दलित साहित्य पर एक नई किताब

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‘चिंतन की परम्परा और दलित साहित्य’

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संपादक -श्यौराज सिंह बेचैन व देवेंद्र चौबे

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

‘चिंतन की परंपरा और दलित साहित्य’ दलित साहित्य, इतिहास, समाज, संस्कृति, पाठ और प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार ग्रंथ हैं। अपने परिवेश को लेकर मनुष्य प्रारंभ से ही संवेदनशील रहा है। अपनी अनुभूति और जानकारी को व्यक्त करने के लिए उसने समय-समय पर उपलब्ध साधनों का उपभोग किया है।

इसी क्रम में उसने विचारों को लिपिबद्ध कर दूसरे मनुष्य और समाज को भी अपने ज्ञान का हिस्सेदार बनाया है। ज्ञान के हस्तांतरण की इस प्रक्रिया ने विचार-विमर्श के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी भूमिका निभाई है और विभिन्न समाजों को इस बात का एहसास कराया है कि वे भी इस परिवर्तन के हिस्सेदार हैं।

इस हालत में सीधा सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में विभिन्न समाजों को परिवर्तन की प्रक्रिया का हिस्सेदार बनाया गया है अथवा यों ही उन्हें अपने साथ मान लिया है? यहां हमारा सीधा संकेत उस समाज से है, जो आज के सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया में एक ‘दलित’ के रूप में मुख्यधारा के सामने चुनौती बनकर खड़ा है और जिस पर विचार-विमर्श करना आज के बौद्धिक जगत के लिए जरूरी हो गया है।

दलित समाज को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में जो आंदोलन हो रहे हैं, उनमें इस प्रकार के सवाल बार-बार उठाए जा रहे हैं कि ज्ञान और नेतृत्व की प्रक्रिया से वंचित कर देने के कारण ये समाज में धीरे-धीरे पिछड़ते चले गए और अब वह समय आ गया है, जब यह मुख्यधारा बनें। परंतु, अपनी मर्जी से! दलित समाज और साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में जो आंदोलन हो रहे हैं, ये उसी वंचित प्रक्रिया के परिणाम हैं, जिसे कभी महत्व दिया ही नहीं गया।

इन्हीं सब संदर्भों में हमने इस क्षेत्र में थोड़ी-बहुत कोशिश की, जिसका परिणाम इस पुस्तक के रूप में आपके सामने है। इधर साहित्य और साहित्येतर विद्याओं में दलित साहित्य, दलित समाज, दलित संस्कृति, दलित चेतना, दलित राजनीति को लेकर देश-व्यापी विचार-विमर्शों को थोड़ी गहराई में जाकर हमने जांचने-परखने की कोशिश की। इस बीच, इन मुद्दों पर हम गातार काम करते रहे। उसका परिणाम ‘चिंतन की परंपरा और लित साहित्य’ के रूप में आपके सामने है।

पुस्तक का प्रकाशन पहली बार प्रसिद्ध चिंतक और खिका रमणिका गुप्ता ने सन् 2000-01 में किया था। यह स्करण उसी का संशोधित और परिवर्धित रूप है। चिंतन, चेतना, कोशिश और अति उत्साह की प्रक्रिया में हो सकता है, संकलित करने में हमसे बहुत कुछ छूट गया हो, पर हमारी कोशिश रही है, कि इधर हिंदी भाषा और हिंदी क्षेत्र में दलित आंदोलन और साहित्य को लेकर जो विचार-विमर्श हो रहे हैं, उनका एक गंभीर विश्लेषणात्मक अध्ययन आपके सामने आए।

के एल पचौरी प्रकाशन के निदेशक तरुण पचौरी के प्रति आभार कि लम्बे समय तक अनुपलब्ध इस किताब को सामने लेकर आये।

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