03 फरवरी 📜 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) की स्थापना दिवस पर विशेष
श्रीनारद मीडिया, सेंट्रल डेस्क:

स्थापना : 03 फरवरी, 1916
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में स्थित एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है. इसे प्रायः बीएचयू (बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी) कहा जाता है. इस विश्व विद्यालय की स्थापना (वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय एक्ट, एक्ट क्रमांक 16, सन् 1915) महामना पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा सन् 1916 में बसंत पंचमी के पुनीत दिवस पर की गई थी.
दरभंगा के महाराजा रामेश्वर सिंह ने विश्वविद्यालय की स्थापना में आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था दान देकर की. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी जिसका ‘आदर्श वाक्य’ है :
विद्ययाऽमृतमश्नुते
अर्थात् : विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है।
इस विश्वविद्यालय की विद्यार्थी संख्या 35000 अनुमानित है. संप्रति इस विश्वविद्यालय के दो परिसर हैं.
मुख्य परिसर (1300 एकड़) वाराणसी में स्थित है जिसकी भूमि काशी नरेश ने दान की थी. मुख्य परिसर में 6 संस्थान् , 14 संकाय और लगभग 140 विभाग है.
विश्वविद्यालय का दूसरा परिसर मिर्जापुर जनपद में बरकछा नामक स्थान (2700 एकड़) पर स्थित है. 75 छात्रावासों के साथ यह एशिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है जिसमें 30,000 से अधिक छात्र अध्ययनरत हैं जिनमें लगभग 34 देशों से आये हुए छात्र भी शामिल हैं.
मुख्य परिसर के प्रांगण में भगवान विश्वनाथ का एक विशाल मंदिर भी है. सर सुंदरलाल चिकित्सालय, गोशाला, प्रेस, बुक-डिपो एवं प्रकाशन, टाउन कमेटी (स्वास्थ्य), पी.डब्ल्यू.डी., स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की शाखा, पर्वतारोहण केन्द्र, एन.सी.सी. प्रशिक्षण केंद्र, ”हिन्दू यूनिवर्सिटी” नामक डाकखाना एवं सेवायोजन कार्यालय भी विश्वविद्यालय तथा जनसामान्य की सुविधा के लिए इसमें संचालित हैं.
श्री सुन्दरलाल, पं. मदनमोहन मालवीय, डॉ. एस. राधाकृष्णन् (भूतपूर्व राष्ट्रपति), डॉ. अमरनाथ झा, आचार्य नरेन्द्रदेव, डॉ. रामस्वामी अय्यर, डॉ. त्रिगुण सेन (भूतपूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री) जैसे मूर्धन्य विद्वान यहाँ के कुलपति रह चुके हैं.
विश्वविद्यालय के प्रवेशद्वार के ठीक बाहर मालवीय जी की प्रतिमा स्थापित है.
>> विश्वविद्यालय के उद्देश्य निम्नलिखित हैं <<
(1) अखिल जगत की सर्वसाधारण जनता के, एवं मुख्यतः हिन्दुओं के, लाभार्थ हिन्दूशास्त्र तथा संस्कृत साहित्य की शिक्षा का प्रसार करना, जिससे प्राचीन भारत की संस्कृति और उसके उत्तम विचारों की रक्षा हो सके, तथा प्राचीन भारत की सभ्यता में जो कुछ महान तथा गौरवपूर्ण था, उसका निदर्शन हो.
(2) सामान्यतः कला तथा विज्ञान की समस्त शाखाओं में शिक्षा एवं अनुसन्धान को बढ़ावा देना.
(3) भारतीय घरेलू उद्योगों की उन्नति और भारत की द्रव्य-सम्पदा के विकास में सहायक आवश्यक व्यावहारिक ज्ञान से युक्त वैज्ञानिक, तकनीकी तथा व्यावसायिक ज्ञान का प्रचार और प्रसार करना.
(4) धर्म तथा नीति को शिक्षा का आवश्यक अंग मानकर नवयुवकों में सुन्दर चरित्र का गठन करना.
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