क्या हमारे समाज को गांधी की आवश्यकता है?

क्या हमारे समाज को गांधी की आवश्यकता है?

पुण्यतिथि पर विशेष

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

गांधी की ज़रूरत किसी मूर्ति के लिए नहीं है। न चौराहे के लिए, न साल में दो दिन के पुष्पांजलि-अनुष्ठान के लिए। गांधी की ज़रूरत उस बेचैन क्षण में है, जब मनुष्य अपने भीतर ही मनुष्य को खो देता है। जब भाषा से करुणा निकल जाती है और तर्क से विवेक। जब जीत इतनी ज़रूरी हो जाती है कि सच बोझ लगने लगता है।

गांधी किसी विचारधारा का नाम नहीं, एक असुविधा हैं। वे हमेशा सवाल बनकर खड़े रहते हैं—हमारे तरीक़ों पर, हमारी जल्दी पर, हमारी हिंसा पर। इसलिए गांधी आसान नहीं हैं। वे नारे नहीं बनते, वे परीक्षा लेते हैं और आज का समय परीक्षा से भागने का समय है।

आज दुनिया तेज़ है। इतनी तेज़ कि रुकना अपराध लगता है। गांधी रुकने की बात करते हैं—सोचने के लिए, सुनने के लिए, दूसरे की पीड़ा को अपने भीतर उतरने देने के लिए। आज का मनुष्य दौड़ रहा है—आगे, ऊपर, औरों से आगे। गांधी पीछे देखने को कहते हैं—कि कहीं कोई छूट तो नहीं गया। कोई कुचला तो नहीं गया। कोई ऐसा तो नहीं, जिसे हमने विकास कहकर मिटा दिया।

गांधी की ज़रूरत इसलिए है कि हम ताक़त को ही सत्य समझने लगे हैं। जिसके पास संख्या है, शोर है, सत्ता है—वही सही है। गांधी कहते हैं: नहीं। सत्य अक्सर अकेला होता है। कमजोर दिखता है। धीरे बोलता है। लेकिन वही टिकता है। यह बात आज सबसे ज़्यादा अप्रासंगिक लगती है—और इसी कारण सबसे ज़्यादा ज़रूरी भी।

हमने हिंसा को केवल हथियारों से जोड़ दिया है। गांधी हिंसा को सूक्ष्म स्तर पर पहचानते हैं—शब्दों में, उपेक्षा में, मज़ाक में, चुप्पी में। जब किसी की पहचान को हँसी बना दिया जाता है, जब किसी की भाषा को गँवार कहा जाता है, जब किसी के दुख पर हम स्क्रॉल कर आगे बढ़ जाते हैं—यह सब हिंसा है। बिना खून के, बिना आवाज़ के। गांधी इस अदृश्य हिंसा के विरुद्ध खड़े हैं।

आज राजनीति में जीत सबसे बड़ा मूल्य है। साधन गौण हैं। गांधी साधनों को ही मूल्य बना देते हैं। वे कहते हैं—गलत रास्ते से पहुँचा गया सही गंतव्य भी गलत हो जाता है। यह बात आज की राजनीति को सबसे ज़्यादा चुभती है। क्योंकि आज हर कोई जल्दी पहुँचना चाहता है—चाहे रास्ता जलता हुआ ही क्यों न हो।

गांधी की ज़रूरत इसलिए है कि धर्म अब ईश्वर तक नहीं, पहचान तक सीमित हो गया है। आस्था अब विनम्र नहीं रही, आक्रामक हो गई है। गांधी का धर्म भीतर की सफ़ाई है—अहंकार की, क्रोध की, लोभ की। वे मंदिर-मस्जिद से पहले मनुष्य को पवित्र करना चाहते हैं। आज यह बात हास्यास्पद लगती है—लेकिन शायद इसी हास्य में हमारी त्रासदी छिपी है।

