विश्व सत्य की नहीं, शक्ति की सुनता है-मोहन भागवत

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं से सशक्त बनने का आह्वान करते हुए कहा कि विश्व सत्य नहीं, शक्ति की सुनता है। दुर्बल व्यक्ति सत्य भी बोले तो उसे कोई नहीं सुनेगा, किंतु शक्तिशाली की बात सही-गलत का विचार किए बिना सभी सुनते हैं।

इसलिए भारतीय युवाओं को सशक्त बनना चाहिए। इसके लिए शरीर, मन और बुद्धि की सबलता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अभी बहुत काम करना बाकी है।

युवाओं को सशक्त बनने का आह्वान: भागवत

1947 में जो हिस्से भारत से अलग हुए थे, उन्हें मिलाने के लिए अभी से मानसिकता तैयार करनी होगी। प्रतिनिधि सभा में यह विषय भी रखेंगे कि जो भारत का हिस्सा थे, उन्हें भी संगठित किया जाए।

यह बात डॉ. भागवत ने शुक्रवार को भोपाल में आयोजित युवा संवाद में कही। संवाद में मध्यभारत प्रांत के 350 ऐसे युवा सम्मिलित हुए, जिनकी क्षेत्र विशेष में उपलब्धियां रही हैं, पर वे स्वयंसेवक नहीं हैं। डॉ. भागवत ने कहा कि विश्व में एक चिंतन चला है कि भारत से एक नया रास्ता मिलेगा। जब भारत बड़ा बनता है, विश्व को नया रास्ता दिखाता है। संपूर्ण समाज के प्रयास से देश बड़ा होता है।

नेता, नारा नीति, पार्टी, सरकार ये सब सहायक होते हैं। समाज को इनसे काम लेने की ताकत आनी चाहिए। इसके लिए समाज में देशभक्ति, अनुशासन जैसे सद्गुणों के व्यवहार का वातावरण होना चाहिए। भारत का बड़ा बनना संघ नहीं, बल्कि समाज के खाते में लिखा जाएगा।

डॉ. भागवत ने कहा कि दुनिया में संघ ने ही एकमात्र ऐसी पद्धति दी है, जो अच्छी आदतें विकसित करती है। दुनिया में व्यक्ति निर्माण की कहीं दूसरी पद्धति नहीं है। संघ की शाखा देशभक्ति सिखाती है। यदि इसका अनुभव लेना है और उद्देश्य को जीना है तो शाखा एकमात्र जगह है। यहां कोई बंधन नहीं है।

धर्म नहीं, भारत का मूल स्वभाव है प्रमुख

जन गोष्ठी में डॉ. भागवत ने संघ के विचार, कार्यपद्धति और भविष्य के लक्ष्यों पर विस्तार से चर्चा की। हिंदुत्व की व्याख्या करते हुए कहा कि हिंदू विभिन्न समाजों की एक जैसी मनोवृत्ति और स्वभाव है। कहने से हम सब एक सूत्र में बंधते हैं। यह केवल एक धर्म नहीं, भारत का मूल स्वभाव है।

नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि हम सभी पंथों और संप्रदायों को मानते हैं और उनका सम्मान करते हैं। हिंदू, हिंदवी और भारत, ये तीनों एक ही हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ का विचार कोई नया या अलग विचार नहीं है, यह सनातन काल से चला आ रहा है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।भाजपा या विहिप को देख संघ को नहीं समझ सकतेडा. भागवत ने हिंदुत्व की व्याख्या के बीच भाजपा और विहिप जैसे संगठनों के साथ संघ के रिश्तों को स्पष्ट किया।

संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के रिश्तों पर भ्रम को दूर करते हुए सरसंघचालक ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कहा, अगर आप भाजपा, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) या विद्या भारती को देखकर संघ को समझने की कोशिश करेंगे तो आप संघ को कभी नहीं समझ पाएंगे। संघ का काम सिर्फ स्वयंसेवक तैयार करना है।

संघ उन्हें विचार, संस्कार और लक्ष्य देता है। इसके बाद ये स्वयंसेवक समाज के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर काम करते हैं। भाजपा या विहिप के काम करने का तरीका अलग है, वे अपना काम स्वतंत्र रूप से करते हैं। उन्हें संस्कार संघ ने दिया है, लेकिन उनके कार्यों से संघ को परिभाषित नहीं किया जा सकता।

 

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