पहली पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि – अक्षयवर दीक्षित  कर्मठता के पर्याय – डॉ जीतेन्द्र वर्मा

पहली पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि – अक्षयवर दीक्षित  कर्मठता के पर्याय – डॉ जीतेन्द्र वर्मा

श्रीनारद मीडिया‚ सेंट्रल डेस्क:

हिंदी , भोजपुरी और संस्कृत के प्रसिद्ध लेखक और एक आदर्श शिक्षक अक्षयवर दीक्षित का पिछले वर्ष 13 जनवरी को नब्बे वर्ष की अवस्था मे उनका निधन हो गया ।
अक्षयवर दीक्षित की गिनती भोजपुरी भाषा – साहित्य के आरंभिक उन्नायकों में होती है । 1947 में सीवान में हुए पहले भोजपुरी साहित्य सम्मेलन में उन्होंने एक स्वयंसेवक के रूप में भाग लिया था । तब से वे भोजपुरी के विकास में लग गए । उनके नेतृत्व में 1977 में सीवान की धरती पर अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का तीसरा अधिवेधन भगवतशरण उपाध्याय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ । भोजपुरी भाषा – साहित्य के इतिहास में यह ऐतिहासिक अधिवेशन माना जाता है ।

हाथ में पुस्तक लिए अक्षयवर दीक्षित व डा० जितेन्द्र वर्मा

तब किसी को विश्वास नहीं था कि भगवतशरण उपाध्याय जैसा विश्व विख्यात व्यक्ति भोजपुरी सम्मेलन की अध्यक्षता करेगा । उन्हें अध्यक्ष बनाने की योजना दीक्षित जी ने बनाई थी । भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के मुख्य कर्ताधर्ता पांडेय कपिल को लगता था कि वे अध्यक्ष बनने के लिए राजी ही नहीं होंगे । उन्होंने कहा कि वैसे व्यक्ति सीवान में ठहरेंगे कहाँ ?पांडेय कपिल के विचार के पीछे ठोस आधार था ।
परंतु दीक्षित जी ने इसके लिए भोजपुरी के लेखक लक्ष्मीशंकर त्रिवेदी से मिलकर एक सुनियोजित योजना बनाई थी । त्रिवेदी जी उपाध्याय जी के पारिवारिक पुरोहित थे । उन्होंने एक दिन उपाध्याय जी से भावुक होकर कहा –
” रउवा त हमरा के तनिको ना मानीले !”
उपाध्याय जी ने हतप्रभ हो कर कहा – ” अइसन बात त नइखे ।”
इस पर त्रिवेदी जी ने झट से पूछा – “त हमरा कहला से एक जगे चलेम ?”
उपाध्याय जी ने बिना कुछ सोचे समझे जल्दी से हाँ कह दिया ।बाद में उन्हें मालूम हुआ कि भोजपुरी सम्मेलन में सीवान जाना है । खैर वे पूरे मन से भोजपुरी सम्मेलन में सीवान आएं और शानदार भाषण दिया ।

