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संपूर्ण सोशल मीडिया खुजलाहट से व्याकुल है,क्यों?

संपूर्ण सोशल मीडिया खुजलाहट से व्याकुल है,क्यों?

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

इन दिनों छत्तीसगढ़ में ‘खुजली’ ट्रेंड कर रहा है। संपूर्ण सोशल मीडिया खुजलाहट से व्याकुल है। इस खुजलाहट की वजह बने हैं बाबा बागेश्वर। दरअसल उन्होंने पत्रकारों को सवाल पूछने के लिए जिस अंदाज में आमंत्रित किया वो लोगों को चुभ गया। उन्होंने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि, ‘जिस पत्रकार को खुजली हो, वो प्रश्न कर सकता है।‘ संवाद में इस्तेमाल किया गया ये आपत्तिजनक ‘खुजली’ शब्द ही बवाल की वजह बन गया है।

ये ‘खुजली’ वाकई बड़ी खुराफाती है। चिकित्सा शास्त्र में केवल शारीरिक खुजली के प्रकार और उपचार का जिक्र है, लेकिन एक ‘बौद्धिक’ खुजली भी होती है जिसके सिम्टम्स त्वचीय खुजली से काफी मिलते जुलते हैं। शारीरिक खुजली की तरह ही मानसिक खुजली भी कभी भी, कहीं भी उठ सकती है। लोगों की नजरों से छिपते-छिपाते खुजला लेने के नैसर्गिक गुण की तो बात ही निराली है। खुजली चाहे शारीरिक हो या फिर मानसिक, उसकी खुजलाहट का अपना अलग ही अप्रतिम आनंद है।

फिलहाल अभी बात मानसिक खुजली की। खुजली वो अदृश्य, अदम्य प्रेरणा है जो इंसान को बोलने, टोकने, पूछने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रेरणा को विद्वतजन नाना प्रकार से विश्लेषित करते हैं। कोई इसे ‘उंगली करना’ की उपमा देता है तो कोई इसे ‘चुल्ल’ मचने से नवाजता है। लेकिन कई दफा बौद्धिक खुजलाहट की ये दु:साहसी प्रवृत्ति अपनी मान्य मर्यादा का अतिक्रमण कर ‘उड़ता तीर’ लेने में रूपांतरित हो जाती है।

खुजलाहट की प्रेरणा को विद्वतजन भले अपने-अपने नजरिये से व्याख्यायित करें, लेकिन चूंकि इसका संबंध बोलने, टोकने या पूछने की प्रेरणा से है तो स्वाभाविक तौर पर पत्रकारों में ये ‘सिम्टम्स’ सर्वाधिक दिखाई देता है। वैसे देखा जाए तो ये सिम्टम्स ही तो किसी पत्रकार के ‘पत्रकार’ होने की पहचान है। वो पत्रकार ही क्या जिसमें सवाल पूछने, गलत को टोकने की ‘खुजली’ ना मचती हो। जम्हूरियत के लिए ये खुजलाहट जरूरी है। जम्हूरियत से याद आया कि एक युगपुरुषीय राजनेता को देश की राजनीति बदलने की इतनी खुजली मची थी कि वे ‘खुजलीवाल’ के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गए हैं।

लेकिन ‘खुजली’ की एक चारित्रिक विशेषता ये भी है कि ये व्यवस्था को आइना दिखाने की बजाए कई बार परस्पर चाटुकारिता का जरिया भी बन जाता है। ठीक इस मुहावरे की तरह कि, ‘तू मेरी खुजा, मैं तेरी खुजाऊं’। मौजूदा सिस्टम में पनपते गठजोड़ इसी परस्पर खुजहालट का परिचायक है।

पेशीय जिम्मेदारी के चलते पत्रकार बिरादरी में खुजलाहट का होना लाजिमी और जायज है। लेकिन समाज में ऐसे भी लोग हैं जिनके लिए ये खुजलाहट उनके व्यक्तिव का निर्धारक तत्व है। किसी को ज्ञान बघारने की खुजली है, तो किसी को सलाह देने की। किसी में मीन-मेख निकालने का खुजलाहटी गुण है, तो कोई नैतिक खुजली का पीड़ित है। इधर इन दिनों सोशलमीडियाई युग में अब कमेंट की डिजिटली खुजली का भी चस्का चरम पर है।

यानी खुजली वह आंतरिक उथल-पुथल है जो किसी इंसान को उसकी अंतर्रात्मा का हवाला देकर उसे खुजालात्मक हस्तक्षेप के लिए मजबूर कर देती है। खुजालात्मकता का यही गुण तो किसी समाज के संवेदी और संवादी होने का परिचायक है।

खुजली होने से कुछ अच्छा होता है तो खुजली अच्छी है।

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