प्रति व्यक्ति आय में सुधार और बेरोजगारी दूर करने पर ध्यान देना होगा

प्रति व्यक्ति आय में सुधार और बेरोजगारी दूर करने पर ध्यान देना होगा

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

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बिहार में एक बार फिर राजग की सरकार बनने जा रही है। इसके साथ ही राज्य की आर्थिक नीतियों में भी निरंतरता बने रहने की संभावना है। ऐसे में अर्थविदों का मानना है कि बिहार की आर्थिक विकास दर की रफ्तार जिस तरह से पिछले एक दशक से तेज बनी हुई है, वह रफ्तार आगे भी बनी रहेगी लेकिन नई सरकार के समक्ष राज्य में औद्योगिकीकरण को बढ़ाने और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करने की चुनौती बड़ी होगी।

ऐसे में अर्थविदों का मानना है कि राज्य की नई सरकार को मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। राज्य में पिछले एक दशक में बेहतर सड़क मार्ग के निर्माण और पर्याप्त बिजली आपूर्ति के बाद मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में निजी क्षेत्र को आकर्षित करने की कोशिशों का अब बेहतर परिणाम निकल सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस पर नजर रख रहे हैं।

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने क्या कहा?

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष व बिहार राज्य आर्थिक सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य राजीव कुमार का कहना है, “युवा आबादी बिहार राज्य की सबसे बड़ी संपत्ति है और इसका राज्य के विकास में सबसे बेहतर इस्तेमाल तभी होगा जब यहां रोजगार मिलेगा। रोजगार के अवसर मैन्यूफैक्चरिंग के विस्तार से ही मिलने वाला है।

यह चिंता की बात है कि देश की जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 16 फीसद है लेकिन बिहार की इकोनॉमी में संभवत: आठ फीसद से भी कम है। मेरा मानना है कि बिहार में मैन्यूफैक्चरिंग करने वाली कंपनियों को आकर्षित करने की जमीन भी तैयार है क्योंकि पिछले एक दशक में वहां गांव-गांव में कनेक्टिविटी (सड़क) पहुंच चुकी है और बिजली आपूर्ति भी पर्याप्त है। छोटी व मझोले स्तर की मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों को आकर्षित करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।”

प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार की स्थिति खराब

वैसे राज्य की अर्थव्यवस्था की तस्वीर देखें तो यह साफ होता है कि पिछले एक दशक के दौरान आर्थिक विकास दर के मामले में बिहार देश में सबसे शीर्ष राज्यों में शामिल है लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में स्थिति बहुत ही खराब है।

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2021-22 से वर्ष 2024-25 तक राज्य की आर्थिक विकास दर क्रमश: 10.6 फीसद, 10.6 फीसद, 9.2 फीसद व 9.2 फीसद रही है।

चालू वित्त वर्ष के दौरान भी इसके 10 फीसद रहने की संभावना जताई जा रही है। इससे राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का आकार वर्ष 2011-12 के 2.47 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 9.76 लाख करोड़ रुपये हो गया था। लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में बिहार की रैंकिंग में कोई खास सुधार नहीं हुआ है।

वर्ष 2024-25 में प्रति व्यक्ति आय (स्थिर मूल्य के आधार पर) सिर्फ 36,333 रुपये है जो राष्ट्रीय औसत का एक तिहाई के करीब है। बहुआयामी गरीबी का स्तर काफी कम हुआ है (51.89 फीसद से घटकर 33.76 फीसद) लेकिन अभी भी यह देश में सबसे खराब स्तर है। युवा वर्ग में बेरोजगारी के स्तर में भी बिहार की स्थिति बहुत ही खराब है।

कैसे होगी बेरोजगारी दूर?

कृषि पर आबादी की 70 फीसद से ज्यादा लोगों की निर्भरता इस स्थिति का एक बड़ा कारण है। सीआईआई के बिहार प्रकोष्ठ के अध्यक्ष गौरव शाह भी मानते हैं कि बेरोजगारी को मैन्यूफैक्चरिंग को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर ही दूर किया जा सकता है।

उनका कहना है, “चुनाव से पहले राजग ने जिला वार औद्योगिक पार्क बनाने, बेगूसराय में फार्मा पार्क को बनाने की जो घोषणाएं की थी उसका क्रियान्वयन तत्काल होनी चाहिए। साथ ही राज्य में लेदर व टेक्सटाइल उद्योग के लिए अपार संभावनाएं हैं। इन सभी में रोजगार देने की काफी संभावनाएं हैं जिसकी बिहार को सबसे ज्यादा जरूरत है।”

उद्योग चैंबर फिक्की की महासचिव ज्योति विज ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राजग की भारी बहुमत आने के लिए बधाई दी और दैनिक जागरण को बताया कि “जिस तरह की निर्णायक वोटिंग हुई है उससे उम्मीद है कि सरकार आर्थिक सुधारों के एजेंडे को और मजबूती से आगे बढ़ाएगी विकास के एजेंडे को लेकर ज्यादा मुखर तरीके से कदम उठाएगी।”

लोगों की कमाई कम है, प्रति व्यक्ति आय बढ़े

बिहार में लोगों की प्रति व्यक्ति आय 60,337 रुपये (आरबीआई के मुताबिक) है, जबकि राष्ट्रीय औसत 1,88,892 रुपये का है। जाहिर है, कमाई कम होने से लोग गरीब हैं और पैसों की खातिर राज्य छोड़ कर बाहर भी जाते हैं।

पलायन बड़ी समस्या

बिहार में पलायन कोई नई समस्या नहीं है। यह अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है। बीते दशकों में यह तेजी से बढ़ी है। शुरू में इसका मुख्य कारण गरीबी हुआ करता था, अब इसमें कमाई के साथ पढ़ाई भी जुड़ गया है।

पढ़ने और पढ़ कर कमाने के लिए युवा बड़ी संख्या में बाहर जा रहे हैं। खेती लायक जमीन और कारखानों आदि की कमी के चलते पलायन ज्यादा होता है।

बिहार में 54 फीसदी लोग काम के लिए खेती पर निर्भर हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 46 फीसदी का है। उत्पादन क्षेत्र में स्थिति अलग है। पांच फीसदी कामकाजी लोग ही उत्पादन क्षेत्र में हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर 11 प्रतिशत हैं।

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