प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी

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संत रैदास जी के जन्मदिवस पर विशेष

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

संत रविदास का जन्म 15वीं शताब्दी में, 1377 ई. के आसपास, वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में हुआ था

ऐसा चाहूँ राज मैं,
जहाँ मिले सबन को अन्न।
छोट-बड़ो सब सम बसे,
रैदास रहे प्रसन्न॥

रैदास का साहित्य पढ़ते हुए सबसे पहले जो अनुभूति आती है, वह यह कि यहाँ शब्द किसी वैचारिक घोषणा-पत्र की तरह खड़े नहीं हैं बल्कि अनुभव की धूप में तपे हुए हैं। यह तपन ही उनकी कविता को विचार से अधिक जीवन के निकट ले जाती है। रैदास के यहाँ भक्ति कोई पलायन नहीं बल्कि संसार में रहते हुए संसार की कठोरताओं को पहचानने की कला~प्रक्रिया है। उनके पदों में ईश्वर की खोज किसी दूरस्थ, अलौकिक लोक में नहीं बल्कि उसी मिट्टी में है जहाँ मनुष्य अपमान, श्रम और पीड़ा के साथ जीता है।

रैदास की भाषा में जो सहजता दिखाई देती है, वह साधारणपन नहीं है। यह वह सहजता है जो गहरे आत्मविश्वास से आती है। वे जानते हैं कि जिस समाज ने उन्हें हाशिए पर रखा है, उसी समाज की भाषा में अपनी बात कहना सबसे बड़ा हस्तक्षेप है। इसलिए उनके यहाँ अलंकारों का बोझ नहीं बल्कि अनुभव की स्पष्टता है। शब्द कम हैं पर अर्थ बहुस्तरीय। एक-एक पंक्ति अपने भीतर सामाजिक इतिहास का भार उठाए हुए है।
उनकी भक्ति में विनय है पर दीनता नहीं। यह फर्क बहुत महीन है और यहीं रैदास कबीर से अलग एक स्वतंत्र स्वर निर्मित करते हैं। कबीर का स्वर जहाँ कई बार तीखा, आक्रामक और व्यंग्यपूर्ण हो उठता है, वहीं रैदास का स्वर स्थिर, संयत और गहन करुणा से भरा हुआ है।

यह करुणा किसी नैतिक उपदेश से नहीं बल्कि सह-अनुभूति से जन्म लेती है। वे जिस पीड़ा को जानते हैं, उसी से बोलते हैं।

रैदास के साहित्य में एक ‘नगर’ की कल्पना बार-बार आती है—बेगमपुरा। यह केवल एक धार्मिक स्वप्न नहीं बल्कि सामाजिक न्याय की काव्यात्मक संकल्पना है।

बेगमपुरा ऐसा नगर है जहाँ कोई दु:खी नहीं, कोई कर नहीं, कोई जाति नहीं। यह कल्पना अपने समय में जितनी क्रांतिकारी थी, आज भी उतनी ही प्रश्नवाचक है। यह हमें याद दिलाती है कि भक्ति आंदोलन केवल आत्मा की मुक्ति का आंदोलन नहीं था बल्कि सामाजिक कल्पना का भी आंदोलन था।

रैदास के यहाँ शरीर और आत्मा का द्वंद्व नहीं बल्कि उनका सह-अस्तित्व है। वे शरीर को हेय नहीं मानते क्योंकि शरीर ही श्रम करता है, सहता है और जीता है। इसीलिए उनकी भक्ति जीवन-विरोधी नहीं होती। वे संसार को छोड़ने की बात नहीं करते बल्कि संसार को बेहतर बनाने की आकांक्षा रखते हैं। यह आकांक्षा किसी राजनीतिक घोषणापत्र की तरह नहीं बल्कि कविता की कोमलता में प्रकट होती है।

उनकी कविता में जो संगीतात्मकता है, वह केवल छंद या लय का परिणाम नहीं है। यह उस जीवन-लय से आती है जो श्रम, प्रतीक्षा और आशा के बीच चलती रहती है। रैदास के पद गाए जाते हैं, क्योंकि वे बोलने से पहले सुने जाने की इच्छा रखते हैं। यह श्रवण-परंपरा ही उनकी कविता को लोक के निकट रखती है।

