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जब विद्वता के साथ उत्तम चरित्र का समागम होता है तब सच्ची महानता प्रकट होती है - श्रीनारद मीडिया

जब विद्वता के साथ उत्तम चरित्र का समागम होता है तब सच्ची महानता प्रकट होती है

जब विद्वता के साथ उत्तम चरित्र का समागम होता है तब सच्ची महानता प्रकट होती है

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श्रीनारद मीडिया‚ जीरादेई‚ सीवान  (बिहार)

सीवान जिले के जीरादेई प्रखण्ड क्षेत्र के भरौली मठ में चल रहे श्री मरूतिनन्दन महायज्ञ के पांचवें दिन बुधवार को कथावाचक ,,,,,ने कहा कि विद्वता के साथ उत्तम चरित्र का समागम आवश्यक है ।
उन्होंने कहा कि
‘धनबल परिजन ज्ञान अपार।
सदाचार बिन सब बेकार।।
कथावाचक ने उक्त पंक्ति का उदाहरण देते बताया कि
वेदव्यासजी महाराज के प्रमुख शिष्य थे, जैमिनी। वेदव्यासजी महाभारत ग्रंथ की रचना कर रहे थे। वे लिखकर जैमिनी को देखने के लिए देते थे ताकि यदि कोई अशुद्धि रह जाए तो पुनः उसका शुद्धीकरण हो सके।
उन्होंने बताया कि
एक बार वेदव्यासजी ने लिखा- बलवान इंद्रियग्रामो विद्वान्समपि कर्षति।

अर्थात् इंद्रियाँ इतनी बलवान होती हैं कि वह विद्वानों को भी आकर्षित कर लेती हैं। उन्होंने लिखकर जैमिनी को देखने के लिए दिया। जैमिनी को ये बातें अच्छी नहीं लगी। उनके मन में हुआ कि जो विद्वान होते हैं इंद्रियाँ उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती है।
इसलिए
वे अपने गुरुदेव से बोले कि गुरुदेव! यहाँ कुछ अशुद्धि रह गई है। उन्होंने पढ़कर सुनाया। वेदव्यासजी ने पूछा- ‘तेरे विचार से यहाँ क्या होना चाहिए?’
तो
जैमिनी ने उत्तर दिया-‘ यहाँ होना चाहिए- “बलवान इंद्रियग्रामो विद्वान्स नापि कर्षति।” अर्थात् यद्यपि इंद्रियाँ बलवान हैं तथापि वे विद्वानों को आकर्षित नहीं कर सकती हैं। वेदव्यासजी ने सोचा कि अभी इसे समझाने से भी ये नहीं समझेगा। उन्होंने कहा- ‘अच्छा, इस विषय को अभी रहने दो, बाद में मैं देख लूँगा। अभी कुछ समय के लिए मैं जंगल भ्रमण करने जा रहा हूँ।’

वेदव्यासजी की ऐसी लीला हुई कि वे भ्रमण को निकले और आँधी, तूफान के साथ जोरों की बारिश होने लग गई। इसी बीच एक सुंदर युवती बारिश से बचने की असफल कोशिश करती हुई झोपड़ी के बाहर दीवार से सटकर खड़ी हो गई।

जैमिनी ने उसे देखा तो बोल पड़े—’बारिश बहुत तेज है।बाहर क्यों खड़ी हो, झोपड़ी के अंदर आ जाओ।’

युवती ने कहा ‘मैं यहीं ठीक हूँ।’

जैमिनी बोले भींगकर बीमार हो जाओगी, आ जाओ।’

युवती ने कहा ‘मुझे पराए मर्दों पर विश्वास नहीं है।’
तो
जैमिनी ने कहा मुझ पर शंका करती हो? शायद तुम्हें पता नहीं कि मैं कितना बड़ा विद्वान हूँ। वेदव्यासजी महाराज जब कुछ लिखते हैं तो मैं उसे शुद्ध करता हूँ। भय छोड़कर अंदर आ जाओ।’

