हैं। लिंगभेद, पर्यावरण जागरूकता लाने में सोशल मीडिया का बड़ा योगदान है, युवा पीढ़ी इसी के जरिए जागी है।

बीतते दशक में आम आदमी की भूमिका बढ़ी है। उसका आक्रोश अद्भुत स्वरूपों में सामने आ रहा है। जैसे ट्रंप, बोरिस जॉनसन जैसे नेताओं का उत्थान, बहुतों ने नहीं सोचा था कि ऐसे नेता भी उभरकर आएंगे। चुनावों में कई बार अनपेक्षित नतीजे आ रहे हैं। भारत में ही अगर लें, तो नरेंद्र मोदी 21 साल पहले पार्टी दफ्तर में रहते थे। वह उभरकर सामने आए। शायद यह सागर मंथन जैसा दौर है। राजनीतिक दलों में बड़े परिवर्तन हुए हैं। इस दशक में राजनीतिक दलों, संगठनों से परे भी स्वतंत्र आवाजों का उत्थान हुआ है। मलाला एक मिसाल है और 16 साल की वह ग्रेटा थनबर्ग भी, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र आमसभा में तल्खी के साथ यह सवाल उठा दिया कि आपने हमारे लिए दुनिया में क्या बचाकर रखा है? बडे़ लोग भी झुके, ग्रेटा की सुनवाई हुई। अगर आम लोग ऐसे आवाज उठाएंगे, तो यकीन मानिए, आगामी दशक उज्ज्वल है।

Rajesh Pandey

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