समालोचना की दृष्टि से देखें तो रैदास का साहित्य हमें भक्ति को नए सिरे से समझने के लिए विवश करता है। यहाँ भक्ति सत्ता के साथ समझौता नहीं करती, न ही वह केवल आंतरिक साधना बनकर रह जाती है। यह भक्ति सामाजिक स्मृति का हिस्सा है। यही कारण है कि रैदास केवल एक संत नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप हैं।

आज के समय में रैदास को पढ़ना केवल ऐतिहासिक रुचि का विषय नहीं बल्कि वर्तमान की बेचैनियों से संवाद का एक तरीका है। जब समाज फिर से वर्ग, जाति और वर्चस्व की नई भाषाएँ गढ़ रहा है, तब रैदास की कविता हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की गरिमा किसी जन्मसिद्ध विशेषाधिकार से नहीं, बल्कि उसके होने मात्र से आती है।

रैदास का साहित्य इसीलिए टिकाऊ है। वह समय के साथ पुराना नहीं पड़ता बल्कि हर नए समय में नए अर्थों के साथ सामने आता है। उनकी कविता किसी संग्रहालय की वस्तु नहीं, बल्कि जीवित परंपरा है—ऐसी परंपरा, जो चुपचाप, बिना शोर किए, मनुष्य के पक्ष में खड़ी रहती है।

रैदास का साहित्य उस क्षण का साहित्य है जब भाषा पहली बार अपने पैरों पर खड़ी होती है~बिना किसी राजाश्रय, बिना किसी ग्रंथीय अनुमति, बिना किसी जातीय प्रमाणपत्र के। यह साहित्य शास्त्र से नहीं, अनुभव से जन्मा है। इसलिए उसमें विचार की कठोरता नहीं, अनुभूति की ऊष्मा है; तर्क की तलवार नहीं, जीवन की राख में दबा हुआ धीमा-सा अंगार है।

रैदास के यहाँ कविता कोई कलात्मक वस्तु नहीं बल्कि जीवन की दशा है। उनकी पंक्तियाँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो कविता लिखी नहीं गई, बल्कि कही गई हो~ किसी चर्मकार की गंध से भरी हथेलियों के बीच, किसी ऐसी आँख से देखी गई हो जिसने ईश्वर को मंदिर में नहीं, मनुष्य में खोजा हो। यही खोज रैदास के साहित्य को भक्तिकाल की भीड़ से अलग करती है।

उनका साहित्य प्रश्न से शुरू नहीं होता, स्थिति से शुरू होता है। वे यह नहीं पूछते कि ईश्वर क्या है; वे बताते हैं कि ईश्वर कहाँ नहीं है—जहाँ जाति है, जहाँ ऊँच-नीच है, जहाँ स्पर्श अपराध है। इस नकार में ही उनका सबसे बड़ा स्वीकार छिपा है। रैदास का ईश्वर निर्गुण है पर निराकार होने से पहले निष्पक्ष है। वह किसी एक वर्ण, एक कुल, एक भाषा का ईश्वर नहीं। वह मनुष्य की पीड़ा में उतर कर मनुष्य हो जाने वाला ईश्वर है।

रैदास की कविता में जो सरलता दिखाई देती है, वह भोलेपन से नहीं आती। वह एक गहरी जीवन-साधना का परिणाम है। उनकी भाषा सजाई नहीं गई है; वह घिसी हुई है—दिन-दिन की मेहनत से, तिरस्कार से, अपमान से। यही घिसावट उनकी भाषा को चमकदार नहीं, सच्चा बनाती है। वे अलंकारों का प्रयोग नहीं करते पर उनकी पंक्तियाँ स्वयं अलंकार बन जाती हैं—क्योंकि उनमें जीवन की चोट है।

उनके पदों में ‘बेगमपुरा’ केवल एक आदर्श नगर नहीं है; वह एक राजनीतिक कल्पना है, लेकिन सत्ता की भाषा में नहीं।

वह एक ऐसा समाज है जहाँ कर नहीं है, भय नहीं है, भेद नहीं है। यह कल्पना किसी राजदरबार में नहीं, एक बहिष्कृत नागरिक के मन में जन्मी है। इसलिए यह यूटोपिया कल्पनालोक नहीं बनता बल्कि एक नैतिक दबाव बन जाता है—समाज पर, धर्म पर, सत्ता पर।

