चिकन नेक में जमीन के नीचे रेल दौड़ाने की तैयारी

चिकन नेक में जमीन के नीचे रेल दौड़ाने की तैयारी

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

000
previous arrow
next arrow
000
000
previous arrow
next arrow

पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्से से जोड़ने वाला सिलीगुड़ी गलियारा एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है। यह धरती की वही पतली पट्टी है जिसे आम बोलचाल में चिकन नेक कहा जाता है। सबसे संकरे हिस्से में इसकी चौड़ाई करीब पच्चीस कोस से भी कम मानी जाती है। इसके एक ओर नेपाल, दूसरी ओर भूटान और पास ही बांग्लादेश की सीमा है। यही रास्ता पूर्वोत्तर के आठों राज्यों के लिए जीवन रेखा है। सेना की आवाजाही हो, अनाज और ईंधन की आपूर्ति हो या व्यापार, सब कुछ काफी हद तक इसी राह से गुजरता है।

केंद्र सरकार ने अब इस गलियारे की सुरक्षा और मजबूती के लिए बड़ा कदम उठाया है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने घोषणा की है कि करीब चालीस कोस लंबे हिस्से में भूमिगत रेल पटरियां बिछाने की योजना बनाई गई है। तीन मील हाट से रंगापानी के बीच यह भूमिगत मार्ग बनेगा। साथ ही पूरे मार्ग को चार पटरियों वाला बनाने का प्रस्ताव भी वार्षिक लेखा योजना में रखा गया है ताकि यातायात की क्षमता कई गुना बढ़ सके।

हम आपको बता दें कि हाल के समय में इस गलियारे को लेकर कई तरह की गीदड़ भभकियां सामने आईं थीं। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद कुछ समूहों ने चिकन नेक को दबाने जैसी बातें कही थीं। कुछ बयान ऐसे भी आये जिनमें इस इलाके को ग्रेटर बांग्लादेश की कल्पना से जोड़ा गया। ढाका की चीन से बढ़ती नजदीकी ने भी चिंता बढ़ाई।

वर्ष 2017 में डोकलाम टकराव के समय भी सैन्य योजनाकारों ने सिलीगुडी हिस्से की कमजोरी पर ध्यान दिलाया था। साफ था कि यदि यहां बाधा आई तो पूर्वोत्तर लगभग कट सकता है। इसी पृष्ठभूमि में भूमिगत रेल को संकट के समय भी संपर्क बनाए रखने की योजना के रूप में देखा जा रहा है। भूमिगत मार्ग पर सीधा प्रहार करना कठिन होगा। इससे सैनिक साजो सामान और आम जन जीवन की आपूर्ति निरंतर बनी रह सकती है।

यदि चिकन नेक जैसे संवेदनशील इलाके में भूमिगत रेल मार्ग बनता है तो यह कौशल, साहस और दूरदर्शिता का भी प्रदर्शन होगा। भारत पहले ही जम्मू-कश्मीर में दुनिया के सबसे ऊंचे रेल पुल का निर्माण कर अपनी प्रतिभा दिखा चुका है। पहाड़ चीरकर और पहाड़ों के ऊपर पुल खड़ा करने वाले यही हाथ जमीन के भीतर भी सुरक्षित मार्ग बना सकते हैं। वैसे भी कठिन भौगोलिक हालात को मात देना भारतीय इंजीनियरों की पहचान बन चुकी है, इसलिए चिकन नेक में भूमिगत रेल केवल सुरक्षा कदम नहीं, बल्कि देश की तकनीकी ताकत और आत्मविश्वास का प्रतीक भी होगी।

देखा जाये तो यह गलियारा केवल भौगोलिक पट्टी नहीं बल्कि राष्ट्रीय एकता की धुरी है। इसलिए इसकी सुरक्षा पर किसी तरह की ढिलाई नहीं हो सकती। भूमिगत रेल, चार पटरी विस्तार और कड़ी निगरानी को उसी दिशा में उठे कदम के रूप में देखा जा रहा है। सामरिक दृष्टि से देखें तो यह इलाका चार देशों के बीच घिरा है।

सीमा पार से होने वाली हर हलचल यहां असर डालती है। चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा, बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति, और खुले सीमा प्रबंध वाले इलाकों की जटिलता, सब मिलकर इस पट्टी को संवेदनशील बनाते हैं। ऐसे में भूमिगत रेल केवल ईंट पत्थर का काम नहीं, बल्कि संकट काल में जीवन रेखा को जिंदा रखने का उपाय है। युद्ध या बड़े तनाव की स्थिति में खुली पटरियां आसान निशाना बन सकती हैं, पर जमीन के भीतर चलने वाली रेल को रोकना कठिन होगा।

इसका आर्थिक पक्ष भी कम अहम नहीं है। पूर्वोत्तर क्षेत्र प्राकृतिक संसाधन, जल शक्ति, कृषि उपज और सीमा पार व्यापार की अपार संभावना रखता है। यदि संपर्क मजबूत होगा तो उद्योग, पर्यटन और व्यापार को बल मिलेगा। चार पटरी मार्ग का अर्थ है तेज आवागमन, कम बाधा और ज्यादा माल ढुलाई। इससे लागत घटेगी और बाजार बढ़ेंगे, जो इलाका कभी दूर माना जाता था वह अवसर का द्वार बन सकता है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!