क्या कहते हैं शादी के सात वचन

क्या कहते हैं शादी के सात वचन

पति पत्नी दोनों एक दूसरे के हैं पूरक

श्रीनारद मीडिया, लक्ष्‍मण सिंह, बाराबंकी (यूपी):

हिंदू धर्म में शादी को एक वैवाहिक अनुबंध माना गया है दोनों एक दूसरे के पूरक हैं जिनके अभाव में मानव जीवन के मूल्यों की कल्पना नहीं की जा सकती है।

हिंदू धर्म में शादी को जीवन का अभिन्न अंग माना गया है किंतु ऐसा हरगिज़ नहीं है कि हिंदू धर्म की शादियों में वर पक्ष को ज्यादा अहमियत प्रदान की गई हो किसी भी हिंदू शादी को उस समय पूर्ण माना जाता है जब उसमें पति पत्नी सात वचन निभाने का वादा करते हैं ये सात वचन मात्र वचन नहीं अपितु आगामी दांपत्य जीवन की रूपरेखा तय करते हैं

हिंदू विवाह में पत्नी पहले वचन में अपने भावी पति से मांगती है कि पति भविष्य में कभी भी कोई धार्मिक शुभ काम करेगा तो पति पत्नी को साथ में रखेगा पहला वचन यह बताता है कि जिस धर्म अनुष्ठान को पति पत्नी मिलकर करते हैं वही सुखद व फलदायक होता है दूसरे वचन में पत्नी पति से अपने माता पिता के लिए वही सम्मान और प्यार मांगती है जो पति अपने माता पिता को देता है दरअसल यह वचन कन्या की दूरदर्शिता को दर्शाते हुए बतलाता है कि यदि पति भी पत्नी के घरवालों को बराबर का सम्मान दे तो आपसी रिश्ते सहज और सरल हो जाते हैं तीसरे वचन में पत्नी पति से आगामी जीवन की प्रत्येक अवस्था में अपना और उसका साथ सुनिश्चित करती है चौथे वचन में पत्नी पति से जिम्मेदारी और परिपक्वता की इच्छा करते हुए उससे उसके स्वयं और उसके परिवार के भरण-पोषण को सुनिश्चित करने का वचन मांगती है।

पांचवे वचन में पत्नी पति से उनके भावी परिवार में होने वाले खर्चों को सुनिश्चित और तर्कसंगत करने और उनमें अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग करती है छठे वचन में पत्नी पति से अपना सम्मान बनाए रखने की इच्छा जताती है और किसी भी अन्य व्यक्ति के सामने उसे अपमानित न करने का वचन लेती है

सातवें और अंतिम वचन में पत्नी पति से वफादारी की अपेक्षा रखते हुए मांगती है कि पति किसी भी स्त्री को यदि वह बड़ी है तो मां और यदि छोटी है तो बहन के समान मानेगा ।

शादी के सात वचन दर्शाते हैं कि हिंदू धर्म में स्त्रियों की स्वतंत्रता स्वाभिमान निजता और सम्मान को सुनिश्चित किया गया है और उसको पूर्ण अधिकार है कि वह किसी व्यक्ति को अपना पति स्वीकार करें जो ये सात वचन निभाने के लिए तैयार हो दरअसल ये वचन मात्र वचन नहीं है अपितु संकल्प है जो एक व्यक्ति को उसकी जिम्मेदारियों का अनुभव कराते हैं कोई भी परिवार तभी खुश रह सकता है जब पति पत्नी को दिए इन वचनों का निर्वाह पूरी सच्चाई और ईमानदारी से करें तब जाकर कहीं एक विवाह पूर्ण विवाह बन सकता है और उसका भविष्य खुशहाल व सुखमय हो सकता है।

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