अब नया वर्ष आवाज़ दे रहा है
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

वर्ष 2025 ढल गया। यह वर्ष भी अपनी सारी उजास और छाया संग समय की निस्तब्ध गोद में समा गया। हमने कितनी दृश्यावली देखी। हँसी की उजली लहरें, चिंता के गहरे बादल, आशा के छोटे दीप। थकान की लंबी शामें। सब कुछ घटा। फिर सब कुछ बीत गया। वर्ष दर वर्ष का यह सिलसिला क्या कहता है? यही न कि समय ठहरता नहीं, हम ही हैं जो कभी-कभी रुक कर उसे पढ़ लेते हैं।
प्रत्येक वर्ष जीवन की पाठशाला का एक अध्याय होता है। कोई हमें कर्म का अर्थ सिखा जाता है, कोई मौन का मूल्य। कभी कोई दिन हमारे भीतर से अभिमान निकाल ले जाता है, तो कोई रात धैर्य का दीप जला देती है। समय की यही तासीर है। वह हमें तोड़ता भी है। नई आकृति में गढ़ता भी है। बस हमें इतना विवेक रखना होता है कि टूटन से भय न खाएँ, क्योंकि उसी के भीतर अगली सम्भावना का बीजारोपण होता है—
“सदा न संग सहेलियाँ, सदा न राजा देश।
सदा न जुग में जीवणा, सदा न काला केश।”
युगों से यही तो जीवन का शाश्वत गीत रहा है। सब कुछ नश्वर, सब कुछ चलायमान। सुख और दुःख, प्राप्ति और विरक्ति, बस एक लय है, जो निरंतर बहती रहती है। इस बहाव में जो संतोष पा लेता है, वही जीवन का सहचर बन जाता है। बाकी सब मोह-मरीचिका है। भीतरकी बेचैनी का एक अस्थायी रूप।
अब नया वर्ष दस्तक दे रहा है। उसके स्वागत में पटाखे की रौनक जगमगा उठी हैं। आकाश में रंगों का शोर है। और हृदय में सवेरे की गंध सी ताज़गी। पर इस चहल-पहल के बीच, एक पल रुकिए। बीते समय के पदचिह्नों को देखिए। जो गिरा था वह गिरकर भी कितना सिखा गया। जिसने साथ छोड़ा, वही आत्म-बल का कारण बना।
जिसने मुस्कान दी, वही आशीष बनकर ठहर गया। नया वर्ष केवल आगमन नहीं, वह स्मरण भी है। क्योंकि बिना बीते समय की कृतज्ञता के कोई नव्यता फलती नहीं। जो कल को प्रणाम कर सके, वही आज का सच्चा स्वागत कर पाता है। इसलिए नये साल का पहला भाव उत्सव नहीं, आभार होना चाहिए। समय के प्रति, जीवन के प्रति, और उन सब क्षणों के प्रति, जिन्होंने हमें मनुष्य बनाए रखा।
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