ईरान के लिए यह अस्तित्व का संकट है.

ईरान के लिए यह अस्तित्व का संकट है.

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

ईरान के लोकप्रिय और रणकुशल सेनानायक कासिम सुलेमानी की अमेरिकी राष्ट्रपति के आदेशानुसार हत्या ने अनेक विकट सवाल खड़े कर दिये हैं. सामरिक विशेषज्ञों का ध्यान इस पर ही केंद्रित रहा है कि ईरान की प्रतिक्रिया और प्रतिशोध का दुष्चक्र कहीं हमें सर्वनाशक तृतीय महायुद्ध की कगार तक तो नहीं पहुंचा देगा! हमारी समझ में इससे कम महत्वपूर्ण वह बदलाव नहीं, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय कानून की वह तमाम मान्यताएं ध्वस्त होती नजर आ रही हैं, जिन पर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था टिकी है.
अंतरराष्ट्रीय कानून को कमजोर माननेवाले भी इसकी सीमित उपयोगिता को नकारते नहीं, परंतु इस घड़ी लगता है कि राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता की अवधारणा अब खारिज की जा चुकी है. अमेरिका जैसी महाशक्ति अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी ‘शत्रु’ राज्य पर कहीं भी आक्रमण कर सकती है. ऐसे बलप्रयोग को कहीं आत्मरक्षा के लिए, तो कहीं मानवाधिकारों की रक्षा के बहाने जायज ठहराया जाता है.
ट्रंप लगातार धमकी दे रहे हैं कि वह ईरान को कभी भी एटमी हथियार-संपन्न देश नहीं बनने देंगे. अर्थात इस संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता कि ईरानी नेता, सेनानायक और वैज्ञानिक चालक-रहित विमानों के जरिये मौत के घाट उतारे जाते रहेंगे, जिसके फलस्वरूप मध्य एशिया और पश्चिम एशिया में स्थिति अस्थिर और विस्फोटक बनी रहेगी. तेल की कीमतें निरंतर बढ़ेंगी और भारत के लिए आर्थिक संकट गहराता रहेगा.
ईरान के लिए यह अस्तित्व का संकट है. अमेरिका द्वारा लगाये आर्थिक प्रतिबंध काफी अरसे से युद्धकालीन नाकेबंदी जैसी हालत पैदा कर चुके हैं. उसके सर्वोच्च नेता खामनेई की समस्या इतनी भर नहीं कि वह आर्थिक मंदी की घातक चपेट से अपनी जनता को निरापद रख सकें.
धार्मिक भावावेश या राष्ट्रप्रेम का उन्माद बहुत लंबे समय तक व्यापक असंतोष के उफान को रोक नहीं सकता. ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद वह देश निरंतर युद्धरत रहा है. इराक के साथ बरसों चले युद्ध के अलावा अमेरिका, इजरायल तथा सऊदियों के साथ कई रणक्षेत्रों में यह मुठभेड़ जारी रही है. इराक, सीरिया, लेबनान, यमन सभी जगह ईरान अमेरिका को शूल की तरह गड़ता रहा है. क्या हम यह समझें कि महाभियोग के कटघरे में खड़े ट्रंप ने अपने पुनर्निर्वाचन को सुनिश्चित करने के लिए यह तुरुप चाल चली है?
यह प्रसंग अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं है. यह बात देखने लायक रहेगी कि पुतिन के रूस की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है. सीरियाई बशर अल-असद को रक्षा कवच प्रदान करनेवाले मोर्चे पर ईरान और रूस साथ खड़े हैं. विडंबना यह है कि रूस के सामरिक हितों के संरक्षण के लिए खुद पुतिन पड़ोसी देश में सैनिक हस्तक्षेप में नहीं हिचकते और उन पर भी गुप्तचरों द्वारा अपने शत्रुओं की हत्या करवाने के आरोप लगाये जाते रहे हैं.