रैदास का साहित्य भक्ति के नाम पर पलायन नहीं करता। वह भक्ति को ही प्रतिरोध में बदल देता है। उनका ईश्वर-स्मरण सामाजिक यथार्थ से मुँह मोड़ना नहीं बल्कि उसे बेधना है। वे कहते हैं—अगर राम वहाँ है जहाँ छुआछूत है तो वह मेरा राम नहीं। यह वाक्य किसी घोषणापत्र की तरह नहीं आता, वह सहज पद की तरह आता है—और इसी सहजता में उसकी विस्फोटक शक्ति छिपी है।

उनकी कविता का सबसे बड़ा गुण है—आत्मसम्मान। रैदास करुणा के कवि नहीं हैं, वे दया की भाषा नहीं बोलते। वे अपनी पीड़ा को दया का पात्र नहीं बनाते। उनकी आवाज़ में विनय है पर आत्महीनता नहीं। यह आत्मसम्मान ही है जो उन्हें भक्तिकाल के अन्य कवियों से अलग खड़ा करता है। वे झुकते हैं लेकिन टूटते नहीं।

रैदास के साहित्य में देह की उपस्थिति भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह देह किसी पाप का घर नहीं बल्कि अनुभव का केंद्र है। जिस देह को समाज ने अपवित्र कहा, उसी देह से रैदास ईश्वर की खोज करते हैं। यह खोज आध्यात्मिक होते हुए भी भौतिक है। वहाँ मिट्टी है, पसीना है, चमड़े की गंध है~और इन्हीं के बीच ईश्वर सांस लेता है।

उनकी कविता में शास्त्र का आतंक नहीं है। वे वेदों को नकारते नहीं लेकिन उनसे डरते भी नहीं। उनके लिए अनुभव सबसे बड़ा ग्रंथ है। यही कारण है कि उनका साहित्य लोक में गहराई से रचा-बसा है। वह पढ़ा कम जाता है, जिया अधिक जाता है। गाया जाता है, दोहराया जाता है, स्मृति में बसता है।

समालोचना की दृष्टि से देखें तो रैदास का साहित्य हमें आलोचना की सीमाओं पर भी प्रश्न करने को बाध्य करता है। क्या हम उन्हें केवल भक्ति-कवि कहकर समझ सकते हैं? क्या उनकी कविता को आध्यात्मिक कहकर उसके सामाजिक आयामों को अनदेखा किया जा सकता है? रैदास का साहित्य इन वर्गीकरणों को स्वीकार नहीं करता। वह कविता है, दर्शन है, समाजशास्त्र है—लेकिन किसी एक खाँचे में नहीं समाता।

रैदास की भाषा में जो मौन है, वह भी अर्थपूर्ण है। वे हर बात नहीं कहते; बहुत कुछ छोड़ देते हैं। यह मौन किसी कमजोरी का नहीं, अनुभव की गहराई का संकेत है। वे जानते हैं कि कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें कहा नहीं जा सकता, केवल जिया जा सकता है।

आज के समय में रैदास का साहित्य किसी स्मारक की तरह नहीं, संवाद की तरह पढ़ा जाना चाहिए। न तो उन्हें केवल दलित चेतना का प्रतीक बनाकर सीमित किया जाना चाहिए, न ही उन्हें भक्तिकाल की सुरक्षित अलमारी में बंद किया जाना चाहिए। उनका साहित्य आज भी प्रश्न करता है—हमारे धर्म से, हमारी राजनीति से, हमारी भाषा से।

रैदास की कविता हमें यह याद दिलाती है कि साहित्य का सबसे बड़ा काम सौंदर्य पैदा करना नहीं, न्याय की आकांक्षा को भाषा देना है। यह भाषा ऊँची नहीं होती पर गहरी होती है। चमकदार नहीं होती, पर टिकाऊ होती है।

इस अर्थ में रैदास का साहित्य आज भी अधूरा है—क्योंकि वह जिस समाज का सपना देखता है, वह अभी पूरा नहीं हुआ। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

आभार- परिचय दास 

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