आलोचना की एक नई पुस्तक ,आलोचना के क्षितिज @2025 श्रृंखला संपादक-पल्लव
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

समकालीन हिंदी आलोचना पर केंद्रित हिंदी आलोचकों की यह एक महत्वपूर्ण श्रृंखला पुस्तक हैं। युवा आलोचक पल्लव ने इस श्रृंखला में हिंदी के दस आलोचकों को शामिल किया हैं जिनके बहाने हिंदी की समकालीन आलोचना का परिदृश्य बनता हैं। स्त्री सवाल, दलित सवाल, आदिवासी समाज के सवाल, वैश्विकारण, आर्थिक उदारीकारण, सम्प्रदायिकता, कृषि संघर्ष पर केंद्रित साहित्य आदि सन्दर्भ तो आलोचना में हैं ही; भारतीय इतिहास और मानव सभ्यता के इतिहास एवं संघर्ष को भी समकालीन आलोचकों ने आज के सन्दर्भ में समझने का प्रयास किया हैं। इसलिए समकालीनता केवल समय को मापने वाला शब्द ही नहीं हैं, बल्कि समय के विचारों का प्रतिनिधित्व करनेवाला एक शब्द भी हैं जो मध्यकाल के बाद के जनतान्त्रिक मूल्यों को एक वृहत्तर सन्दर्भ देता हैं।
-देवेंद्र चौबे
सम्पादक की बात : पल्लव
हिंदी आलोचना के साथ दृष्टिपूर्ण इतिहासबोध देवेंद्र चौबे की आलोचना की विशेषता है। उन्होंने कथा आलोचना से अपनी शुरुआत की और धीरे धीरे इतिहास, लोक और अस्मितामूलक लेखन के मूल्यांकन की ओर भी प्रवृत्त हुए। उन्होंने एक स्थान पर लिखा है, ‘दरअसल आलोचक की भूमिका भी होती है कि वह मौजूद जातीय जिंदगी और उसके भिन्न भिन्न रूपों की खोज करे, उनकी व्याख्या करे और उन्हें स्थापित भी करे। इतना ही नहीं इतिहास में उनकी जगह निर्धारित करे ताकि वह राष्ट्रीय धारा का अहम् हिस्सा बन सकें।
ध्यान देकर देखा जाए तो चौबे का आलोचना कर्म इसी प्रतिज्ञा का प्रतिफलन है। वे 1857 की क्रांति के बिसरा दिए नायकों को खोजते हैं और साहित्य से उनका सम्बन्ध स्थापित करते हैं। इसी तरह आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर जातिवादी होने के आरोपों का तार्किक प्रत्युत्तर उनके एक लेख ‘जाति व्यवस्था’ को उद्धृत करते हुए वे लिखते हैं, ‘कल्पना कीजिये, जो आलोचक जाति व्यवस्था के समाप्त न किए जाने पर भारतीय संस्कृति यहाँ तक कि राष्ट्रभक्ति की मृत्यु तक की घोषणा करता है;
उस पर वर्ण अथवा जातिवादी होने का आरोप लगाना कितना उचित है? स्पष्टतः आचार्य शुक्ल जाति व्यवस्था को सामाजिक विकास के लिए एक खतरनाक व्यवस्था के रूप में देखते थे। यहाँ तक कि जातीय जिंदगी को अव्यवस्थित करने वाली एक प्रक्रिया भी मानते थे। वह तो यहाँ तक कहते हैं कि यह स्वार्थी पंडितों की देन है।’
समकालीन साहित्य परिदृश्य पर विचार करते हुए उनकी दृष्टि विधारधारा की जरूरत और उसके महत्त्व पर बनी रहती है। यह विचारधारा उन्हें हाशिये पर छूट गए लोगों के साथ खड़ा करती है तो उनकी वास्तविक पक्षधरता को भी दर्शाती है। आदिवासी समाज और समकालीन हिंदी कहानी आलेख में उनका निष्कर्ष है, ‘कैलाश बनवासी की कहानी ‘सुरक्षित असुरक्षित’ में एक आदिवासी युवक के मन के जिस भय को कहानीकार ने चित्रित किया है, वह राजनीतिक विसंगतियों में फंसकर आज संवेदना का नहीं बल्कि जरूरत का हिस्सा बन गया है।