विद्‍यार्थी जीवन में जितेन्द्र वर्मा के साथ अक्षयवर दीक्षित

उनके स्वागत में कोई कमी नहीं हुई । उनके ठहरने की व्यवस्था सीवान के डॉक्टर बी. एल. दास के यहाँ किया गया । डॉ. बी. एल. दास का बंगला और लॉन शानदार था । वहाँ उनका भरपूर स्वागत हुआ । भगवतशरण उपाध्याय वहाँ से बहुत प्रभावित होकर लौटे । वापस जाकर उन्होंने डॉ.बी. एल. दास की पत्नी श्रीमती आशा दास को धन्यवाद का एक आत्मीयता से भरा लंबा पत्र लिखा । यह पत्र दीक्षित जी के संपादन में प्रकाशित पुस्तक भोजपुरी सेवी महिला में संकलित है ।
इस अधिवेशन में तीन सौ से अधिक प्रतिनिधि आए । इसमें एक स्तरीय स्मारिका प्रकाशित हुई थी ।अधिवेशन में से बचे रुपयों से उन्होंने भोजपुरी विकास मंडल की स्थापना की जो भोजपुरी पुस्तकों पर पुरस्कार देती है ।
उन्होंने भोजपुरी और हिंदी के साथ – साथ संस्कृत में भी लेखन किया । उनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं – अंगऊ (भोजपुरी गद्य – पद्य संग्रह ) , सतहवा (भोजपुरी कहानी – संग्रह ) श्रद्धांजलि (हिंदी निबंध – संग्रह ) , भोजपुरी निबंध (भोजपुरी निबंध – संग्रह ) भोजपुरी के सपूत (भोजपुरी निबंध – संग्रह ) , और कंपनी काँपती रही (हिंदी उपन्यास ) ,विमर्श (हिंदी निबंध – संग्रह ) भोजपुरी सुभाव ( भोजपुरी निबंध – संग्रह ) सीमा संस्कृत – सौरभ ( संस्कृत बाल – व्याकरण ) । उनके संपादन में प्रकाशित प्रमुख पुस्तकें हैं – भोजपुरी – सेवी महिला (भोजपुरी निबंध – संग्रह ), डुमरी कतेक दूर (भोजपुरी निबंध – संग्रह ) आजादी फतेहबहादुर शाही (हिंदी निबंध – संग्रह ) और भोजपुरी माटी के संत राजनेता । इसके अलावा उनकी रचनाएँ कई पुस्तकों में संकलित हैं । उनकी प्रतिनिधि कहानी रहिनदार पतोह है । यह कहानी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘ बड़े घर की बेटी ‘ की तरह आदर्शोन्मुख है ।
बाहर से कठोर दिखने वाले दीक्षित जी भीतर से बड़े भावुक थे । इसकी पुष्टि उनके रचनाओं से होती है ।अपनी पहली पुस्तक अंगऊ महेंद्र शास्त्री को समर्पित करते हुए उन्होंने लिखा –
” अलबेलापन में त हमरा दाख मिलल ,
जिनगी के अरमान सजल , पर राख मिलल ,
सचहूँ दुनिया सुन भइल हमरा खातिर ,
जीये लायक शास्त्रीजी से साख मिलल ।।”
उनके जीवन में एक बड़ा दुःखद क्षण आया जब शादी के कुछ ही वर्षों के बाद उनके छोटे दमाद का निधन हो गया । उन्होंने अपनी पुस्तक भोजपुरी निबंध उन्हें समर्पित करते हुए लिखा –
हमरा हाथे जेकरा माथे अक्षत फूल छिटाइल
ओहि कल्पनाथ खातिर कल्प कल्प के दिन बीते ।

उनका जन्म 2 जुलाई 1930 में गोपालगंज के दीक्षितौली गाँव में हुआ था । सीवान डी. ए. वी. उच्च विद्यालय में वे शिक्षक बने । वे एक कर्मठ शिक्षक थे । उन्होंने विद्यालय का माहौल हरदम शैक्षणिक बनाए रखा । उनके संपादन में विद्यालय पत्रिका निकलती थी । जो स्तरीय होती थी ।छात्रों के साथ वे बाहर से बड़ा कठोर रहते थे । शिक्षण पद्धति में वे रटन्त पद्धति के पक्ष में रहते थे । उनका मानना था कि कोई बात छात्र को रटा देना चाहिए । समय आने पर वह स्वयं समझ जाएगा ।