गांधी की भाषा साधारण है। इतनी साधारण कि विद्वानों को खटकती है। वे बड़े शब्दों से बचते हैं। क्योंकि बड़ा शब्द अक्सर छोटे आदमी को दबाने के लिए इस्तेमाल होता है। आज जब भाषा हथियार बन चुकी है, गांधी की सादगी एक प्रतिरोध है। वे फुसफुसाकर भी शोर को चुनौती देते हैं।

आज का समय नायक चाहता है—तेज़, निर्णायक, कठोर। गांधी नायक नहीं बनते। वे नेतृत्व को सेवा बना देते हैं। वे आगे चलने से पहले साथ चलने की बात करते हैं। आज यह मॉडल अप्रभावी कहा जाता है लेकिन क्या हमने कभी ईमानदारी से इसे आज़माया?

गांधी की ज़रूरत सबसे ज़्यादा वहाँ है जहाँ उनका नाम सबसे अधिक लिया जाता है क्योंकि नाम का दोहराव अक्सर विचार की अनुपस्थिति का प्रमाण होता है। गांधी को हमने इतना पुकार लिया है कि उनकी आवाज़ सुनाई देना बंद हो गई है। वे हमारे पोस्टरों पर हैं, पाठ्यक्रमों में हैं, भाषणों में हैं—लेकिन हमारे व्यवहार में नहीं हैं। गांधी की ज़रूरत इस विसंगति को तोड़ने के लिए है।

आज नैतिकता एक निजी शौक बन गई है। जिसे फुर्सत हो, वही नैतिक हो। सार्वजनिक जीवन में नैतिकता को भोलेपन का दूसरा नाम मान लिया गया है। गांधी इस अलगाव को स्वीकार नहीं करते। वे नैतिकता को सार्वजनिक जोखिम बनाते हैं। वे कहते हैं—जो सही है, वह तभी सही है जब उसे सबके सामने, सबके लिए किया जा सके। यह बात आज असुविधाजनक है, इसलिए गांधी को ‘आदर्शवादी’ कहकर किनारे कर दिया जाता है।

गांधी की ज़रूरत इसलिए भी है कि हमने साधनों को इतना जटिल बना लिया है कि लक्ष्य ही धुंधला हो गया है। बड़े-बड़े सिस्टम हैं, बड़े-बड़े शब्द हैं—नीति, रणनीति, प्रबंधन। गांधी छोटे प्रश्न पूछते हैं—क्या इससे किसी का अपमान तो नहीं हो रहा? क्या इससे कोई भूखा तो नहीं रह गया? ये छोटे प्रश्न आज की बड़ी योजनाओं में फिट नहीं बैठते। लेकिन शायद इन्हीं के बिना कोई भी योजना मनुष्य-विरोधी हो जाती है।

आज का समय निर्णयों से भरा है, लेकिन उत्तरदायित्व से खाली। गांधी निर्णय को आत्म-उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं। वे कहते हैं—अगर तुमने चुना है, तो उसके परिणाम भी तुम्हारे हैं। आज हम परिणामों को सिस्टम पर, इतिहास पर, दूसरों पर डाल देते हैं। गांधी यह सुविधा नहीं देते। वे आईना रखते हैं—और आईने से बचना हमेशा कठिन होता है।

गांधी की ज़रूरत इसलिए है कि हमने पीड़ा को आँकड़ों में बदल दिया है। इतने मरे, इतने विस्थापित, इतनी बेरोज़गारी। गांधी आँकड़े नहीं देखते, चेहरा देखते हैं। वे संख्या के पीछे छिपे मनुष्य को पहचानते हैं। आज जब त्रासदी भी ग्राफ़ में बदल जाती है, गांधी का मानवीय दृष्टिकोण एक बाधा लगता है—लेकिन वही बाधा हमें पूरी तरह पत्थर बनने से रोकती है।

