यह साम्राज्यवादी रंगदारी है
यह कोई साधारण घटना नहीं है, इतिहास को शर्मसार करने वाला लम्हा है
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

यह वह क्षण है जब इतिहास ने अपनी आँखें फेर लीं और अंतरराष्ट्रीय क़ानून ने ज़मीन पर गिरकर चुप्पी ओढ़ ली। यह गिरफ्तारी नहीं है। यह एक औपनिवेशिक छापा है, जो रात के सन्नाटे में नहीं, दिन-दहाड़े, कैमरों और सुर्ख़ियों के उजाले में अंजाम दिया गया।
एक संप्रभु देश का राष्ट्रपति अपने ही घर में, अपने ही बेडरूम में—पत्नी के साथ खींचकर बाहर निकाला जाता है। यह दृश्य किसी लोकतांत्रिक न्यायालय का नहीं, किसी साम्राज्यवादी विजय-उत्सव का है। जैसे सत्ता ने कहा हो: तुम्हारा चुनाव, तुम्हारी जनता, तुम्हारी ज़मीन—सब तभी तक मान्य हैं, जब तक वे हमें पसंद हैं।
संयुक्त राष्ट्र का चार्टर कहीं दूर किसी अलमारी में पड़ा रह जाता है। उसका अनुच्छेद संप्रभु समानता की बात करता है, मगर यहाँ समानता नहीं, केवल ताक़त बोल रही है। क़ानून नहीं चलता, टैंक चलते हैं; न्याय नहीं चलता, हवाई जहाज़ चलते हैं। न्यूयॉर्क की ओर उड़ान भरता यह अपमान केवल एक व्यक्ति को नहीं, एक पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बंधक बनाकर ले जाता है।
यह ‘कानून का राज’ नहीं है। यह शक्ति का राज है। वह शक्ति जो तय करती है कि कौन लोकतांत्रिक है और कौन तानाशाह; कौन मित्र है और कौन अपराधी। वही शक्ति जो कुछ देशों में राजशाही को स्थिरता कहती है और कुछ देशों में चुनी हुई सरकारों को अपराध। लोकतंत्र यहाँ एक शब्द नहीं, एक बहाना है, जिसे भू-राजनीति की ज़रूरत के हिसाब से मोड़ा जाता है।
आज वेनेज़ुएला है। कल कोई और होगा। जब किसी एक देश को यह अधिकार दे दिया जाए कि वह दूसरे देश के राष्ट्रपति को उठा ले तो दुनिया राष्ट्रों का समाज नहीं रहती। वह गिरोहों का मैदान बन जाती है। तब संयुक्त राष्ट्र केवल एक इमारत होता है, क़ानून केवल एक किताब और न्याय केवल भाषणों की सजावट।
सबसे शर्मनाक यह नहीं कि यह हुआ। सबसे शर्मनाक यह है कि यह खुलेआम हुआ। बिना झिझक, बिना शर्म, बिना किसी अंतरराष्ट्रीय सहमति के। जैसे इतिहास से कहा गया हो: देखो, हम कर सकते हैं।
और इतिहास देख रहा है चुपचाप, भारी मन से। यह दर्ज़ करते हुए कि इस दिन क़ानून चुप था, लोकतंत्र झुका हुआ था, और साम्राज्यवाद मुस्कुरा रहा था।
यदि यही न्याय है तो अराजकता को स्वीकार कर लेना ज़्यादा ईमानदार होगा। क्योंकि न्याय वही होता है, जो सब पर लागू हो—
वरना वह न्याय नहीं, सिर्फ़ ताक़त की कविता है, जिसे बंदूक की स्याही से लिखा गया है। गुंडों के भी कुछ उसूल होते हैं; लेकिन यहाँ तो वह भी नहीं है।
मुझे बार-बार यह लग रहा है कि वेनेजुएला में जो कुछ भी हुआ है वह अमेरिका और चीन की सहमति से हुआ है और उसमें कुछ हद तक भारत की सहमति भी शामिल है। भारत का 8300 करोड रुपए वहां फेंका हुआ था उसे भारत का कोई लाभ नहीं हो रहा था
चीन का भी लगभग 60 बिलियन डॉलर का इन्वेस्टमेंट है वहां पर और चीन के पास वह तकनीक नहीं है कि इतने बड़े पैमाने पर हैवी वायल को पेट्रोलियम में बदल सके तो इस पूरे सिस्टम को रन करने के लिए जो तकनीक चाहिए वह तकनीक अमेरिका के पास है। कोई ऐसा तो नहीं की तीनों ने मिलकर काम किया है और वैसे भी चीन भी ऑफ कम्युनिस्ट ट्रस्ट रहा नहीं चीनी पूंजीवादी हो चुका है।
अमेरिका यह चाहता है कि भारत रूस के अलावा अन्य देशों से भी तेल खरीदे ताकि भारत में बने हुए तेल का मैक्सिमम इंपोर्ट अमेरिका कर सके (कि अमेरिका अपने यहां रिफाइनरी नहीं चाहते रिफाइनरी से बहुत पॉल्यूशन होता है,,) तो 2025 में भारत में लगभग 25000 डॉलर का रिफाइंड ऑयल अमेरिका को बेचा है और मुझे लगता है कि इसके बाद भारत में और रिफाईनरीज की स्थापना के चांसेस बढ़ रहे हैं और शायद इसमें अदानी ग्रुप भी बड़े पैमाने पर शामिल हो सकता है।

