मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत है.

मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत है.

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

पिछले कुछ समय में शिक्षा से लेकर खेलकूद और विभिन्न प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में बेटियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. महिलाएं जिंदगी के सभी क्षेत्रों में सक्रिय हैं. चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो या फिर शिक्षा, कला-संस्कृति अथवा आइटी या फिर मीडिया का क्षेत्र, सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने सफलता के झंडे गाड़े हैं, लेकिन अब भी समाज में महिलाओं के काम का सही मूल्यांकन नहीं किया जाता है.

घर को सुचारु रूप से संचालित करने में उनके दक्षता की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है. आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के मामले में तो भारत दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले बहुत पीछे है, लेकिन जब भी महिलाओं को मौका मिला है, उन्होंने कमाल कर दिखाया है. कुछ दिनों पहले फोर्ब्स की वर्ष 2020 सूची में दुनिया की 100 सबसे शाक्तिशाली महिलाओं में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण, एचसीएल इंटरप्राइज की सीइओ रोशनी नादर मल्होत्रा और बायोकॉन की संस्थापक किरण मजूमदार शॉ को स्थान दिया गया था.

देश में सफल कारोबार चलाने वाली महिलाओं को देखें, तो शहनाज हर्बल की शहनाज हुसैन, वीएलसीसी की वंदना लूथरा, पार्क होटल की प्रिया पॉल, फैशन डिजाइनर रितु कुमार, लाइम रोड की शुचि मुखर्जी, न्याका की फाल्गुनी नायक, मोबिक्विक की उपासना ताकू मिसाल हैं. यह सूची अंतहीन है. कहने का आशय यह है कि हर क्षेत्र में महिलाएं सक्रिय तो हैं, पर उनकी भागीदारी पुरुषों के मुकाबले बेहद कम है.

उन्हें समान अवसर नहीं मिलते हैं. यह सही है कि परिस्थितियों में बदलाव आया है, पर अब भी ऐसे परिवारों की संख्या कम है, जिनमें बेटे और बेटी के बीच भेदभाव नहीं किया जाता है. यह भेदभाव सार्वजनिक जीवन में प्रकट होने लगता है. भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश के कुल श्रम बल में महिलाओं की हिस्सेदारी 25.5 फीसदी और पुरुषों का हिस्सेदारी 53.26 फीसदी है. कुल कामकाजी महिलाओं में से लगभग 63 फीसदी खेती-बाड़ी में लगी हैं.

जब कैरियर बनाने का समय आता है, तब अधिकांश लड़कियों की शादी हो जाती है. विश्व बैंक के आकलन के अनुसार भारत में महिलाओं की नौकरी छोड़ने की दर बहुत अधिक है. एक बार किसी महिला ने नौकरी छोड़ी, तो ज्यादातर दोबारा नौकरी पर वापस नहीं लौटती हैं.

महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएन वीमेन ने ‘महिलाओं की प्रगति 2019-2020 : बदलती दुनिया में परिवार’ विषय पर तैयार रिपोर्ट में विश्वभर से आंकड़े एकत्र करके परिवारों की मौजूद परंपराओं, संस्कृति और मनोवृत्तियों का अध्ययन किया गया है. इसमें कहा गया है कि दुनियाभर में महिलाओं के वजूद और अधिकारों को नकारने का चलन देखा जा रहा है. हर पांच में से एक देश में लड़कियों को लड़कों के समान संपत्ति और विरासत के अधिकार नहीं हैं.

लगभग 19 देशों में महिलाओं की पति का आदेश मानने की कानूनी बाध्यता है. विकासशील देशों में लगभग एक तिहाई विवाहित महिलाओं को अपने स्वास्थ्य के बारे में खुद निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता है. एक सकारात्मक बात यह सामने आयी है कि दुनियाभर में विवाह की औसत उम्र कुछ बढ़ी है और बच्चों की जन्म दर कुछ कम हुई है. साथ ही कामकाजी दुनिया में मौजूदगी बढ़ी है और उनकी आर्थिक स्वायत्तता में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन महिलाएं पुरुषों के मुकाबले घरेलू कामकाज तीन गुना ज्यादा करती हैं और इसका उन्हें कोई श्रेय नहीं मिलता है.