आज का समय बहस का है, संवाद का नहीं। हर कोई बोलना चाहता है, सुनना कोई नहीं चाहता। गांधी सुनने को राजनीतिक कर्म बनाते हैं। वे विरोधी की बात सुनते हैं—सहमति के लिए नहीं, समझ के लिए। यह आज की संस्कृति के विरुद्ध है, जहाँ सुनना हार माना जाता है। गांधी बताते हैं—सुनना साहस है, कमजोरी नहीं।

गांधी की ज़रूरत इसलिए है कि हमने श्रम को केवल उत्पादन से जोड़ दिया है। गांधी श्रम को सम्मान से जोड़ते हैं। उनके लिए हाथ का काम बौद्धिक श्रम से कम नहीं। आज जब श्रम विभाजन भी सामाजिक विभाजन बन गया है, गांधी की समानता हमें असहज करती है। वे पूछते हैं—तुम्हारी थाली में जो है, वह किसके हाथों से आया? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है।

आज का समय स्मृति-विहीन है। हम हर दिन नया क्रोध पैदा करते हैं और पुराने अन्याय भूल जाते हैं। गांधी स्मृति को नैतिक अनुशासन मानते हैं। वे भूलने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन बदले के भी पक्ष में नहीं। वे न्याय चाहते हैं—लेकिन प्रतिशोध के बिना। यह संतुलन आज लगभग असंभव माना जाता है। लेकिन शायद असंभव लगने वाली चीज़ों की ही सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।

गांधी की ज़रूरत इसलिए है कि हमने सफलता को सुख का पर्याय बना लिया है। गांधी सुख को शांति से जोड़ते हैं। वे कहते हैं—जो भीतर अशांत है, वह कितना भी सफल क्यों न हो, दरिद्र है। आज की दुनिया इस भाषा को नहीं समझती, क्योंकि यहाँ बेचैनी ही ईंधन है। गांधी इस ईंधन को ख़त्म करने की बात करते हैं—इसलिए वे ख़तरा लगते हैं।

आज हर व्यक्ति किसी न किसी पहचान में बंद है—जाति, धर्म, भाषा, विचारधारा। गांधी पहचान को अस्थायी मानते हैं, मनुष्य को स्थायी। वे पहचान से इंकार नहीं करते, लेकिन उसे अंतिम सत्य भी नहीं मानते। आज, जब पहचान ही राजनीति की सबसे बड़ी मुद्रा है, गांधी का मनुष्य-केंद्रित दृष्टिकोण अप्रचलित लगता है—लेकिन शायद वही एकमात्र रास्ता है।

गांधी की ज़रूरत इसलिए है कि हमने साधारण जीवन को हीन समझ लिया है। गांधी साधारण को असाधारण नैतिक साहस बनाते हैं। वे कम में जीते हैं, ताकि अधिक को बाँटा जा सके। आज, जब दिखावा सफलता का प्रमाण बन गया है, गांधी का सादा जीवन हमें आईना दिखाता है—और आईने से हम अक्सर नज़रें चुरा लेते हैं।

गांधी की ज़रूरत इसलिए है कि वे हमें किसी और की तरह नहीं, अपने ही भीतर देखने को कहते हैं। वे कहते हैं—दुनिया बदलनी है तो पहले स्वयं बदलो। यह वाक्य बहुत सुना हुआ है, इसलिए हल्का लगने लगा है। लेकिन इसे सच में जीना आज भी सबसे कठिन काम है।

गांधी कोई विरासत नहीं, एक चुनौती हैं। वे हमें चैन से नहीं रहने देते। वे हर सुविधा पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। वे याद दिलाते हैं कि मनुष्य होना एक निरंतर अभ्यास है, कोई हासिल की हुई स्थिति नहीं।

और शायद इसी कारण—इस थकाऊ, शोरगुल से भरे, आत्ममुग्ध समय में—गांधी की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।

आभार- परिचय दास सर

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