03 फरवरी 📜 स्वतंत्रता सेनानी ‘सुहासिनी गांगुली’ की जयंती पर विशेष
श्रीनारद मीडिया, सेंट्रल डेस्क:

जन्म : 03 फरवरी 1909
मृत्यु : 23 मार्च 1965
सुहासिनी गांगुली का जन्म 03 फरवरी 1909 को ढाका के विक्रमपुर जिला अंतर्गत बाघिया नामक गाँव के रहने वाले अविनाश चन्द्र गांगुली और सरलासुन्दरी देवी के यहां हुआ। सुहासिनी की पूरी पढ़ाई ढाका के ईडन हाईस्कूल व ईडन काॅलेज से हुई। एक बार तैराकी स्कूल में उनकी मुलाकात कल्याणी दास और कमला दासगुप्ता से हुआ और फिर वे क्रांतिकारी दल का साथ देने के लिए प्रशिक्षण लेने लगीं। वर्ष 1929 में विप्लवी दल के नेता रसिक लाल दास से परिचय होने के बाद तो वह पूरी तरह से दल में सक्रिय हो गईं। इसके लिए हेमन्त तरफदार ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया।
>> शिक्षण <<
वर्ष 1930 में सुहासिनी गांगुली कलकत्ता में गूंगे-बहरे बच्चों के एक स्कूल में कार्य कर रहीं थीं। उन्हीं दिनों ‘चटगांव शस्त्रागार कांड’ के बाद क्रांतिकारी ब्रिटिश पुलिस की धर-पकड़ से बचने के लिए चन्द्रनगर को पलायन कर गए, तो सुहासिनी गांगुली भी क्रांतिकारियों को सुरक्षा के लिए कलकत्ता से चंद्रनगर आ गईं। चन्द्रनगर पहुँचकर उन्होंने वहीं के एक स्कूल में अध्यापन-कार्य ले लिया। शाम से सुबह तक वह क्रांतिकारियों की सहायक उनकी प्रिय सुहासिनी दीदी थीं। दिन भर एक समान्य अध्यापिका के रूप में काम पर जाती थीं और घर में शशिधर आचार्य की छद्म पत्नी बनकर रहती थीं ताकि किसी को संदेह न हो और यह घर एक सामान्य गृहस्थ का घर लगे और वह क्रांतिकारियों को सुरक्षा भी दे सकें। गणेश घोष, लोकनाथ बल, जीवन घोषाल, हेमन्त तरफदार आदि क्रांतिकारी बारी-बारी से यहीं आकर ठहरते।
>> गिरफ़्तारी <<
इतना कुछ करने के बाद भी ब्रिटिश अधिकारियों को सुहासिनी गांगुली पर संदेह हो गया। उस घर पर चौबीसों घंटे निगाह रखी जाने लगी। एक दिन यानी 1 सितम्बर, 1930 को उस मकान पर घेरा डाल दिया गया। आमने-सामने की मुठभेड़ में जीवन घोषाल मारे गए और अनन्त सिंह ने आत्म समर्पण कर दिया। शेष साथी और सुहासिनी गांगुली अपने तथाकथित पति शशिधर आचार्य के साथ गिरफ्तार हो गईं। उन्हें हिजली जेल भेज दिया गया, जहाँ इन्दुमति सिंह पहले से ही थीं। आठ साल की लम्बी अवधि के बाद वे वर्ष 1938 को रिहा हो गईं।
>> अन्त में <<
वर्ष 1942 के आन्दोलन में उन्होंने फिर से अपनी भूमिका निभाई और फिर से जेल गईं। इस बार वे वर्ष 1945 में जेल से बाहर आईं। उस समय हेमन्त तरफदार धनबाद के एक आश्रम में संन्यासी के भेष में रह रहे थे। रिहाई के बाद सुहासिनी गांगुली भी उसी आश्रम में पहुँच गईं और आश्रम की ममतामयी सुहासिनी दीदी बनकर वहीं रहने लगीं। 23 मार्च, 1965 यानी मृत्यु आने तक के बाकी का सारा जीवन उन्होंने इसी आश्रम में बिताया।
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