राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नींद उड़ चुकी है,क्यों?
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों कूटनीति के उस विसात पर चालें चल रहे हैं। जिस पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नींद उड़ चुकी है। मोदी पहले जापान पहुंच रहे हैं, जहां 15वें भारत-जापान शिखर सम्मेलन को लेकर टोक्यो में बड़ी बैठक हो रही है। लेकिन असली हलचल तब मचेगी जब वो सीधे चीन पहुंचकर एससीओ शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे। 31 अगस्त को पीएम मोदी और शी जिनपिंग आमने सामने बैठेंगे।
वहीं 1 सितंबर को पुतिन से भी उच्चस्तरीय बातचीत होगी। यानी एक ही मंच पर भारत, रूस और चीन के राष्ट्राध्यक्ष एक साथ होंगे। ऐसा मौका सालों बाद आया है और यही तस्वीर ट्रंप के माथे पर पसीना लाने वाली है। दरअसल, रूस ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि हालात अनुकूल रहे तो त्रिपक्षीय बैठक यानी भारत-रूस और चीन का साझा मंच भी देखने को मिल सकता है। ये वही सीन होगा जिसका ख्वाब ट्रंप कभी नहीं देखना चाहते थे। अगर ये तीन ताकतें आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर साथ खड़ी हो गई तो अमेरिका की टैरिफ डिप्लोमेसी का खेल वहीं ध्वस्त हो जाएगा।
जिनपिंग का सीक्रेट लेटर
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मार्च में टैरिफ वॉर शुरू किया, तब इसके नकारात्मक प्रभाव भांपकर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राष्ट्रपात द्रौपदी मुर्मु को गोपनीय पत्र भेजा था और संबंधों में सुधार की संभावनाएं टटोली थीं। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, ट्रेड वार्ता बेपटरी होने और ट्रम्प के भारत-पाक संघर्ष में मध्यस्थता के दावों के बाद भारत-चीन के संबंधों में सुधार तेज हुआ। दोनों देशों ने सीमा विवादों को सुलझाने के प्रयास दोगुने कर दिए हैं।
ये जानते हुए कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन पहल उसने की है तो नाराज भीनहीं करना है। कहा जाता है कि अजित डोभाल को उसकी जिम्मेदारी दी गई। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल विशेष प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं। बताया जाता है कि मोदी ने शी से कहा है कि सीमा तनाव किसी भी देश के हित में नहीं है। इससे शी सहमत हुए और दोनों नेताओं ने कहा कि वे राजनयिकों से समाधान पर काम करने के लिए कहेंगे। इसके बाद से गतिरोध दूर होने लगा।
ट्रोइका से अमेरिका भी डरता है
यूएस टैरिफ के खिलाफ न सिर्फ चीन, रूस, बल्कि ब्राजील के राष्ट्रपति जिस तरह से सामने आए उसने ब्रिक्स के देशों के विरोध को आरआईसी मेकेनिजम के जरिए रखने की भी एक संभावना को सामने रखा है। हाल के वक्त मे भारत की ओर से आरआईसी मैकेनिजम को लेकर कोई ठोस प्रतिबद्धता दिखी नही है। साथ ही शांति की कथित कोशिशों को लेकर अमेरिका की भूमिका के चलते फिलहाल रूस भी यूएस के खिलाफ पहले जैसा आक्रामक रुख दिखाने से परहेज करेगा।
पूर्व रूसी पीएम प्रिमकोव ने सबसे पहले 1998 में इस फोरम के विचार को प्रस्तावित किया था, लेकिन ये साल 2001 में ही अस्तित्व में आया था। दूसरे बहुपक्षीय मंचों की ही तरह ये फोरम भी तीनों में से हर देश को अपनी विदेश नीति को ज्यादा अच्छे से समझाने का मौका देता है। हालांकि भारत और चीन के बीच विश्वास कायम करने को लेकर ये फोरम ज्यादा कामयाब नहीं रहा है।
ग्लोबल साउथ का सूत्रधान भारत
अमेरिका ने अपनी क्रेडिब्लिटी को खो दिया है। अब उसपर कोई विश्वास करे तो कैसे करे। लेकिन हिंदुस्तान के ऊपर कोई सवाल नहीं उठा सकता। हिंदुस्तान किसी भी मुल्क के साथ कभी भी तलवार कि जोर पर अपना काम नहीं करते हैं। हम एक दूसरे के प्रति परस्पर आदर के साथ मिलकर चीजों को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
हिंदुस्तान कितना भी ताकतवर था, दुनिया की 50 प्रतिशत आर्थिक गतिविधियां हिंदुस्तान से होती थी, लेकिन फिर भी हमने कहीं जाकर कब्जा नहीं किया। म्युअल रिस्पेक्ट के साथ हिंदुस्तान डिप्लोमेसी करता है। लेकिन ये बात डोनाल्ड ट्रंप के दिमाग में नहीं गई। भारत ने दुनिया में जिसके पास आवाज नहीं थी ग्लोबल साउथ उसे खड़ा किया।
40 देशों का गठबंधन
भारत ने टैरिफ के बदले एक अलग किस्म का परस्पर 40 देशों का गठबंधन तैयार किया। अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी का टैरिफ लगाया। इस मुसीबत से निपटने के लिए रणनीति में बदलाव करते हुए ग्लोबल मार्केट में कपड़े के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने की योजना बनाई है।
कुल 40 देशों में डेडिकेटेड आउटरीच प्रोग्राम चलाएगा। इन देशों में ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, नीदरलैंड, पोलैंड, बेल्जियम, कनाडा, मेक्सिको, जापान, दक्षिण कोरिया, रूस, तुर्किए, यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। इस पहल से भारत गुणवत्तापूर्ण टिकाऊ और इनोवेशन बेस्ड क्लोथ प्रोडक्ट का सप्लाई चेन स्थापित करने की कोशिश करेगा।