चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि निर्वासन हमारा काम नहीं

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

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चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसका अधिकार क्षेत्र केवल मतदाता सूची में पंजीकरण के लिए नागरिकता तय करने तक सीमित है। आयोग न तो किसी व्यक्ति को देश से बाहर निकाल सकता है और न ही यह तय कर सकता है कि किसी के पास भारत में रहने का वैध वीजा है या नहीं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने जोरदार दलीलें पेश कीं।

चुनाव आयोग का अधिकार क्षेत्र सिमित

यह सुनवाई बिहार सहित कई राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हो रही है, जिनमें चुनाव आयोग की शक्तियों, नागरिकता और मतदान के अधिकार से जुड़े संवैधानिक प्रश्न उठाए गए हैं।

द्विवेदी ने संविधान के अनुच्छेद 326 का हवाला देते हुए कहा कि वयस्क मताधिकार के तहत मतदाता पंजीकरण के लिए तीन शर्तों का पूरा होना जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘यदि उचित जांच के बाद यह पाया जाता है कि कोई व्यक्ति नागरिक नहीं है और फिर भी उसका नाम मतदाता सूची में बना रहता है, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ होगा।’

उन्होंने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद ने स्पष्ट किया है कि केवल भारतीय नागरिक ही मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग का दायरा सीमित है।

उन्होंने कहा, ‘हम केवल मतदाता पंजीकरण के उद्देश्य से नागरिकता तय कर सकते हैं। हम न तो किसी को निर्वासित कर सकते हैं और न ही यह तय कर सकते हैं कि किसी व्यक्ति के पास भारत में रहने का वीजा है या नहीं।’

आयोग किसी को निर्वासित नहीं कर सकता

याचिकाकर्ता एडीआर की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि सवाल ये है कि क्या आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार है। इस पर सीजेआइ ने कहा कि आयोग नागरिकता का व्यापक अर्थों में निर्णय नहीं कर रहा, बल्कि केवल यह पहचान कर रहा है कि कोई व्यक्ति मतदाता बनने के लिए नागरिक है या नहीं।

पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि चुनाव आयोग नागरिकता देने वाला प्राधिकरण नहीं है, लेकिन वह यह जांच कर सकता है कि नागरिक होने का दावा करने वाला व्यक्ति मतदाता सूची के लिए वास्तविक है या नहीं।

SIR प्रक्रिया पर उठे आरोपों का जवाब देते हुए द्विवेदी ने कहा कि करीब 65 लाख मतदाताओं में से किसी एक व्यक्ति ने भी सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायत नहीं की है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया में मृत्यु, दोहराव या पलायन जैसे कारणों से नाम हटाए जाना स्वाभाविक है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है कि गैर-नागरिकों के नाम मतदाता सूची में न हों। वहीं मुख्य न्यायाधीश ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि अगले चुनाव तक हमें आनलाइन वोटिंग देखकर हैरानी नहीं होगी।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ कर रही थी सुनवाई

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने निर्वाचन आयोग की ओर से ये दलीलें पेश कीं। पीठ ने उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई फिर से शुरू की, जिनमें बिहार सहित कई राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया करने के निर्वाचन आयोग के फैसले को चुनौती दी गई थी और निर्वाचन आयोग की शक्तियों के दायरे, नागरिकता और मतदान के अधिकार पर महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए गए थे।

आयोग के वकील ने एसआईआर प्रक्रिया का बचाव किया

पीठ ने द्विवेदी की विस्तृत दलीलें सुनीं, जिन्होंने एसआईआर प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि यह पूरी तरह से चुनाव आयोग के संवैधानिक और वैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर है। उन्होंने इस तर्क को भी खारिज किया कि यह राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) जैसी कोई समानांतर नागरिकता-निर्धारण प्रक्रिया है। उन्होंने यह तर्क दिया कि निर्वाचन आयोग की देखरेख में कार्य करने वाला निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) चुनावी उद्देश्यों के लिए सीमित पूछताछ करने में सक्षम है।

चुनाव, मतदाता सूची और चुनाव संचालन से संबंधित मामलों में निर्वाचन आयोग वास्तविक रूप से (वास्तव में) प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है। वरिष्ठ वकील ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 146, विशेष रूप से धारा 146ए से 146सी का हवाला देते हुए कहा कि संसद ने निर्वाचन आयोग को सुनवाई करने, निर्णय लेने और यहां तक कि मतदाता सूची से संबंधित प्रश्नों पर निर्णय लेने के लिए दीवानी अदालत के समान शक्तियों का प्रयोग करने के लिए एक विस्तृत वैधानिक तंत्र प्रदान किया है।

चुनाव आयोग के वकील ने दूसरे देश की नागरिकता का दिया उदाहरण

द्विवेदी ने अदालत को बताया, ‘यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त कर लेता है या उस पर किसी अन्य देश की नागरिकता प्राप्त करने का आरोप है तो अंततः निर्वाचन आयोग ही चुनावी उद्देश्यों के लिए इस मुद्दे की जांच करता है और उसकी राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी होती है।’ उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी जांच केवल मतदाता सूची में शामिल होने की पात्रता निर्धारित करने तक ही सीमित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एसआईआर के दौरान प्रतिकूल निष्कर्ष आने का परिणाम केवल मतदाता सूची से व्यक्ति का नाम हटाना होगा।

द्विवेदी ने कहा, ‘इससे स्वतः ही सिर्फ उसी तथ्य के आधार पर निर्वासन होना अनिवार्य नहीं है।’ उन्होंने कहा कि उचित मामलों में इसे केंद्र सरकार को जांच और नागरिकता अधिनियम, विदेशी अधिनियम और संबंधित कानूनों के तहत संभावित कार्रवाई के लिए भेजा जा सकता है।

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