युवती सकुचाती हुई उस छोटी-सी कुटिया के भीतर आ गई। वह बहुत सुन्दर थी। भींगे कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे। जैमिनी ने जब उसे करीब से देखा तो उसके मन में कुभाव जागृत हो गया। वे युवती के रूप- लावण्य पर मोहित हो गए। संत कबीर साहब ने बड़ा अच्छा कहा है–

काम क्रोध मद लोभ की, जब लगि घट में खान।
क्या मूरख क्या पंडिता, दोऊ एक समान।।

जैमिनी अपने को रोक नहीं सके और युवती से बोले— ‘मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।’

युवती ने कहा ‘विवाह की बात सोचना मेरे अभिभावक का काम है।’ इस पर

जैमिनी बोले ‘लेकिन तेरी स्वीकृति भी जरूरी है। देखो, मेरे जैसा विद्वान पति तुमको अन्यत्र नहीं मिलेगा।’

युवती ने कहा ‘मेरे कुल-खानदान में एक रिवाज है। आप यदि उसको पूरा करें तो मैं आप से विवाह कर सकती हूँ।’

जैमिनी ने कहा ‘ मुझे सब शर्त मंजूर है। बोलो क्या करना होगा?’
कथावाचक ने बताया कि तब युवती बोली
‘रिवाज के अनुसार जो कोई युवक घोड़ा बनकर मुझे अपनी पीठ पर बैठाएगा और उसी तरह चलकर पास के देवी माता मंदिर में दर्शन करवाएगा उसी से मेरा विवाह हो सकता है। क्या आपको यह मंजूर है?’
इस पर
जैमिनी ने सोचा कि संध्या का समय है, गुरुदेव भ्रमण में गए हैं, यहाँ तो कोई देखनेवाला है नहीं। थोड़े समय के लिए यदि घोड़ा ही बन जाता हूँ तो कौन जानेगा। मेरा विवाह तो इससे हो जाएगा। उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी। वे घोड़ा बन गए और लड़की दुपट्टे का लगाम बनाकर उनके पीठ पर बैठ गई।

जैमिनी हसीन सपने में खोए मंदिर की ओर बढ़े चले जा रहे थे। जब वे मंदिर के करीब पहुँच रहे थे तो उन्हें लगा कि वहाँ बरामदे पर कोई व्यक्ति बैठा हुआ है। उन्होंने सोचा कि अब कोई भी हो, मैं अपनी मुरादें अवश्य पूरी कर लूँगा। जैसे ही वे नजदीक पहुँचे यह देखकर घबड़ा गए कि मंदिर के बरामदे पर गुरुदेव वेदव्यासजी महाराज इस प्रकार बैठे हुए थे जैसे उन्हीं का इंतजार हो रहा हो। जैमिनी लज्जित होकर गुरुदेव के चरणों में गिर गए और माफी मांगने लगे।
कथावाचक ने बताया कि
वेदव्यासजी ने पूछा–‘बेटा! कहो ‘बलवान इंद्रियग्रामो विद्वान्समपि कर्षति’- यह ठीक है या ‘बलवान इंद्रियग्रामो विद्वान्स नापि कर्षति’—ठीक है? जैमिनी ने कहा- ‘क्षमा करें गुरुदेव! आपकी वाणी सदैव सत्य है।’
उन्होंने बताया कि
अक्सर ऐसा कहा जाता है कि ” शिक्षा ही शक्ति है ” लेकिन फिर रावण का विनाश हुआ था जबकि वह एक महान विद्वान था लेकिन इसी तरह की हालत रावण की भी थी। विद्वता और पाण्डित्य में तो वह बढ़ा हुआ था पर चरित्र से गिरा हुआ था। इसलिए कुछ समय के उत्कर्ष के बाद उसका पतन हो गया।
कथावाचक ने बताया कि
जब विद्वता के साथ उत्तम चरित्र का समागम होता है तब सच्ची महानता प्रकट होती है।
इस मौके पर परमगुरु रामनारायण दास जी महाराज ,आचार्य अरविंद मिश्र ,रामेश्वर राय ,हरिकांत सिंह, ई अंकित मिश्र ,जितेंद्र सिंह आदि उपस्थित थे ।

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