विकसित भारत @ प्रवासी भारतीय दिवस
प्रवासी भारतीय दिवस पर विशेष
✍🏻 राजेश पाण्डेय
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

भारत में 9 जनवरी को हम सभी प्रवासी भारतीय दिवस के रूप में मनाते है। इसके पीछे इतिहास यह है कि 9 जनवरी 1915 को महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आए थे। इसके बाद स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन तीव्र गति से प्रारंभ हुआ था।
बहरहाल अनुमान है कि तीन करोड़ से अधिक भारतीय विश्व के सौ देशों में प्रवासी के रूप में अपना प्रवास स्थापित किया है। इसे देखते हुए केन्द्र की तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने वरिष्ठ लोकसेवक लक्ष्मी मल्ल सिंघवी के नेतृत्व में इन प्रवासी भारतीयों की संभावनाओं को सूक्ष्म रूप से तलाशने हेतु एक समिति का गठन किया,जिनके प्रतिवेदन पर 2003 से प्रवासी भारतीय दिवस मनाने का निर्णय किया गया।
यह दिवस प्रत्येक वर्ष 9 जनवरी को मनाया जाता रहा, जो दो दिनों तक चलता है। इसमें विश्व के कोने-कोने में रह रहे प्रवासी जिन्होंने अपने देश एवं विश्व के लिए उत्कृष्ट कार्य किए हैं उन्हें सम्मानित किया जाता है। यह परंपरा 2014 तक प्रतिवर्ष चलती रही लेकिन इस कार्यक्रम में मोदी सरकार ने संशोधन किया और 2015 से यह सम्मेलन द्विवार्षिक हो गया। प्रत्येक दो वर्ष पर यह कार्यक्रम भारत के विभिन्न नगरों में आयोजित होता है।
पिछली बार 18वां प्रवासी भारतीय सम्मेलन उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में हुई थी। इससे पहले 2023 में यह सम्मेलन मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में हुई थी। इस सम्मेलन में सीवान जिला में जीरादेई प्रखंड के हीर मकरियार ग्राम निवासी एवं लंदन प्रवासी डॉ. उदेश्वर सिंह ने भाग लिया था। अब अगला 19वां सम्मेलन 2027 में होगा। नगर का चयन अभी नहीं हुआ है।
सम्मेलन का उद्देश्य

प्रवासी भारतीय दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि विश्व के कोने-कोने में कई प्रवासी राष्ट्र अध्यक्ष, शासन अध्यक्ष एवं सेवा,शिक्षा, वाणिज्य व व्यापार के क्षेत्र में उच्च स्थान पर पहुंच गए है। इसका लाभ भारत को मिलता है। ऐसे में भारत से उनके संबंध को और प्रगति देने के लिए इस कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। साथ ही उक्त देश से भारत के व्यापार एवं वाणिज्य से संबंधित सभी स्तरों पर वार्ता की सुगमता के लिए भी यह समारोह आयोजित होता है।
प्रवासी भारतीयों की उक्त भूमि को मातृभूमि एवं भारत को पुण्य भूमि मानने वाले यह प्रवासी निरंतर भारत की सभ्यता-संस्कृति-संस्कार एवं परंपरा से संबद्ध रहे। इसके लिए भी यह दिवस आयोजित किया जाता है। क्योंकि निरंतर विकसित हो रहे भारत के निर्माण में इन प्रवासी भारतीयों का अहम योगदान है।
जबकि भारत एक सांस्कृतिक वांग्मय है। पुरातन युग से सहिष्णुता इसकी पहचान है। विश्व को विद्या के रूप में नालंदा, तक्षशिला एवं विक्रमशिला विश्वविद्यालय शिक्षा रूपी अवदान है, तो वही महामानव बुद्ध के रूप में भारत ने ‘आत्म दीपों भव’ को स्थापित किया है। भारत के विचार व व्यवहार की युक्ति ‘वसुधैव कुटुंबकम’ एवं ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ अमर वाक्य हैं जिसे प्रत्येक भारतीय अपने व्यवहार में बनाए रखना है।
भारत की यह विद्या रही है कि हमें मानवता के कल्याण के लिए ही कार्य करना है। यही कारण है की भारत की सभ्यता-संस्कृति, संस्कार एवं परंपरा पिछले पांच हजार वर्षों से अक्षुण्ण है अनवरत व निरंतर प्रवाहमय है।
बहरहाल अगर भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र के रूप में उभर कर आना है तो इन प्रवासी भारतीयों का सम्मान एवं उनके द्वारा उपलब्ध कराए गये तकनीक व आर्थिक सहायता हमारे लिए अनिवार्य होंगे।

