बचपन की यादें अमृत है-अजय सिंह सिसोदिया

बचपन की यादें अमृत हैअजय सिंह सिसोदिया

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

000
previous arrow
next arrow
000
000
previous arrow
next arrow

हम अपने गाँव के ही स्कुल मे पढ़ते थे ..तिसरी कक्षा तक अपने बैठने का साधन साथ ले जाया करते …वो साधन था बोरा-चट्टी…! तब परीक्षा तो होती नहीं थी, हा बिन परीक्षा के हमारा बोरा चट्टी सब पास हो जाता था , हम खेल-खेल मे कहा करते कि बोरा-चट्टी सब पास..!
जब चौथी कक्षा मे पहुँचे तब पहली बार हमें परीक्षा देनी पड़ी और प्रश्नपत्र भी मिले ! अब ये समझ मे ना आवे कि आख़िर इसका करना क्या है ? हमरे साथ हमारे मित्र संतोष शर्मा बैठे थे जिन्हें हम ‘शर्मा जी’ कहा करते थे और दुशरे थे हरीश जिनका निकनेम ‘दुलार’ हुआ करता था ,जो वाकइ बड़े दुलारे थे ! खैर शर्मा जी ने सुझाव दिया कि क्यों न इस पेपर को ही उतार दिया जाए अर्थात काँपी & पेस्ट ! शर्मा जी का सुझाव हमें अच्छा लगा और हमने भी हामी भरी तब शर्मा जी ने ऐसे देखा जैसे उनकी फ़तह हो गइ हो और हम भी उनके क़ायल हो गए !

अब हमने वही किया जो शर्मा जी ने कहा था पुरा पेपर ज्यों का‌ त्यों छाप दिया गया फिर कापी भी जमा हुआ और परीक्षा फल पाने का दिन भी आ गया ! उस समय हमारे गाँव के स्कुल राजकिय कन्या मध्य विद्यालय मे परीक्षा परीणाम के दिन उत्सव सा माहौल होता था ! सभी शिक्षक बैठते उनके सामने सभी क्षात्र और पीछे अभिभावक तथा गाँव के शिक्षाप्रेमी सभ्य लोग खड़े होकर परीक्षाफल सुनते और ताली बजाकर उतीर्ण क्षात्रो को खूब प्रोत्साहित करते ! जो भी बेहतर रिजल्ट लाता वह पुरे गांव के सामने हिरो बन‌ जाता था !

तब हमारे परिवार वालों के लिए भी यह बड़ी बात होती थी ! खैर अब जब हमारी कक्षा की बारी आइ तो सबसे पहले दुलार का नाम आया ! दुलार (हरिश) कक्षा मे प्रथम स्थान प्राप्त किया था‌ ! अब शर्मा जी ने मेरी तरफ़ देखा मैं भी मुश्कुराया और मन-ही-मन उसे दाद भी दी ! सोचा कि अब दुशरा और तीसरा स्थान हमारा ही है पर सबकुछ वैसा ही हो जाए जैसा हम सोंचते है तो फिर हम खूद को ही खुदा मानने लगते ! ख़ैर हम ले-देकर पास ज़रूर हो गए ..!

तब हमारे समझ मे ये न आए कि आख़िर दुलार फस्ट कैसे आ गया कही हमारे साथ नाइंसाफ़ी तो नहीं हुइ ! हम भी वही लिखे जो‌ वो लिखा और उसने तो मेरी कांपी देखकर ही नकल‌ की थी ! वह फर्स्ट और मैं केवल पास ! तब लगा था कि हमारे साथ नाइंसाफी हुई है ! दुलार को जानबूझकर विशेष लाभ दिया गया है !आज ये समक्ष नहीं आता कि आख़िर हम पास भी कैसे हो गए !
(ज्ञात रहे कि दुलार हमारी प्रधानाध्यापिका का पुत्र था)
तब जो हमारे स्कुल का हाल था आज वही हाल हमारे देश की राजनीति का है , फ़र्क़ इतना कि तब हमारा भविष्य बिगड़ा पर आज देश !

आभार-अजय सिंह सिसोदिया, सिसवन (सीवान)

  • यह भी पढ़े……………

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!