भाजपा के लिए आरएसएस फैसले नहीं लेता- मोहन भागवत
देश के सभी वर्गों को एकसूत्र में जोड़ने का काम करेगा संघ
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर समझाया है कि अपने घरों में अपनी भाषा, परंपरा, वेशभूषा और संस्कृति बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि तकनीक और आधुनिकता शिक्षा के विरोधी नहीं हैं। शिक्षा केवल जानकारी नहीं है; यह व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के बारे में है। नई शिक्षा नीति में पंचकोसीय शिक्षा के प्रावधान शामिल हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) सही दिशा में एक कदम है।
बेहतर समाज का निर्माण
संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आरएसएस द्वारा 100 वर्ष की संघ यात्रा – ‘नए क्षितिज’ के तहत अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। गुरुवार को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने परिवार को एकजुट करने के तरीके भी बताए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में शामिल होकर सामाजिक एकता मजबूत होती है, साथ ही प्रेम और करुणा बढ़ती है।
कानूनी व्यवस्था पर भरोसा
संघ प्रमुख ने कहा कि विवाद या भड़काऊ स्थिति में कानून हाथ में नहीं लेना चाहिए, बल्कि कानूनी व्यवस्था पर भरोसा करना चाहिए। हमारे देश की विविध संस्कृति में विभिन्न जाति, पंथ, और समुदाय के लोग रहते हैं. इन सबके बीच सौहार्द बनाए रखने और संबंध मजबूत करने के लिए एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में सम्मिलित होना बहुत जरूरी है।
समाज में समरसता
उन्होंने समझाया कि ऐसा करने से सामाजिक दूरियां घटती हैं और विश्वास बढ़ता है। इसके साथ ही समाज में प्रेम और करुणा की भावना पनपती है। दूसरों की खुशियों में शामिल होने से समाज में समरसता आती है और आपसी भेद-भाव कम होते हैं।
कहीं कोई झगड़ा नहीं: आरएसएस प्रमुख
संघ प्रमुख ने कहा, ‘हमारा हर सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों, दोनों के साथ अच्छा समन्वय है। लेकिन कुछ व्यवस्थाएं ऐसी भी हैं, जिनमें कुछ आंतरिक विरोधाभास हैं। कुल मिलाकर व्यवस्था वही है, जिसका आविष्कार अंग्रेजों ने शासन करने के लिए किया था। इसलिए, हमें कुछ नवाचार करने होंगे। फिर, हम चाहते हैं कि कुछ हो। भले ही कुर्सी पर बैठा व्यक्ति हमारे लिए पूरी तरह से समर्पित हो, उसे यह करना ही होगा और वह जानता है कि इसमें क्या बाधाएं हैं। वह ऐसा कर भी सकता है और नहीं भी। हमें उसे वह स्वतंत्रता देनी होगी। कहीं कोई झगड़ा नहीं है।’
उन्होंने कहा कि यह सच नहीं है कि आरएसएस भाजपा के लिए फैसले लेता है। जेपी नारायण से लेकर प्रणब मुखर्जी तक, लोगों ने हमारे बारे में अपना नजरिया बदला है। इसलिए हमें किसी के नजरिए में बदलाव की संभावना से कभी इनकार नहीं करना चाहिए।
हम भाजपा के लिए फैसले नहीं लेते: संघ प्रमुख
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमारे यहां मत भेद हो सकता है, लेकिन मन भेद नहीं है। क्या आरएसएस सब कुछ तय करता है? यह पूरी तरह से गलत है। ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता। मैं कई सालों से संघ चला रहा हूं और वे सरकार चला रहे हैं। इसलिए हम केवल सलाह दे सकते हैं, निर्णय नहीं ले सकते। अगर हम निर्णय ले रहे होते, तो क्या इसमें इतना समय लगता? हम निर्णय नहीं लेते।
भाजपा अध्यक्ष के चयन में देरी को लेकर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से पूछा गया तो उन्होंने कोई सीधा जवाब नहीं दिया बल्कि चुटकी लेते हुए दिखे। उन्होंने कहा कि भाजपा पर चुटकी लेते हुए कहा, अपना समय लें, हमें कुछ कहने की जरूरत नहीं है। यही नहीं इसमें संघ की भूमिका के बारे में पूछा गया तो उस पर भी उन्होंने तंज भरे अंदाज में कहा कि हम फैसला नहीं करते। अगर हमें फैसला करना होता तो इतना समय लग जाता। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस का भाजपा के आंतरिक मामलों से कोई लेन-देन नहीं है।
मोहन भागवत ने कहा कि मैं शाखाओं के संचालन में निपुण हूं, भाजपा सरकार चलाने में निपुण है, हम एक-दूसरे को सिर्फ सुझाव दे सकते हैं। भाजपा के साथ मतभेद को लेकर उन्होंने कहा कि कहीं कोई झगड़ा नहीं, लेकिन सभी मुद्दों पर एकमत होना संभव नहीं, हम हमेशा एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं। भागवत ने कहा कि सिर्फ मौजूदा सरकार के साथ ही नहीं, हमारा हर सरकार के साथ अच्छा समन्वय रहा है।
यही नहीं उन्होंने कहा कि हम भाजपा के अलावा दूसरे लोगों का भी साथ देने के लिए तैयार हैं। मोहन भागवत ने कहा कि अगर किसी को अच्छे काम करने में हमारी मदद की ज़रूरत हो, तो हम सिर्फ़ भाजपा की ही नहीं, बल्कि सभी की मदद करते हैं।
इस दौरान उन्होंने 130वें संविधान संशोधन का भी समर्थन किया, जिसमें पीएम, सीएम या किसी मंत्री के गंभीर आरोपों में 30 दिन तक जेल में रहने पर पद छिनने का प्रावधान है। मोहन भागवत ने कहा कि अपराधियों को सरकार में शामिल होने से रोकने वाले नए विधेयक पर निर्णय के लिए संसद सही मंच है। मैं स्वच्छ और पारदर्शी नेतृत्व का पक्षधर हूं। उन्होंने समाज के लिए आरएसएस की भूमिका पर भी जिक्र किया।
जब जेपी ने आरएसएस से कहा- आप लोगों से ही उम्मीद है
मोहन भागवत ने कहा कि 1948 में हाथ में जलती मशाल लेकर जयप्रकाश बाबू संघ कार्यालय जलाने के लिए चले थे, लेकिन इमरजेंसी के बाद संघ शिक्षा वर्ग में आकर उन्होंने ही कहा था कि परिवर्तन की आशा आप लोगों से ही है। आरएसएस चीफ ने कहा कि हमने हमेशा समाज के लिए काम किया है और इसमें कभी कोई भेद नहीं रखा।