पाक ने क्यों रची भारत के खिलाफ साजिश?
ऑपरेशन चंगेज खान क्या था?
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क
भारत से अलग होने के बाद पाकिस्तान हमेशा से ही देश के खिलाफ साजिश रचता रहा है। फिर वह 1947 में कश्मीर में कबाली हमला हो या फिर पिछले साल पहलगाम में हुआ आतंकी हमला। इसी तरह पाकिस्तान ने 1971 में भी भारत के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश रची थी, जिसे नाम दिया गया था ऑपरेशन चंगेज खान।
Operation Chengiz Khan (ऑपरेशन चंगेज खान) पाकिस्तान द्वारा किया गया एक सैन्य हवाई हमला था, जो 3 दिसंबर 1971 की शाम को शुरू हुआ। यही हमला आगे चलकर 1971 के भारत-पाक युद्ध (जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश बना) की औपचारिक शुरुआत माना जाता है।
पाकिस्तान ने क्यों रची भारत के खिलाफ साजिश?
इस युद्ध की जड़ें पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के राजनीतिक संकट में थीं। मार्च 1971 में पाकिस्तान सेना द्वारा बंगाली राष्ट्रवादियों पर बड़े पैमाने पर दमन और क्रूर कार्रवाई के बाद लाखों शरणार्थी भारत आ गए, जिससे एक बड़ा मानवीय और सुरक्षा संकट पैदा हो गया। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को समर्थन देने के फैसले से पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ गया, जिससे दिसंबर तक पूरी तरह से युद्ध का माहौल बन गया।
रणनीतिक पहल करने के लिए इस्लामाबाद ने हवा में पहले हमला करने की योजना बनाई। इस उम्मीद में कि भारत के एयर बेस को नुकसान पहुंचाने से किसी भी तेज भारतीय हमले को रोका जा सकेगा। ऑपरेशन चंगेज खान की रणनीति पाकिस्तान की सेना की 1973 या 1967 के मिडिल ईस्ट के सरप्राइज हमलों को कुछ हद तक दोहराने की कोशिश थी, जिन्होंने मिडिल ईस्ट के संघर्षों को नया रूप दिया था लेकिन दक्षिण एशियाई संदर्भ में।
ऑपरेशन चंगेज खान क्या था?
यह पाकिस्तान की वायुसेना (PAF) का पूर्व-नियोजित एयर स्ट्राइक ऑपरेशन था। इसका उद्देश्य था भारतीय वायुसेना (IAF) को अचानक हमलों से कमजोर करना, ताकि भारत युद्ध में बढ़त न ले सके। यह रणनीति इजराइल के 1967 के Six-Day War के “Operation Focus” से प्रेरित थी।
कब और कहां हमला हुआ?
3 दिसंबर 1971, शाम करीब 5:45 बजे पाकिस्तान ने एक साथ भारत के कई एयरबेस पर हमले किए, जिनमें प्रमुख थे:
- अमृतसर
- पठानकोट
- आदमपुर
- आगरा
- हलवारा
- जोधपुर
- सिरसा
- उत्तरलाई
क्या नुकसान हुआ?
- पाकिस्तान का मकसद था कि भारत के लड़ाकू विमान और रनवे नष्ट कर दिए जाएं।
- लेकिन यह ऑपरेशन अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाया।
- भारतीय एयरबेस को सीमित नुकसान हुआ और भारतीय वायुसेना बहुत जल्दी सक्रिय हो गई।
भारत की प्रतिक्रिया
उसी रात भारत ने पूरे पश्चिमी और पूर्वी मोर्चे पर जवाबी हमले शुरू कर दिए।
अगले 13 दिनों में भारत ने निर्णायक बढ़त बनाई।
16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की पूर्वी सेना ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश का गठन हुआ।
नाम “Chengiz Khan” क्यों?