वे उदार विचारों वाले थे ।स्वंय उनका झुकाव दक्षिणपंथ की ओर था परंतु उन्होंने सबको अपनाया । और यही कारण था कि उनको भी सबने अपनाया । मार्क्सवादी कवि कन्हैया उन्हें बहुत मानते थे । दीक्षित जी ने अपने निबंध संग्रह ‘ श्रद्धांजलि ‘में उनपर लेख भी लिखा है । सीवानवासियों को प्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक मैनेजर पांडेय से परिचित कराने का श्रेय उन्हीं को है । उन्होंने ने ही सबसे पहले सीवान जिला भोजपुरी साहित्य सम्मेलन का उदघाटन करने के लिए बुलाया । अपने संपादन में प्रकाशित निबंध – संग्रह डुमरी कतेक दूर की लंबी भूमिका उनसे लिखवाई । इसी भूमिका का अंग्रेजी अनुवाद बाद में साहित्य अकादमी की अंग्रेजी पत्रिका ‘ इंडियन लिटरेचर ‘ के भोजपुरी विशेषांक में प्रकाशित हुआ । जो कबीर को भोजपुरी का आदि कवि कहे जाने के कारण चर्चा में रहा । मैनेजर पांडेय के कहने पर वे फतेहबहादुर शाही के इतिहास को प्रकाश में लाने के अभियान में लग गए । अपने स्वयं एक उपन्यास ‘ और कंपनी काँपती रही ‘ लिखा और लोगो से लेख लिखवाकर ” भारतीय स्वातन्त्र्य संग्राम के वीर नायक ” नाम से एक पुस्तक संपादित की । उन्हीं के प्रेरणा से तैयब हुसैन पीड़ित ने हिंदी में और सुरेश कांटक ने भोजपुरी में फतेहबहादुर शाही पर नाटक लिखा । इन दोनों नाटकों को प्रकाशित करने के लिए आर्थिक संसाधन उन्होंने दौड़ -धूप कर जुटाया।
वे विश्व हिंदू परिषद के लंबेकाल तक जिलाध्यक्ष थे परंतु कभी कूपमण्डूकता या कट्टरता के शिकार नहीं हुए । यही कारण है कि उन्होंने तैयब हुसैन पीड़ित को अपने मकान में रहने के लिए आमंत्रित किया । तैयब हुसैन उन्हें सबसे प्रिय थे । निधन के कुछ दिनों पहले जब मैं उनसे मिलने गया था तो उन्होंने अपनी लटपटी वाणी में तैयब हुसैन से मिलने की उत्कट अभिलाषा व्यक्त की थी पर यह पूरी नहीं हो पाई । सीवान स्थित उनका घर साहित्य का केंद्र था । नए – पुराने , वाम – दक्षिण – समाजवादी – सभी वहाँ जुटते । जवाहर लाल नेहरू के साहित्यकार रूप पर उन्होंने लेख लिखा । उनका मानना था कि राजनीति में आने से नेहरू का साहित्यिक पक्ष कमजोर हो गया । उनकी ऐसी उदारता विश्व हिंदू परिषद के लोगो को पसंद नही आती , उन्होंने बाद में दीक्षित जी को जबरन अध्यक्ष पद से हटा दिया था ।
वे सबको सही राह बताते थे । उनकी सलाह कड़वी भी होती थी । कई लोग नाराज हो जाते थे परंतु उन्होंने मरते दम तक अपना स्वभाव नहीं बदला । वे घर – परिवार या बाहर कही भी झुके नहीं भले टूट गए।
वे कई मोर्चो पर सक्रिय रहते थे । साहित्य , शिक्षा ,धर्म तथा समाज के अन्य क्षेत्रों में उनका हस्तक्षेप रहता था । उन्हीं के योजना के अनुसार हिंदी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के नाम पर सीवन के निराला नगर का नाम रखा गया । इसी नगर में उनका घर और बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ का भवन है ।
उनके आँखों की रोशनी 1990 में ही चली गई पर वे लेखन में लगे रहे । अंतिम वर्षों में उन्हें सुनाई भी कम देता था । शरीर थक चुका था परंतु साहित्य के प्रति ललक बरकरार थी। जब अंतिम दिनों में मैं उनसे मिलने गया था तो उन्होंने मुझसे लेखन के बारे में ही पूछा । इधर कौन – कौन सी पुस्तक छपी है ?तुमने इधर कौन – कौन सी पुस्तक पढ़ी ? कौन क्या लिख रहा है ? – जैसे प्रश्न उन्होंने पूछे ।
उन्हें नमन है ।

आलेख

डा० जितेन्द्र वर्मा

* वर्मा ट्रांसपोर्ट , राजेन्द्र पथ
राजेन्द्र पथ , सीवन – 841226

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