श्रद्धापूर्वक मनाई गई जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंतीे

श्रद्धापूर्वक मनाई गई जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंतीे

अभावों की मिठास: डॉ.मधुछंदा चक्रवर्ती

WhatsApp Image 2026-01-02 at 12.09.56 PM
previous arrow
next arrow
WhatsApp Image 2026-01-02 at 12.09.56 PM
WhatsApp Image 2026-01-02 at 12.09.56 PM
previous arrow
next arrow

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

सारण में मांझी नगर पंचायत के हरदेव यादव कन्या उच्च विद्यालय के परिसर में शनिवार को कर्पूरी विचार मंच के तत्वावधान में जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती धूमधाम से मनाई गई। कार्यक्रम के शुरुआत में नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने जननायक के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें याद किया। इसके साथ ही कार्यक्रम के संयोजक नागेन्द्र ठाकुर द्वारा आगन्तुकों को अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया गया। अपने सम्बोधन में नाई समाज के अध्यक्ष प्रभुनाथ ठाकुर ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि कर्पूरी ठाकुर सामाजिक समता के प्रबल योद्धा थे।

उन्होंने बिहार में विषमता, सामंतवाद, पूंजीवाद और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध अनवरत संघर्ष किया। जिसके लिए ही उन्हें जननायक की उपाधि दी गई। उन्होंने कहा कि कर्पूरी ठाकुर गरीबों के रहनुमा बनकर सदैव उनकी सेवा में लगे रहे। शोषितों व वंचितों के अधिकार के लिए संघर्षरत रहे। वही ई सौरभ सन्नी ने कर्पूरी ठाकुर की जीवनी पर विस्तार से चर्चा की। कहा कि कर्पूरी ठाकुर ने गरीबों, पिछड़ों व महिलाओं के उत्थान के लिए कई कार्य किया।

उनका जीवन अनुकरणीय है।जननायक कर्पूरी ठाकुर के प्रति अपना आदर एवं सम्मान प्रकट किया। उन्होंने कहा की जननायक कर्पूरी ठाकुर का सादगीपूर्ण जीवन हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।इसके साथ ही सभा को मुख्य पार्षद विजया देवी, कार्यपालक पदाधिकारी रक्षा लोहिया, स्वक्षता पदाधिकारी सुमन कुमारी, कृष्णा सिंह पहलवान,राजेंद्र प्रसाद ठाकुर झुंझुनू ठाकुर , आनंदी ठाकुर, राजेश ठाकुर, डॉक्टर पंकज ठाकुर, सत्येंद्र ठाकुर राहुल ठाकुर मोहम्मद असलम, उमाशंकर ओझा आदि ने संबोधित किया कार्यक्रम की अध्यक्षता सरपंच सुखाड़ी ठाकुर ने किया।उद्घाटन मनोज प्रसाद ने किया। संचालन रंजन शर्मा ने किया। कार्यक्रम समापन के पश्चात सैकड़ों जरूरत मन्द लोगो के बीच कम्बल वितरण किया गया।

अभावों की मिठास: डॉ.मधुछंदा चक्रवर्ती


सिलचर की सर्द हवाएं हड्डियों को कँपा रही थीं। रूपक ने अपनी फटी हुई चादर को थोड़ा और कस लिया। वह एक दिहाड़ी मजदूर था, जिसके हाथों की लकीरें ईंटें ढोते-ढोते घिस चुकी थीं। उसकी पत्नी नैनामती दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर शाम को जब घर लौटती, तो दोनों की थकान एक-दूसरे को देख कर और बढ़ जाती।

“कल पौष संक्रांति है,” नैनामती ने चूल्हे की राख साफ करते हुए धीरे से कहा। “मुन्ना पूछ रहा था कि क्या इस बार उसे भी ‘चुंगा पीठा‘ खाने को मिलेंगे?”

रूपक खामोश रहा। जेब में सिर्फ कुछ सिक्के थे, जिनसे अगले दो दिन का राशन भी मुश्किल था। संक्रांति का मतलब था—नए कपड़े, खजूर का गुड़ (नोलन गुड़), बिरौन चावल का पीठा, तिल के लड्डू । गरीबी के इस दौर में ये चीजें किसी शाही दावत से कम नहीं थीं।

अगली सुबह, पूरा शहर उत्सव की तैयारी में था। रूपक काम की तलाश में चौक पर खड़ा रहा, लेकिन कड़ाके की ठंड के कारण कंस्ट्रक्शन का काम बंद था। वह खाली हाथ घर लौटने लगा, तो रास्ते में उसे खेतों से ’नेरा’(पराली) ले जाते लोग दिखे। उसने सोचा, ‘भले पेट खाली रहे, पर अपने बच्चे के लिए छोटा सा ’मेड़ा–मेड़ी घर’ तो बना ही सकता हूँ।’ उसने कुछ गिरे हुए बाँस और पराली इकट्ठा की और शाम तक आंगन में एक नन्हा सा मेड़ा–मेड़ी घर खड़ा कर दिया। मुन्ना की आँखों में चमक देख उसे पल भर की खुशी मिली, पर पेट की भूख और त्योहार का अधूरापन उसे साल रहा था।

तभी नैनामती आई, उसकी आँखों में आँसू थे। जिस घर में वह काम करती थी, वहां उसे आज छुट्टी दे दी गई थी और पगार भी अगले हफ्ते मिलने वाली थी। उम्मीद की आखिरी किरण भी धुंधली पड़ गई।

तभी दरवाजे पर एक पुरानी साइकिल की घंटी बजी। वह उनके पुराने मालिक, प्रमोद बाबू थे। रूपक सालों पहले उनके बागान में काम करता था। प्रमोद बाबू के हाथ में एक भारी थैला था।

“रूपक रे! घर पर है क्या?” उन्होंने आवाज दी। “आज शहर आया था, सोचा तुझे पौष संक्रांति की कुछ सामग्री दे दूँ। तेरे हिस्से का पुराना बकाया भी बाकी था।”

थैले में चावल, मैदा,आटा, कुछ मीठे आलू , खजूर के गुड़ की एक भेली और ताज़ा नारियल था। रूपक और नैनामती की आँखों में कृतज्ञता के आँसू छलक आए। वह महज राशन नहीं, एक उम्मीद थी।

रात के सन्नाटे में, नैनामती ने सिलहटी परंपरा के अनुसार चूल्हा सुलगाया। उसने चावल के आटे को गूँथकर नन्हे-नन्हे चुंगा पीठा’ और पाटीशापटा बनाए। दूध तो कम था, पर गुड़ की खुशबू ने पूरे झोपड़े को महका दिया। उधर रूपक ने आंगन में पवित्र ‘बौनी’ (धान की बालियां) बांधी, ताकि घर में बरकत बनी रहे।

अगली सुबह सूरज निकलने से पहले, उन्होंने मुन्ना के साथ मिलकर मेड़ा– मेड़ी घर में अग्नि प्रज्वलित की। कड़कड़ाती ठंड में आग की तपिश और हाथ में गरम-गरम पीठे का कटोरा—रूपक और नैनामती के लिए यह किसी भी बड़े उत्सव से बढ़कर था।

अभावों के बीच, पुराने मालिक की उदारता और अपनी जड़ों के प्रति प्रेम ने उनकी संक्रांति को सार्थक कर दिया था। मुन्ना के चेहरे पर गुड़ की मिठास और मुस्कान देखकर रूपक को लगा कि उसकी दिहाड़ी आज वसूल हो गई है।

आभार: Dharmendra Rastogi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!