पाकिस्तान ने इस ऑपरेशन का नाम मंगोल शासक चंगेज़ ख़ान के नाम पर रखा, जो अचानक और आक्रामक हमलों के लिए जाना जाता था।
संक्षेप में
ऑपरेशन Chengiz Khan = पाकिस्तान का पहला हमला
तारीख = 3 दिसंबर 1971
नतीजा = रणनीतिक असफलता
परिणाम = 1971 का युद्ध और बांग्लादेश का जन्म
आने वाली फिल्म ‘बॉर्डर 2’ एक बार फिर उसी दौर की कहानी को बड़े पर्दे पर लाने जा रही है। 1997 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म बॉर्डर का यह सीक्वल है, जिसकी पृष्ठभूमि भी 1971 का भारत–पाकिस्तान युद्ध ही है। बॉर्डर 2 के ट्रेलर से साफ हो चुका है कि इसमें पाकिस्तान के ऑपरेशन चंगेज़ खान की कहानी दिखाई जाएगी। आइए, इसी ऑपरेशन की पूरी कहानी समझते हैं और जानते हैं कि कैसे भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान की साजिशों को नाकाम कर दिया था।
पाकिस्तान की साजिश और ऑपरेशन चंगेज़ खान
1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने एक नापाक साजिश रची। जैसलमेर सेक्टर में उसने करीब 2,000 सैनिकों और टैंकों का एक बड़ा बेड़ा तैनात कर दिया। योजना यह थी कि किसी भी कीमत पर रामगढ़ और जैसलमेर पर कब्ज़ा कर लिया जाए। आसपास के इलाकों में यह अफवाह तक फैला दी गई थी कि 4 दिसंबर को पाकिस्तानी सैनिक जैसलमेर में नाश्ता करेंगे। यह उनके अति-आत्मविश्वास को दिखाता था।
इसी कड़ी में 3 दिसंबर 1971 को भारत के कई हवाई ठिकानों पर हमला किया गया। माना जाता है कि यहीं से पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से ऑपरेशन चंगेज़ खान की शुरुआत की। उस समय जैसलमेर के लोंगेवाला पोस्ट के प्रभारी मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी थे। शुरुआती घंटों में पाकिस्तान की इस बड़ी साजिश की पूरी जानकारी भारतीय पक्ष को नहीं थी।
मेजर चांदपुरी ने कैप्टन धर्मवीर सिंह के नेतृत्व में कुछ जवानों को आगे भेजकर हालात की पड़ताल करने को कहा। सैनिक आगे बढ़े और उन्हें टैंकों जैसी आवाज़ें सुनाई दीं, लेकिन अंधेरे में यह साफ नहीं हो पा रहा था कि वे टैंक हैं या किसी अन्य वाहन की हलचल। एक इंटरव्यू में कैप्टन धर्मवीर सिंह ने बताया था कि उन्होंने इस गतिविधि की जानकारी कंपनी कमांडर मेजर चांदपुरी को दी, लेकिन उस वक्त तक स्थिति उतनी गंभीर नहीं लग रही थी और जवानों को आराम करने को कहा गया।
लोंगेवाला की रात और निर्णायक मोड़
रात करीब 12 बजे के बाद पाकिस्तानी टैंक साफ दिखाई देने लगे। उनकी रफ्तार धीमी थी और उन्होंने अंधेरे में अपनी लाइटें बंद कर रखी थीं। बताया जाता है कि पाकिस्तान ने सड़क की बजाय रेगिस्तान का रास्ता चुना था, इसी वजह से टैंकों की गति कम हो गई।
सुबह करीब 4 बजे तक यह साफ हो गया कि पाकिस्तान के कई टैंक भारतीय सीमा में घुस चुके हैं और लोंगेवाला पोस्ट की ओर बढ़ रहे हैं। मेजर चांदपुरी ने तुरंत बटालियन मुख्यालय को सूचना दी और अतिरिक्त हथियारों की मांग की। कुछ देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोलाबारी शुरू कर दी, लेकिन अचानक वे आगे बढ़ने के बजाय रुक गए। दरअसल, अंधेरे में उन्हें आगे बिछी कंटीली तारों और संभावित बारूदी सुरंगों में अंतर ही समझ नहीं आ रहा था, उस खौफ में टैंकर वहीं रुक गए।
वायुसेना की एंट्री और युद्ध का पासा पलटा
इस निर्णायक रात का ज़िक्र एयर मार्शल (डॉ.) पी. वी. नाथ थापलियाल की किताब The 1971 War: A Military History में विस्तार से मिलता है। किताब के मुताबिक, जैसे ही सुबह की पहली किरण पड़ी, पाकिस्तानी सेना ने जोरदार हमला किया और कई भारतीय चौकियों को निशाना बनाया।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ सैन्य अधिकारी तुरंत हरकत में आए। यह समझ लिया गया कि सिर्फ थलसेना के सहारे इस हमले को रोका जाना मुश्किल होगा। इसी बीच जैसलमेर एयरबेस से भारतीय वायुसेना को सक्रिय किया गया। उस समय वहां हंटर विमान मौजूद थे। जैसे ही दिन चढ़ा, भारतीय वायुसेना ने मोर्चा संभाल लिया।
हंटर विमानों ने पाकिस्तानी टैंकों पर सटीक हमले किए। पाकिस्तानी सेना के लिए यह पूरी तरह अप्रत्याशित था। ब्रिगेडियर जेड. ए. खान, जो पाकिस्तान की 18 कैवेलरी रेजीमेंट के कमांडर थे, उन्होंने अपनी किताब The Way It Was: Inside the Pakistani Army में लिखा है कि उस सुबह करीब 7:30 बजे अचानक भारतीय विमानों ने हमला कर दिया और पूरा इलाका धुएँ से भर गया।
भारतीय वायुसेना के इन हमलों में पाकिस्तान के 17 टैंक एक ही दिन में तबाह हो गए, जबकि दर्जनों अन्य सैन्य वाहन भी नष्ट हो गए। बताया जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहला मौका था जब किसी देश ने एक ही दिन में इतने टैंक गंवाए।
लोंगेवाला: इतिहास में दर्ज साहस की कहानी
इस युद्ध का नतीजा साफ था-जमीन पर भारतीय सैनिकों की जिद और आकाश में वायुसेना की ताकत ने मिलकर पाकिस्तान के ऑपरेशन चंगेज़ खान को पूरी तरह विफल कर दिया। लोंगेवाला की लड़ाई भारतीय सैन्य इतिहास में साहस, रणनीति और समन्वय की मिसाल बन गई।
इस युद्ध में असाधारण वीरता दिखाने के लिए मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। आज भी लोंगेवाला की कहानी भारतीय सेना की जुर्रत और जज़्बे की पहचान मानी जाती है और बॉर्डर 2 उसी इतिहास को एक बार फिर नई पीढ़ी के सामने लाने जा रही है।

