बिहार में मुसलमानों की जनसंख्या 18 % और भागीदारी 5%

बिहार में मुसलमानों की जनसंख्या 18 % और भागीदारी 5%

 विधानसभा के लिए 11मुसलमान विधायक  ही जीते

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

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बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, जबकि महागठबंधन को बहुत बड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा। चुनावी नतीजों के बीच एक बड़ा राजनीतिक संकेत यह भी है कि इस बार बिहार विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 1990 के बाद सबसे कम होकर सिर्फ 11 पर सिमट गई है। यह लगातार आठ चुनावों में सबसे कम प्रतिनिधित्व माना जा रहा है। इस बार जो 11 विधायक जीतकर आए हैं उनमें महागठबंधन के 5, एआईएमआईएम के 5 और एनडीए के 1 मुस्लिम हैं। पिछली विधानसभा में 19 मुसलमान जीतकर आए थे।

राज्य की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी 17.7% है (राज्य जाति सर्वेक्षण 2022-23 के अनुसार)। इसके बावजूद इस बार न तो महागठबंधन और न ही एनडीए ने 2020 की तुलना में अधिक मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। इसका सीधा असर समुदाय के प्रतिनिधित्व पर पड़ा है। इस चुनाव में मुसलमान विधायकों की संख्या 4.52 पर आ गई है।

AIMIM का उभार जारी, पांच में पांच सीटें जीतीं

महागठबंधन में शामिल करने से इनकार के बाद असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए पांच सीटों पर जीत दर्ज की। ये सभी सीटें मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र- अररिया, पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज से हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने अमौर से जीत हासिल की। 2020 में भी AIMIM ने ये सभी पांच सीटें जीती थीं।

खास बात यह है कि जहां राजद के ज्यादातर कैंडिडेट छोटे मार्जिन से जीते हैं, वहीं ओवैसी के पांचों कैंडिडेट 20 हजार से ऊपर के अंतर से जीतकर आए हैं। इन विधायकों में अख्तरुल ईमान, मुर्शीद आलम, तौसीफ आलम, गुलाम सरवर और सरवर आलम शामिल हैं जो क्रमशः अमौर, जोकीहाट, बहादुरगंज, बायसी और कोचाधान से जीते हैं।

जेडीयू के चार में सिर्फ एक उम्मीदवार कामयाब

नीतीश कुमार की जेडीयू ने इस बार चार मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें सिर्फ मोहम्मद जमा खान चैनपुर से जीते। वे 2020 में बसपा के टिकट पर इसी सीट से जीते थे और बाद में जेडीयू में शामिल हुए।

एलजेपी (RV) का दांव असफल

चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) ने किशनगंज के बहादुरगंज से मोहम्मद कलीमुद्दीन को टिकट दिया, लेकिन वे तीसरे स्थान पर रहे। यहां AIMIM के मोहम्मद तौसीफ आलम ने 28,700 से अधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही।

RJD के तीन चेहरे जीते- असिफ, ओसामा और फैसल

तेजस्वी यादव की आरजेडी के असिफ अहमद बिस्फी से जीते। उन्होंने भाजपा के चर्चित नेता हरिभूषण ठाकुर बचौल को हरा दिया। वहीं बाहुबली शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब रघुनाथपुर से विजयी हुए। शाहाबुद्दीन के परिवार को 21 साल बाद चुनावी जीत मिली है। ढाका सीट से राजद के फैसल रहमान आखिरी राउंड में 178 वोट के अंतर से जीत गए।

कांग्रेस ने दो सीटें बरकरार रखीं, लेकिन CLP नेता हारे

सीमांचल में कांग्रेस ने 2020 जैसा प्रदर्शन दोहराया। किशनगंज से कमरुल होदा और अररिया से अब्दुर रहमान जीतने में सफल रहे। हालांकि कांग्रेस विधायक दल के नेता शकील अहमद खान को जेडीयू के दुलाल चंद्र गोस्वामी ने 18,368 वोटों से हरा दिया। शकील के पास की सीट पर लड़े सीपीआई-माले के महबूब आलम भी ओवैसी के कैंडिडेट के कारण हार गए और लोजपा-आर की संगीता जीत गईं। ओवैसी के कैंडिडेट आदिल हसन दूसरे नंबर पर रहे और महबूब आलम के मुकाबले बहुत ज्यादा वोट हासिल किया।

बिहार में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के इतिहास पर नजर डालें तो पिछले तीन दशकों में इसमें उतार-चढ़ाव साफ दिखाई देता है। वर्ष 2010 में विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 19 थी, जो कुल सदस्यों का 7.81% थी। इसके बाद 2015 के चुनाव में यह प्रतिनिधित्व अपने चरम पर पहुंच गया, जब 24 मुस्लिम विधायक चुने गए और अनुपात बढ़कर 9.87% हो गया। लेकिन 2020 के चुनाव में यह संख्या फिर घटकर 19 पर आ गई, यानी प्रतिनिधित्व दोबारा 7.81% पर लौट आया।

ताजा चुनाव में मुस्लिम विधायकों की संख्या मात्र 11 रह गई है- जो 1990 के बाद का सबसे कम प्रतिनिधित्व है। 2010 में जेडीयू के 7, आरजेडी के 6, कांग्रेस के 3 और एलजेपी के 2 मुस्लिम विधायक चुने गए थे। भाजपा का एकमात्र मुस्लिम चेहरा सबा जफर अमौर से जीते थे। 2015 में महागठबंधन की लहर के दौरान मुस्लिम प्रतिनिधित्व लगभग 10% पहुंच गया था। 2020 में यह फिर घटकर 19 पर पहुंच गया था।

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