पिताजी का व्यक्तित्व हम सभी के लिए अनुकरणीय है-अजय सिंह सिसोदिया
आज मेरे आदर्श मेरे बाबुजी का जन्मदिन है-अजय सिंह सिसोदिया
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

एक पुत्र के लिए उसका पहला हीरो पिता ही होते हैं.. वह हमेंशा अपने पिता की तरह बनना चाहता है..उन्ही के नक्से-कदम पर चलना चाहता है..प्राकृतिक रूप से भी पिता-पुत्र मे कई समानताएँ होती है..!
मेरा हीरो भी मेरे बाबुजी हैं ..मैं हमेशा उन्ही की तरह बनना चाहता था.. जब हम छोटे थे तब अपने अास-पास लोगों को खैनी-बिड़ी इत्यादि का सेवन करते देखतें थे.. जिसे देख मुझे चिढ़ होती थी.. तब हम अपने दोस्तों मे गर्व से कहा करते थे कि “हमार बाबुजी कवनो नसा ना करेनी आ हमहु जीवन मे कबो नसा ना करब$ ” और आज तक मैने कोई नसा नही किया..।
साहित्य और संगीत मे मेरा रूचि भी बाबुजी के बदौलत ही है.. बाबुजी उस वक्त के ग्रेजुएट है जब गाँव मे ढुढने से दो-चार शिक्षित लोग मिलते थे..बाबुजी के लेखनी का सब कायल थे.. आज फेसबुक का जमाना है लोग अपनी बात झट से लोगों तक पहुंचा देते हैं तब न जाने कितने लोग गुमनाम ही रह गए.. बाबुजी को अपनी कला दिखाने और अपनी कविता सुनाने का अवसर गाँव मे होने वाले सरस्वती पूजा के दिन ही प्राप्त होता था.. जब मंच पर बाबुजी कविता पढते तब लोग बड़ी चाव से सुना करते ..और खुब तालियाँ गड़गड़ाती… उन्ही तालियों के बीच मै भी ख़ूब खुश होता था.. सब कुछ ठीक से याद नही पर एक कविता जिसपर खुब तालियाँ बजती वो थी ‘अगहन के अगुआई ‘ और दुशरी ‘गदहचर जनि चर$’ ..और न जाने कितनी कविताएँ थी जो याद नहीं…

सरस्वती पूजा के दिन ही रात में नाटक हुआ करता था.. जिसमे हर साल बाबुजी मुख्य भुमिका मे रहते थे.. चाहे वो ‘जहांगीर का इंसाफ’ मे जहांगीर का शानदार अभिनय तो दुशरी तरफ ‘पाड़े बाबा’ और ‘घोकनाथ’ के अभिनय के बाद लोग बाबुजी को इसी नाम से पुकारने लगे थे..घोकनाथ का एक डायलग था ‘ घोकनाथ घोकु डल्डा मे डल्डा मिलाके ‘ खूब मशहुर हुआ था.. हर सरस्वती पूजा के बाद बाबुजी का उपनाम बदल जाता था.. कभी पांडे बाबा तो कभी घोकनाथ तो खभी लंगड़ा बाबा.. उनके नाम के साथ साथ मेरे सभी मित्र भी हमे उसी नाम से पुकारने लगते ।
बाबुजी का एक बात मुझे हमेशा याद रहता है…जब हम मिडिल स्कुल से हाई स्कुल मे जाने लगे तब उन्होने एक बात कही थी कि ..’हाई स्कुल मे खाली तु ही लोग ना अपना घर परिवार के मान-सम्मान ले के जा रहल बार$ लोग.. बाहर हमेशा इयाद रखिह$ लोग कि घर में तहरो लोगिन के छव गो बहिन बारी सन$’ बाबुजी ने बातों बातों मे ही बहुत बड़ी सीख हमे दी थी ..अब उम्र भर के लिए सबक बन गई है…!
बाबुजी का एक सिद्धांत हैं ‘अतिथि देवो भव:’ जब कभी कोई घर आता है उसकी सेवा कैसे की जाती है.. कैसे एक पैर खड़े होकर अतिथि सत्कार किया जाता है.. कोई बाबुजी से सीखे..आपसे बहुत कुछ सीखा पर विपरीत परिस्थितियों मे भी कैसे मुश्कुराते रहते हैं ये नही सीख पाया..
आज मेरे आदर्श मेरे बाबुजी का जन्मदिन है…भगवान आपको स्वस्थ रखे.. आपका आशीर्वाद हमेशा बना रहे.. बाबुजी के डायरी के कुछ पन्ने जो बड़ी सहेज कर रखें है.. आप सब के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ..
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