सम्बोधक- परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ‘1008’ स्थान: श्री विद्यामठ, काशी तिथि: 2082 विक्रमी फा.कृ.अष्टमी, सोमवार तदनुसार ९ फरवरी २०२६

सम्बोधक- परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ‘1008’ स्थान: श्री विद्यामठ, काशी तिथि: 2082 विक्रमी फा.कृ.अष्टमी, सोमवार तदनुसार ९ फरवरी २०२६

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@ सन्दर्भ-40 दिवसीय ‘उप्र राज्यमाता अभियान’ का ११वाँ दिन

श्रीनारद मीडिया / सुनील मिश्रा वाराणसी उत्तर प्रदेश

आप सबको पता है कि विगत माघमेले में प्रदेश की तथाकथित हिन्दू सरकार ने अपने तथाकथित गेरुआधारी मुख्यमंत्री के नेतृत्व में हमसे 24 घंटे में शंकराचार्य होने का सबूत मांगने का दुस्साहस किया था जिसे हमने तय समयसीमा में ही दे दिया था और फिर हमने उनसे उनके असली हिन्दू होने को प्रमाणित करने के लिये उदारतापूर्वक 40 दिन दिये थे जिसके आज (9 फरवरी को ) दस दिन बीत चुके हैं।बडे दुःख के साथ कहना पड रहा है कि इन दस दिनों में इस सरकार और इसके गेरुआधारी तथाकथित महंत मुख्यमंत्री ने अपने असली हिन्दू होने के कोई प्रमाण तो नहीं दिये हैं अपितु अपने आचरण से नकली हिन्दू अर्थात् कालनेमि होने के संकेत जरूर सार्वजनिक किये हैं।

दस दिन में उन्होंने पहला काम यह किया कि अपने पशुपालन मंत्री को एक लेख पढने को दिया जिसे उन्होंने बडे मनोयोग से कई चैनलों को पढपढकर सुनाया भी। आश्चर्यजनक निर्लज्जता प्रदर्शित करते हुये उन्होंने पढा कि हम उप्र सरकार (हमारे योगी जी) गाय नहीं, बल्कि भैंस-बकरा और सुअर कटवाते/ बेचते हैं।यह ऐसी स्वीकारोक्ति थी जिसे सुनकर हर असली हिन्दू/सन्त ही नहीं गुरु गोरखनाथ जी भी लजाये होंगे कि मेरी परम्परा में ये कैसा व्यक्ति आया जो करोडों जीवों की हत्या कर मांस बेच रहा।उन्होंने आगे फरमाया कि हम आपको (माने हमें )’शंकराचार्य’ नहीं मानते। पहले तो उन्हें यह होना चाहिये कि शंकराचार्य होने के लिये उस उप्र सरकार की मान्यता/अमान्यता का कोई तात्पर्य ही नहीं होता है जो पीठ की स्थापना के हजारों वर्ष बाद अस्तित्व में आई हो। दूसरे शंकराचार्य को वही नहीं मानता जो हिन्दू न हो। तीसरे जो स्वयं को हिन्दू भी कहे और शंकराचार्य को न माने तो वह अपने आप नकली हिन्दू ही तो सिद्ध होगा।

और चौथे, सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिये कि आदि शंकराचार्य जी ने मठाम्नाय महानुशासन में कहा है कि धर्म ही मनुष्यों का मूल है और वह आचार्य पर अवलम्बित है। इसलिये आचार्य(शंकराचार्य) का शासन सबसे बडा है।दूसरा काम उन्होंने यह किया कि केन्द्रीय बजट २०२६ का न केवल ‘स्वागत’ किया अपितु उसको ‘ऐतिहासिक’ भी बताया, जो बजट मांस निर्यातकों को पहले से बढाकर की गई ३% की अतिरिक्त ड्यूटी-फ्री छूट का उपहार दे रहा है।

क्या एक असली हिन्दू और गेरुआधारी महंत/ योगी के लिए जीव-हिंसा को बढ़ावा देने वाला बजट ‘ऐतिहासिक विकास’ का पैमाना हो सकता है?” यह सिद्ध करता है कि शासन की प्राथमिकता ‘धर्ममर्यादा’ नहीं, बल्कि ‘मांसलमुद्रा’ है। पीडादायक आश्चर्य है कि उनके द्वारा धर्म की नहीं, अपितु ‘रक्त-रंजित धन’ की खुलकर जय-जयकार की जा रही है। १० दिन के लेखा-जोखा में सुधार नहीं, संहार ही दिख रहा ।हमने ४० दिन का समय दिया था, किन्तु १० दिन के भीतर ही शासन का जो स्वरूप दिखा, वह हृदयविदारक है। सच्चा धर्म—सत्ता और सम्पत्ति नहीं अपितु शान्ति और सन्तुष्टि कमाने का माध्यम है। पर आज यह देखकर दुःख होता है कि उसे भी इन लोगों ने सत्ता और सम्पत्ति पाने का औजार बना लिया है और कालनेमि की तरह धर्म का चोला पहन कर अपना उल्लू साध रहे हैं।

कुछ लोग कह रहे कि योगी ने नया कुछ नहीं किया यह सब तो पहले से ही चला आ रहा था । पर सरकार के आंकडे अलग ही कहानी कह रहे हैं । सचाई यह है कि २०१७ में योगी के मुख्यमंत्री बनने के पहले उत्तर प्रदेश का कुल मांस उत्पादन लगभग ७.५ लाख टन था, जो आज बढ़कर १३ लाख टन के पार पहुँच गया है, मतलब दोगुना हो गया है। योगी शासन में वधशालाओं की संख्या भले ही कागजों पर कम हुई हो, किन्तु पशुओं के काटने की गति और मात्रा (Volume) लगभग ६०% बढ़ गई है।” यह भी कि २०१७ से पहले इन इकाइयों को ‘अपराधी’ माना जाता था, अब इन्हें ‘उद्योग’ मानकर ३५% सब्सिडी (५ करोड़ रुपये तक) दी जा रही है।

१६ करोड+ जीव-हत्या वाला योगी का ९ वर्षों का ‘रक्त-रंजित’ सुशासन योगी जी के पिछले ९ वर्षों में उत्तर प्रदेश की धरती पर स्वीकृत रूप से १६ करोड़ से अधिक निरपराध जीवों, जिसमें घोषित रूप से ४ करोड़ भैंस-वंश सम्मिलित हैं और करोडों गायों का रक्त बहाये जाने का अनुमान है। यह वह संहार है जिसे ‘वैध’ और ‘आधुनिक’ वधशालाओं के माध्यम से राजकीय संरक्षण प्राप्त है। क्या १६ करोड़ से अधिक पशुचीखें एक ‘योगी’ के कानों तक नहीं पहुँचतीं?” क्या यही है हिन्दुत्व ? क्या इसे कह सकते हैं संतत्व और महन्तत्व? आप लाख कहें कि उनमें गाय नहीं पर सचाई तो यही है कि “जीव तो जीव है। और जो योगी ‘जीव मात्र पर दया’ की शपथ लेता है, उसके शासन में स्वीकृत रूप से १६ करोड़ से अधिक जीव कट जाएं, तो वह ‘योगी’ कैसा?”वह भी विदेशियों/म्लेच्छों के मांस भोजन के लिये??? या डालर की कमाई के लिये?? साफ है कि यह शासन ‘हिंदूवादी’ मुखौटे के पीछे केवल ‘वोट’ के लिए गौ-भक्ति का प्रदर्शन करता है, किन्तु ‘राजस्व’ के लिए वधशालाओं को पाल रहा है।

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