‘पुराने गीतों का दौर-ए-जमाना’
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क
हमलोग भी तो उस ‘दौर-ए-दिल’ के दीवाने हैं! जिस दौर ने बहुतेरे दिलों को लूटा..! तभी तो यह गीत बना-दिल के टुकड़े हजार हुए,कोई यहां गिरा,कोई वहां गिरा..! लेकिन,आज तो उल्फत के दिल में ही नफ़रत समायी है! क्योंकि,अब स्वार्थ रहित इश्क भी कोई कहां किसी से कर पाता है! इश्क के दो दिलों की बात तो अब दीगर रही..!
देशप्रेम भी अब बहुतेरे लोग तहे दिल से अब कहां कर पाते हैं..! अन्यथा यह पुराना गीत मन कैसे गुनगुनाता-अरे..ओ मेरे देशप्रेमियों,आपस में प्रेम करो..,और नफ़रत का खंजर छोड़ो..! बावजूद इसके देश में कथित ‘गद्दारों की जमातें’ बढ़ती ही जा रही हैं..! फिर इसके आगे कौन-सा गीत गाया जाए..,आप ही अब सब लोग बताइए..!
अन्यथा अब यह गीत ही गाना पड़ेगा कि ‘अब छोड़ चले इस महफिल को..,याद आए तो कभी मत रोना..! मगर,अब मतलब की इस दुनिया में कौन किसके लिए रोता है..! तब रोता हुआ यह ‘गम-ए-दिल’ गुनगुनाता है-वो दुनिया बनाने वाले,काहे को यह दुनिया बनाई..! और यह गीत गाते हुए फिर भावुक दिल दूजा यह गीत भी गुनगुनाने लगता है-आजा तुझको पुकारे मेरे गीत..ओ मेरे मीत,ओ मेरे मितवा..! पर,जब मितवा कोई नजर नहीं आता,तो निराश-दु:खी मन फिर यह गीत गाने लगता है-दुनिया में तेरा सुना है बड़ा नाम,मेरी विनती सुनो तो जानूं ..!
राम नहीं तो कर दूंगा सारे, दुनिया में तुझे बदनाम..! पर,पता नहीं फिर अचानक दिल में यह गीत आ जाता है-रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,हंस चुगेगा दाना-तिनका और कौवा मोती खायेगा..! तभी यह मौजू गीत बरबस यह बात भी याद दिलाती है कि देश की ‘आजादी-ए-दौर’ के सतहत्तर वर्षों के बाद भी हमारे आगामी ‘गणतंत्र दिवस’ पर भी प्रायः ‘जन-मन’ में यह ‘यक्ष-सा प्रश्न’ गूंजता ही रहेगा कि क्या सचमुच आजकल कि कथित ‘राजनीति की कूटनीति की रणनीति’ के लिए भी अभी ‘वोट बैंक’ का कारगर व जोरदार-दमदार हथियार बन गया है..?
हमारे भारतीय समतामूलक विशालतम लोकप्रिय लोकतंत्र में दशकों से जारी-‘जातीय आरक्षण-ए-बहार’…! और अब शब्बा खैर! शुभ प्रभात! समय मिला तो फिर कभी इस ‘गीत-माला’ में मुलाकात! और बाकी आज की बात फिर कभी..! और आज की बात,बस इतनी..!
आभार- धनंजय मिश्र ,वरिष्ठ पत्रकार, सीवान, बिहार