बेटियों के सामने चुनौती केवल अपने देश में ही नहीं है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में गरीब घरों की हर तीन लड़कियों में से केवल एक लड़की को स्कूल जाने का मौका नहीं मिल पाता है. गरीबी, भेदभाव, स्कूल से दूरी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव जैसी बाधाओं के कारण गरीब घरों की बच्चियां शिक्षा से वंचित रह जाती हैं. समय-समय पर लड़कियों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े होते रहते हैं.

2012 में निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा का सवाल जोरशोर से उठा था. रेप कानूनों को और सख्त करने की मांग हुई. उस पर तत्काल अमल भी किया गया. जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में बनी समिति ने 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंप दी थी और तीन महीने के भीतर संसद ने कड़ा कानून भी बना दिया था. माना जा रहा था कि कड़े कानून से सब कुछ बदल जायेगा, लेकिन राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और दुष्कर्म की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. आंकड़ों के अनुसार देश में 2019 में प्रतिदिन बलात्कार के औसतन 87 मामले दर्ज हुए.

सालभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 4,05,861 मामले दर्ज हुए, जो 2018 की तुलना में सात प्रतिशत अधिक हैं. दरअसल, महिलाओं के खिलाफ अपराध केवल कानून व्यवस्था का मामला भर नहीं है. हमें बेटियों व महिलाओं के प्रति समाज में सम्मान की चेतना जगानी होगी. सामाजिक आंदोलन चलाने होंगे. सबसे बड़ी जिम्मेदारी माता-पिता की है कि वे लड़के और लड़की में भेदभाव न करें.

विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि भेदभाव की एक वजह यह भी है कि लड़कियों को हमेशा परंपरागत भूमिकाओं में दिखाया जाता है. बाद में यह भेदभाव सार्वजनिक जीवन में प्रकट होने लगता है. कुछ अरसा पहले यूनेस्को ने ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें बताया गया था कि स्कूली किताबों में महिलाओं को कम स्थान दिया जाता है. उन्हें कमतर पेशों में दिखाया जाता है. जैसे पुरुष डॉक्टर की भूमिका में दिखाये जाते हैं, तो महिलाएं हमेशा नर्स के रूप में नजर आती हैं.

महिलाओं को हमेशा खाने, फैशन या मनोरंजन से जुड़े विषयों में ही दिखाया जाता है. कुछ वर्ष पहले राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के जेंडर स्टडीज विभाग ने एक रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला था कि पाठ्य पुस्तकों में महिलाओं को कमतर भूमिका में दिखाया जाता है, जबकि पुरुषों को नेतृत्व और फैसले लेने की भूमिका में रखा जाता है.

दरअसल, हमारी सामाजिक संरचना ऐसी है, जिसमें बचपन से ही यह बात बच्चों के मन में स्थापित कर दी जाती है कि लड़का, लड़की से बेहतर है. यह सही है कि परिस्थितियों में भारी बदलाव आया है, लेकिन बेटियों की शिक्षा की अब भी बड़ी चुनौती है. अब भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो यह मानते हैं कि बेटी को ज्यादा पढ़ा-लिखा देने से शादी में दिक्कत हो सकती है.

ऐसे लोगों की भी बड़ी संख्या है, जो बेटी के करियर को ध्यान में रख कर नहीं पढ़ाते, बल्कि शादी को ध्यान में रखकर शिक्षा दिलवाते हैं, जबकि हकीकत यह है कि बेटी का करियर अच्छा होगा, तो शादी में भी आसानी होगी. इस मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत है.

Rajesh Pandey

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