मानस मंदाकिनी समिति को सनातन संस्‍कृति न्‍यास ने किया सम्‍मानित

मानस मंदाकिनी समिति को सनातन संस्‍कृति न्‍यास ने किया सम्‍मानित

भाई भाई के बीच कैसा संबंध हो यह श्रीरामचरितमानस बताता है

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रेलवे जंक्‍शन परिसर में चल रहे श्रीरामकथा का आज होगा समापन

श्रीनारद मीडिया, सीवान (बिहार):

मानस मंदाकिनी समिति  सीवान द्वारा आयोजित 44 वीं श्री राम विवाह उत्सव के पावन अवसर पर आयोजित संगीतमय श्री राम कथा का समापन दिनांक 28 , 11.2025 रात्रि 10:00 बजे होगी   एवं शोभा यात्रा दिनांक 29 को दिन शनिवार अपराह्न 12:30 बजे से कार्यक्रम स्थल रेलवे स्टेशन परिसर से निकलकर शहर भ्रमण करते हुए रेलवे स्टेशन स्थित हनुमान मंदिर तक आएगी।


 

सनातन संस्कृति न्यास सीवान की ओर से  प्रबंध न्‍यासी  डॉ राकेश कुमार तिवारी, कोषाध्‍यक्ष राम प्रेम शंकर सिंह, न्‍यासी जादूगर विजय, ने श्रीराम कथा वाचिका पूज्य   किरण प्रज्ञा जी एवं साथ उनके सहयोगियों को भी पुष्प, चंदन, स्मृति चिन्ह,माला, एवं श्री राम पटका भेंट कर सम्मानित किया ।

इस अवसर पर मानस मंदाकिनी समिति के द्वारा विगत 44 वर्षो से  श्री राम कथा का भागीरथ  प्रयास करने  हेतु समिति के संरक्षक डॉक्टर प्रोफेसर प्रजापति त्रिपाठी, अध्यक्ष इष्टदेव तिवारी, सचिव ललन मिश्रा ,कोषाध्यक्ष प्रो मनोज कुमार वर्मा ,डॉ पी एन पांडेय,मीडिया प्रभारी अमरनाथ शर्मा, सचिन पर्वत ,नारद मीडिया के प्रतिनिधि,एवं विभिन्न व्यवस्था में लगे सदस्य सुरेश गिरी, सतीश तिवारी, विनोद कुमार पांडेय, सत्यदेव आचार्य ,चंदन श्रीवास्तव, सोनू सिंह ,कमलेश यादव, चंदन ,ऋषि कुमार, प्रेम सोनी, राजा मिश्रा, प्रेम माझी, कुशेश्वर तिवारी, राहुल कुमार ,तारकेश्वर दुबे,आदि का भी सम्मान सनातन संस्कृति न्यास के द्वारा किया गया ।

कथा के दौरान किरण प्रज्ञा रामयणी ने कहा कि  श्रीरामचरितमानस हमें जीवन जीने की कला सिखाती है।  भाई भाई में प्रेम कैसा हो  श्रीरामचरितमानस बताता है।  सारा संसार राम राम जपता है लेकिन श्रीराम जी भरत भरत जपते हैं।

धन्य  है  श्रीरामचरितमानस के भाई जिन्होंने संपत्ति का नहीं विपत्ति का बंटवारा किया, जिस समय श्रीराम अयोध्या के राजा बनने के लिए जा रहे थे  उसी समय पिता के वचन निभाने के लिए  श्री राम ने गुरु वशिष्ट जी से कहा कि श्री अयोध्या का राज पाठ का अधिकारी  भैया भरत है और भरत के लिए राम जी 14 वर्ष के लिए बन के लिए चले गए अयोध्या की राजगद्दी को छोड़कर ।

 

उन्‍होने कहा कि श्रीराम जी के जाने के बाद अयोध्या अनाथ हो गई।  दशरथ जी राम के वियोग में अपने प्राण त्याग दिए। ननिहाल से भरत जी को श्री अयोध्या बुलाया गया।  गुरु वशिष्ठ ने भरत जी से कहा कि अयोध्या की राजगद्दी को संभालो । भारत जी ने कहा अयोध्या की राजगद्दी के अधिकारी तो बड़े भैया श्री राम है । इस राज गद्दी पर मैं नहीं बैठ सकता।

 

भरत भी अयोध्या की राजगद्दी छोड़कर  प्रभु श्री राम को मनाने के लिए चित्रकूट गए । लेकिन श्रीराम जी ने पिता के वचन को सत्‍य करने के लिए राजा नही बने बल्कि वनवासी बनाना स्‍वीकार किया तथा भरत को चौदह वर्ष तक देखरेख करने  के लिए कहा तो भरत जी श्रीराम जी की पादुका लेकर श्रीअयोध्‍या जी आएं और नंदीग्राम में वनवासी जैसा रहकर राज काज का निर्वाह किया ।

सुश्री रामायणी ने कहा कि आजकल के भाई छोटी सी जमीन जयजाद के पीछे भाई को भी मारने में संकोच नहीं कर रहे हैं।

उन्‍होंने एक प्रसंग में कहा कि महाभारत मे भाई कौरव पांडव में युद्ध  हो गया । कन्हैया ने दुर्योधन से कहा दुर्योधन पांडवों को पांच गांव देने से  युद्ध  नहीं होगा।  दुर्योधन ने कहा कन्हैया पांडवों को सुइ की नौक के बराबर जमीन हम नहीं देंगे। और फिर भीषण युद्ध हुआ जिसमें कौरव मारे गये और पाण्‍डव विजयी हुए ।  इसलिए भाई चाहे जैसा हो उसको त्यागे नहीं आप उससे  प्रेम रखें ।

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