बक्सर क्षेत्र की क़ृषि संस्कृति और लिट्टी चोखा का स्मृति लोक
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

स्मृतियाँ भी अद्भुत होती हैं। कल दिल्ली के कड़ाके की ठंढभरी धुंधलकी शाम में कुछ युवा साथियों ने लिट्टी चोखा का आयोजन किया…! देख रहा था- धीरेश, गनेशी, अभिषेक, दिव्य, रौशनी, शालिनी, रवि आदि आग पर बड़े मनोयोग से लिट्टी सेंकने में लगे हुए थे!
बचपन के दिनों की याद आई और याद आये बेचन, गुदली, लक्ष्मण, तुलसी आदि जिनके साथ गंगातट पर पंचकोशी मेला के दौरान यह व्यंजन हमलोग खाते थे। 2013 और 2021 में उसी गंगातट पर बहादुर और फ़ौद्दार मांझी ने भी “ग्रामीण इतिहास” (Village History) पर केंद्रित कार्यक्रम एवं पुस्तक के विमोचन के बाद लिट्टी चोखा बनाया था और खेत की ताजी मूली एवं बैगन, टमाटर, धनिया पत्ते, तीखी हरि मिर्च के चोखे का देशी स्वाद लिए नागेंद्रनाथ ओझा, दीपक राय, कुमार नयन, सुरेश कांटक, शशांक शेखर, लक्ष्मीकांत मुकुल, राम मुरारी जी आदि आमंत्रित वक्तगण लौटे थे।
कभी 2014 में उज्जवल, सीमा, गणपत, सरफ़राज़, विनय, अजय, प्रियंका, जितेन्द्र आदि ने दिल्ली महानगर के पेरियार की लॉन में लिट्टी चोखा बनाया था। तब बरामदे के एक कोने में उज्जवल पालथी मारकर बैठ गये थे और लिट्टी में सत्तू कैसे भरा जाता हैं, इसकी कला समूह के साथियों को बता रहें थे…!
यह बक्सर क्षेत्र के पांच गाँवों में लगनेवाले पंचकोशी मेला के पांचवें दिन का व्यंजन भी हैं जिसे महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण जी के पंचकोशी परिक्रमा से लौटने के बाद खिलाया था…! उनकी यह परिक्रमा लोकज्ञान की एक परिक्रमा भी थी जिसे आज भी बक्सर के ग्रामीण क्षेत्रों में महसूस किया जा सकता हैं।

2014 से 2019 के बीच *पंचकोशी मेला (NBT/नेशनल बुक ट्रस्ट, 2021) किताब पर कार्य के दौरान मुझे लगा कि बक्सर का यह क्षेत्र क़ृषि संस्कृति का केंद्र भी रहा हैं। धान, अरहर, चना, जोनहरी, बाज़रा आदि की उन्नत खेती का भी! गौतम ऋषि (अहिरौली में कढ़ी बरी एवं पकवान), देवर्षी नारद (नादाँव में सत्तू एवं मूली), ऋषि भार्गव (भभुवर में चूड़ा दही), उदालक ऋषि (नुआँव में खिचड़ी) और महर्षि विश्वामित्र (व्याघ्रसार /बक्सर में लिट्टी चोखा) आदि
ऋषियों को दर्शन, युद्ध कला और वैदिक ज्ञान के साथ -साथ क़ृषि उत्पादन की भी गहरी जानकारी थी जिनका प्रमाण मेला के दौरान आनेवाले लोक समाज के भोज्य पदार्थोंन में दिखलाई देता हैं! प्रत्येक गाँव में मेला से जुड़े अलग-अलग खान-पान क़ृषि उत्पादन के इतिहास की तरफ ही संकेत करते हैं। इस क्षेत्र में ऋषियों का लोक के साथ उनका गहरा लगाव ही था कि जिसे जनता आज भी अपनी स्मृतियों में संजोये एवं मेला के दौरान अभ्यास में बनाये हुए हैं।
लोकसमाज के इतिहास के निर्माण में इस तरह की संस्कृति की बड़ी भूमिका होती हैं जिसे सदियों तक लोक आत्मसात किये रहता हैं। बक्सर क्षेत्र में यह आज भी मौज़ूद है, यह महत्वपूर्ण हैं।
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