ज्ञानरंजन के न होने का अर्थ

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

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यह एक दुःखद खबर हैं। कथाकार और हिंदी की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका पहल के संपादक ज्ञानरंजन का जाना हिंदी और भारतीय कथा एवं विचार के एक युग का अंत भी हैं!

वह नयी कहानी आंदोलन के बाद सातवें -आठवें दशक में उभरकर आये सर्वाधिक महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक थे। घंटा उनकी उल्लेखनीय कहानियों में से एक हैं जिसमें समकालीन समय के चरित्र का यथार्थ चित्रण हैं। अमेरिका और सोवियत संघ के मध्य शीतयुद्ध के दौर में पहल और अपने लेखन के ज़रिये उन्होंने हिंदी में वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील साहित्य का प्रचार -प्रसार किया।

हिंदी लेखन में आठवें दशक के बाद आई पूरी पीढ़ी उनकी वैचारिक-साहित्यिक पहल की दीवानी थी। अपने छात्रजीवन में हमलोग देखते थे कि कैसे राजेश जोशी, आलोक धन्वा, लीलाधर मंडलोई, प्रेमकुमार मणि, कर्मेन्दु शिशिर, हरि भटनागर आदि उनके सामने आते ही उनके प्रति एक अलग तरह के सम्मान से भर जाते थे। संभवत: रामविलास शर्मा और नामवर सिंह के बाद ऐसी सम्मानजनक प्रतिष्ठा अपने लेखन एवं व्यक्तित्व के कारण ज्ञानरंजन को ही मिली।

हम सबकी यही स्थिति थी। जेएनयू में अध्ययन-अध्यापन के दौरान जब उन्हें पता चला कि कुछ चीनी लेखकों और जेएनयू के चीनी भाषा के प्राध्यापकों के साथ हमलोग समकालीन चीनी साहित्य पर कार्य कर रहें हैं, तब उनका पोस्टकार्ड आया कि अगर हम आई छिंग का अनुवाद कर रहें हैं तो उनकी कविता उन्हें ज़रूर भेजें।

तब हमने देवेंद्र सिंह रावत के साथ अनुवाद की हुई एक लम्बी कविता उन्हें भेजी और 1999 में पहल 62 में ” सुनो, एक आवाज़… !” कविता का प्रकाशन उन्होंने मेरी एक लम्बी टिप्पणी के साथ किया। उस कविता की कुछ पंक्तियों का उल्लेख उन्होंने कई बार किया कि कैसे एक लेखक साम्राज्यवाद के खिलाफ जनता के अंदर गहरी चेतना भरता हैं।

आज वह हमारे बीच नहीं हैं। उनके न होने का अहसास एक लम्बे समय तक साहित्य और विचारधारा की दुमिया में बना रहेगा।

उनके प्रति विनम्र श्रद्धांजलि!

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