चीन जिस रेशम राजमार्ग के पुनर्निर्माण की अति महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम कर रहा है, उसका अधिकतर हिस्सा मध्य-एशियाई गणराज्यों से गुजरता है. इस अभियान में पाकिस्तान उसका साथ दे रहा है और भारत ने इसका मुकाबला करने के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने में सहकारी कार्यक्रम को महत्वपूर्ण समझा है. पिछले कुछ समय से अमेरिकी दबाव में भारत ने ईरान से तेल की खरीद में कटौती की है और चाबहार भी हाशिये पर चला गया है. ईरान के साथ जुड़े तमाम शक्ति समीकरण बदल रहे हैं और ये सभी समीकरण भारत के हितों के प्रतिकूल ही कहे जा सकते हैं.
यहां हम सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित नहीं करना चाहते. ईरान न केवल पश्चिम एशिया से जुड़ा और मध्य-एशिया में स्थित है, बल्कि उसकी सरहद दक्षिण एशिया को छूती है. अफगानिस्तान की उथल-पुथल का दुरुपयोग और ईरान को अस्थिर करने का प्रयास अमेरिका कभी भी कर सकता है.
फिलहाल ईरान की प्रतिक्रिया संयत रही है. उसने जवाबी हमले में सिर्फ अमेरिका के सैनिक ठिकानों को ही निशाना बनाया है. इसका मतलब ट्रंप ने यह निकाला है कि ईरान समर्पण कर चुका है- वह युद्ध नहीं चाहता.
ट्रंप उदारता से ऐलान कर रहे हैं कि विश्व शांति को बरकरार रखने के लिए अमेरिका भी समझौते के लिए तैयार है. हमारी समझ में इसे तर्कसंगत नहीं समझा जा सकता. अधिक संभावना इस बात की है कि विषम युद्ध में माहिर ईरान समुचित अवसर पाते ही वैसे प्रहार करेगा, जैसे उसने सऊदी तेल शोधक संयंत्र और होरमुज की खाड़ी में अमेरिकी तेलवाहक टैंकरों पर किये थे.
भारत के लिए कुछ और भी बातों को याद रखना जरूरी है. पाकिस्तान को परमाण्विक तस्करी के जरिये परमाणु बम संपन्न देश बनानेवाली साजिश में ईरान और चीन एक साथ थे तथा अमेरिका ने जान-बूझकर इसकी अनदेखी की थी. शिया-सुन्नी सांप्रदायिक वैमनस्य की दरार इस भाईचारे में तब आड़े नहीं आयी थी. सवाल है कि जो ताकतवर अमेरिका इस वक्त ईरान के परमाण्विक कार्यक्रम को लेकर इतना आक्रामक है, वह उत्तरी कोरिया के संदर्भ में नरम क्यों होने लगता है?
पश्चिम एशिया में तनाव की स्थिति क्षेत्रीय राजनीति का स्थायी भाव है. राजनयिक सामरिक संकटों का अचानक विस्फोटक रूप धारण करना भी असाधारण नहीं है. इस बार जो बात चिंताजनक है, वह है अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा नाममात्र का प्रतिरोध.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अमेरिका के एकतरफा हस्तक्षेप से बदली व्यवस्था को अनायास स्वाभाविक मानकर स्वीकार कर लिया है. पहले ट्रंप ने पेरिस शिखर सम्मेलन में हासिल पर्यावरण विषयक सहमति को नष्ट किया, उसके बाद वह विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्था को तहस-नहस करने में जुट गये. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित हुई थी. अंतरराष्ट्रीय कानून सम्मत आचरण को प्रतिष्ठित करने के प्रयास आज मृतप्राय हैं.
यह बात भी याद रखने लायक है कि इस सब के लिए ट्रंप को ही खलनायक नहीं माना जा सकता. सोवियत संघ के विखंडन और पुतिन की तानाशाही के आविर्भाव ने भी अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को विचलित किया है.
ट्रंप के पूर्ववर्ती उदार ओबामा भी अमेरिकी राष्ट्रहित को ही सर्वोपरि रखते थे. सार्वभौमिक हित इन्हीं महाशक्तियों के स्वार्थों के अनुसार परिभाषित किये जाते रहे हैं. इसलिए इस वक्त भारत की प्राथमिकता ईरान के बहाने अंतरराष्ट्रीय अराजकता और अव्यवस्था के संकट की चुनौती से जूझने की नयी रणनीति तलाशने की होनी चाहिए.

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