राष्ट्रीय बालिका दिवस-बालिकाओं के अधिकारों और सशक्तिकरण पर जागरूकता का संदेश
श्रीनारद मीडिया, प्रसेनजीत चौरसिया, सीवान (बिहार)

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2008 में शुरू किया गया यह दिवस बालिकाओं के अधिकारों, शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और लैंगिक समानता के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। इसका उद्देश्य समाज में बेटियों को सशक्त बनाना और उनके लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना है।
असमानता अपने आप में एक बालिका की प्रगति के लिए एक बड़ा खतरा है जिसमें शिक्षा, पोषण, नौकरी, कानूनी अधिकार, चिकित्सा देखभाल और बहुत कुछ जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
राष्ट्रीय बालिका दिवस हर साल 24 जनवरी के दिन मनाया जाता है। 2009 को पहली बार राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया गया। ताकि लोगों की सोच में बदलाव लाया जा सके और बालिकाओं के प्रति भेदभाव को समाप्त किया जा सके।
अब सवाल यह उठता है कि राष्ट्रीय बालिका दिवस को सेलिब्रेट करने के लिए 24 जनवरी का दिन ही क्यों चुना गया। दरअसल 24 जनवरी 1966 के दिन ही इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधान मंत्री बनी थीं। वह देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थी। यह दिन महिला सशक्तिकरण के लिहाज से भारतीय इतिहास में एक बेहद ही महत्वपूर्ण घटना थी। इसलिए इस विशेष दिन को ही बाद में राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया।
इस दिन को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि यह लोगों को समाज में लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव के बारे में जागरूक करता है और साथ ही एक बालिका को अपने अधिकारों के बारे में बताता है।
- उद्देश्य: बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या जैसे मुद्दों पर रोक लगाना और समान अवसरों को बढ़ावा देना।
- पहल: इस अवसर पर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया जाता है।
- महत्व: यह दिन याद दिलाता है कि बेटियां सिर्फ भविष्य नहीं, वर्तमान की शक्ति हैं, जिन्हें समान अधिकार और गरिमा मिलनी चाहिए।
- आयोजन: स्कूल, कॉलेज और सरकारी स्तर पर विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम, सेमिनार और रैलियाँ आयोजित की जाती हैं।
- शिक्षा: यूडीआईएसई रिपोर्ट के अनुसार, माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं का सकल नामांकन अनुपात (GER) 80.2 प्रतिशत तक पहुँच गया है।
- बाल विवाह रोकथाम: देश भर में 2,153 बाल विवाहों को रोका गया है।
- योजनाएं: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और अन्य सरकारी प्रयासों ने लैंगिक असमानता को कम किया है।
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