बीबीसी के पूर्व पत्रकार मार्क टुली का निधन,विनम्र श्रद्धांजलि
मार्क टुली का जाना एक युग का संध्याकाल
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

अभी-अभी सूचना मिली, मार्क टली नहीं रहे। कल ही किसी ने बताया था। अस्पताल में हैं। हालत ठीक नहीं है। नाजुक है। आज वे चले गए, एक युग की चमक लेते हुए। मृत्यु अंत नहीं, द्वार है। स्मृतियाँ उभरती हैं, चिंतन जन्म लेता। हम सोचें—क्या बचा? क्या खो गया? वैसे भी दुनिया कभी थमती नहीं है। पर, ऐसे मोड़ आते हैं जहाँ लहरें शांत हो स्मृतियाँ बन जाती हैं। टली का निधन वैसा ही संध्याकाल है। वे ‘बीबीसी’ का वह बेबाक स्वर थे, जो भारत की धमनियों में गूँजता रहा। बचपन की वे रातें याद हैं, जब रेडियो पर उनका नाम आता तो घर में सन्नाटा छा जाता।
पत्रकारिता सत्य की आग है। वह तपाती है। जलाती है। लेकिन मार्क टली ने इसे कभी हथियार न बनने दिया। 1964 में वे भारत आए। एक परदेसी बनकर। जल्दी ही अपने हो गए। बीबीसी दिल्ली प्रमुख बनकर उन्होंने वह किया जो सच्चा सिपाही करता है। अंधेरे में दीया जलाना। इमरजेंसी के काले दिनों में प्रेस पर ताले लगे, लेकिन टली की आवाज़ लंदन से भारत पहुँचती रही। वह निर्भीकता नहीं, नैतिक विद्रोह था। सोचिए, एक अंग्रेज़ जो आज़ादी के बाद के घावों को इतनी गहराई से देखे कि अपनी संस्था के खिलाफ खड़ा हो जाए। आज की पत्रकारिता में ऐसा कौन है? सोशल मीडिया की चमक में सब खो गए हैं।
टली की पत्रकारिता में जनता की संवेदना थी। नक्सल गलियों में घूमे जहाँ इंतजामिया का पैर नहीं पहुँचता। पंजाब का दर्द उकेरा, कश्मीर की पीड़ा शब्दों में उतारी। यह सूखी खबरें नहीं थीं। जीवंत चित्र थे। जैसे कवि कविता को सांस देता है, वैसे टली ने खबरों को जीवन दिया। उनकी किताबें—’No Full Stops in India’, ‘India’s Unending Journey’—शब्द नहीं, भारत की आत्मा के दर्पण हैं। हर पंक्ति में सतही पत्रकारिता के खिलाफ विद्रोह। वे कहते थे, “भारत समझना है तो उसके लोगों के बीच जियो।” और वे जिए। हिंदी पट्टी के लिए वे खास थे। बिहार-यूपी की राजनीति को वैसा ही दिखाया जैसी वह है: जटिल, भावुक, विद्रोही। दिवाली की धूम में भी किसानों की सूखे की पीड़ा देखी। यह पत्रकारिता नहीं, दर्शन था।
आश्चर्यजनक है कि स्कॉटलैंड का जन्मा व्यक्ति भारत का इतना अपना हो गया। उन्होंने भारतीयता से शादी की, संस्कार अपनाए, दिल्ली की गलियों में घरेलू बने। पत्नी गिलियन ने भी अपनाया, लेकिन टली का प्रेम गहरा था। आलोचना से उपजा प्रेम। उन्होंने भारत को कभी आदर्श नहीं बनाया। जानते थे, यह पूर्णताओं का देश नहीं, विरोधाभासों का संग्रह है। ‘Anarchy’ में 1990 के राजनीतिक अराजकता को क्रोध के साथ करुणा से चित्रित किया। भोपाल गैस त्रासदी पर उनकी रिपोर्टिंग मानवता का रोना है, जो आज भी गूँजता है। कारखानों के धुएँ में घुसकर माँओं की पीड़ा सुनी, जिनके बच्चे हमेशा सो गए। यह पत्रकारिता नहीं, सत्य का साहित्य था।
उनका लेखन नदी-सा था—व्यापक, गहन। दर्जनों किताबें, सैकड़ों लेख। ‘From Raj to Rajiv’, ‘The Heart of India’—शीर्षक नहीं, भारत के हृदय के टुकड़े। गांधी से मोदी तक सब एक सतत यात्रा। “भारत हर मोड़ पर आश्चर्य देता है,” वे लिखते। आज भी प्रासंगिक। कैंसर से जूझते हुए भी ‘Non-Stop India’ में भारत की गति पकड़ी। परिवार को संवेदना—गिलियन को, बच्चों को। लेकिन यह व्यक्तिगत न रहे, सामूहिक बने।
आज पत्रकारिता संकट में है। फेक न्यूज़ की बाढ़, कॉर्पोरेट दबाव, राजनीतिक चाप। टली की स्मृति युवा पत्रकारों के लिए दीपक बने। एक युग समाप्त हुआ, लेकिन नई लहरें उठेंगी। प्रतिज्ञा करें—उनकी निर्भीकता जियें, लेखन पढ़ें, संवेदना अपनाएँ। भारत महापुरुषों को जन्म देता रहता है, टली उसके दत्तक पुत्र थे। उनकी आवाज़ रेडियो तरंगों में, किताबों में बसी रहेगी।
हिंदी भाषा और साहित्य में योगदान
मार्क टुली की हिंदी पर अच्छी पकड़ है और उन्होंने हिंदी के महत्व को हमेशा रेखांकित किया है। उनका योगदान निम्नलिखित बिंदुओं में देखा जा सकता है:
* बीबीसी हिंदी सेवा का नेतृत्व: 1969 से 1971 के बीच उन्होंने लंदन में बीबीसी हिंदी सेवा के प्रमुख के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल के दौरान बीबीसी हिंदी की विश्वसनीयता और लोकप्रियता चरम पर थी।
* हिंदी का समर्थन: मार्क टुली भारत में ‘अंग्रेजी के आधिपत्य’ और ‘गुलाम मानसिकता’ के कड़े आलोचक रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक भारतीय भाषाओं (विशेषकर हिंदी) का सम्मान नहीं होगा, भारतीय संस्कृति सुरक्षित नहीं रह सकती।
* लोकप्रिय वक्ता: वे हिंदी सम्मेलनों और साहित्य उत्सवों में अक्सर हिंदी में अपनी बात रखते हैं। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से यह कहा है कि “हिंदी सीखने में कोई हीन भावना नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह दुनिया की सबसे समृद्ध भाषाओं में से एक है।”
* सांस्कृतिक सेतु: उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से पश्चिम के पाठकों को भारत के उन हिस्सों (जैसे अवध और बिहार के गाँव) से परिचित कराया, जहाँ की आत्मा केवल हिंदी या स्थानीय बोलियों में बसती है।
सर मार्क टुली भारत की नब्ज को पहचानने वाले सबसे विश्वसनीय विदेशी पत्रकारों में गिने जाते हैं। वे केवल समाचारों के रिपोर्टर नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज की गहरी परतों को समझा और उन्हें दुनिया के सामने पेश किया। एक ऐसी दुनिया में जहाँ अंग्रेजी को ही एकमात्र ‘ज्ञान की भाषा’ माना जाने लगा है, मार्क टुली जैसे अनुभवी व्यक्तित्व का हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति अनुराग अत्यंत प्रेरणादायक है।