मुख्यधारा ने जिस तरह से आदिवासी समाज को अपने अंदर समाहित किया है, उसका स्वरूप कुछ कुछ ऐसा ही है। विकास की पूरी प्रक्रिया को देखते हुए यही लगता है कि आदिवासी समाज को मुख्यधारा की राजनीति, मानवीय दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अपनी जरूरतों को देखते हुए अपने अंदर शामिल कर रही है। इसी तरह एक अन्य में पिछले तीन चार दशकों में स्त्री, दलित और आदिवासी केंद्रित जो साहित्य आया आलेख में वे लिखते हैं, ‘कहना न होगा कि समकालीन हिंदी और भारतीय साहित्य है, उसकी निर्मिति में संक्रमणकालीन स्थितियों की बड़ी भूमिका रही है। और सच यह भी है कि इस संक्रमण में स्थान परिवर्तन एक निर्णायक भूमिका निभाता है।
एक और अंश द्रष्टव्य है, ‘वस्तुतः विकास के नाम पर आदिवासी समाज को जिस तरह उनकी जमीनों से बेदखल कर, उन्हीं के हाल पर जीने के लिए छोड दिया गया, वह एक विचारणीय मुद्दा है। कारण, जब औद्योगिक विकास के लिए सरकार, इकाइयों की स्थापना करती है, तब प्रत्येक आदिवासी परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी दी जाती है। परिणाम यह होता है कि परिवार का जो सदस्य नौकरी में आ जाता है, वह धीरे-धीरे समाज और उसकी संस्कृति के साथ जुड़कर आधुनिक तरीके से जीवनयापन करने लगता है।
एक तरह से वह भारतीय जीवन की मुख्यधारा में शामिल हो जाता है। लेकिन दूसरी तरफ़ धीरे-धीरे उसके परिवार में असमानता की स्थिति उत्पन्न होने लगती है तथा एक समय ऐसा आता है, जब वह अपने परिवार से अलग हो जाता है। इस प्रकार उसके परिवार के शेष सदस्य, पुनः पुरानी आर्थिक और सामाजिक अवस्था में जीने के लिए बाध्य हो जाते हैं।’
हिंदी कहानी पर उनका विशद अध्ययन आया है जिसमें में नयी पीढ़ी के लेखकों पर भी विस्तार से चर्चा करते हैं। एक स्थान पर उन्होंने भूमंडलीकरण के दौर में लिखी जा रही हिंदी कहानी की चर्चा में बताया है, ‘यह नए समाज का वही यथार्थ है जिसके पीछे लोग पागल हैं। सबको पब्लिसिटी चाहिए।
पैसा चाहिए। लन्दन, टोक्यो, न्यूयार्क की सैर चाहिए। क्यों? यह बताना मुश्किल है क्योंकि आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के बाद यह दुनिया जिस तेजी से बदली है उसमें लोग हक्के बक्के से ठगे खड़े हैं। अंत में उनका निष्कर्ष है, ‘मुश्किल यही है कि बाजारकेंद्रित निर्मित हो रही इस नयी व्यवस्था में ‘सच’ कहना उतना ही गलत है, जितना कि ‘झूठ’ को ‘झूठ’।
यह नया सामाजिक यथार्थ आज उन संकेतों को लेकर भी निर्मित हो रहा है जहाँ ‘सच’ को ‘झूठ’ और ‘झूठ’ को ‘सच’ में तब्दील करने की वैधानिक व्यवस्था की जाती है।… यह महत्त्वपूर्ण बात है कि आज की हिंदी कहानी इस प्रकार के नए सामाजिक यथार्थ के साथ मुठभेड़ कर रही है।’
कहा जा सकता है कि देवेंद्र चौबे का आलोचना कर्म तंग अकादमिक दायरों को खोलता है और उनमें भारतीय जनजीवन के विविध रूपाकारों को अपने ढंग से प्रवेश करवाता है।
-पल्लव
pallavkidak@gmail.com
(स्रोत : आलोचना के नये क्षितिज : देवेंद्र चौबे, कौटिल्य प्रकाशन, दिल्ली, पहला संस्कारण -2025)

