‘लोकगीतों का समाजशास्त्र’ लोक की विलक्षण झलक देती है

‘लोकगीतों का समाजशास्त्र’ लोक की विलक्षण झलक देती है

✍🏻 राजेश पाण्डेय

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

मानवीकि व भाषा के विषयों हेतु इसमें उपयोगी सामग्री है

लोक की थाती को सहेजते सभी लेख सारगर्भित व अभिव्यंजक है

‘लोकगीतों का समाजशास्त्र’ पुस्तक केवल एक विषय ना होकर मानवीकि व भाषा संकाय के सभी विद्यार्थियों व शोधार्थीयों के लिए उपयोगी प्रस्तुति है। पुस्तक का वितान पूरे देश के लोक को अपने में समाहित किया है। किताब के नवें अध्याय में कश्मीर में बोली जाने वाली भाषा ‘गोगरी’ के लोकगीतों पर अदभुत जानकारी है, तो हमारे मस्तिष्क पटल पर भौगोलिक दूरी बनाए हुए त्रिपुरा के लोक के बारे में असाधारण प्रस्तुति हमें उसे समाज के निकट ले जाती है।वहीं महाराष्ट्र की विरासत ‘भारुंड’ लोकगीत के बारे में सूचना शानदार है।

पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेशों की बोली- बानी में रचे गए लोक की थाती के बारे में विस्मयकारी विवरण उपलब्ध हुई है। और सबसे बढ़कर राजस्थानी, बघेली, अवधी के लोक हमें खोजपरक अध्ययन की ओर आकर्षित करते है।


शोधार्थियों के लिए बिहार, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में व्याप्त लोकगीतों के विलक्षण विवरण एक नए आयाम की ओर दृष्टिपात करते है।अंततः नई दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा अध्ययन केंद्र में पदस्थापित प्रो. वंदना झां की यह संचित संपादकीय पुस्तक, 25 अध्याय एवं 258 पृष्ठों में संकलित होकर हमारे लोक को विराट, विहंगम और विशाल बनने में उपकार कर रही है।

 

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