‘उतरी हुई नदी का पानी’ : जीवन-दृष्टि से ओतप्रोत गीत

‘उतरी हुई नदी का पानी’ : जीवन-दृष्टि से ओतप्रोत गीत

पुस्तक के रचनाकार सुनील कुमार तंग उर्फ तंग इनायतपुरी है

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✍🏻 डॉ० विनय कुमार सिंह

श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

प्रकाशन के क्षेत्र में प्रतिवर्ष हिंदी पद्य में सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, जिनमें कुछ ही अपनी विधा की प्रतिनिधि पुस्तकों में एक होती हैं। 2025 में प्रकाशित गीत विधा की एक ऐसी ही प्रतिनिधि पुस्तक है, ‘उतरी हुई नदी का पानी’, जिसके रचनाकार सुनील कुमार तंग हैं। भोजपुरी साहित्यांगन चैरिटेबल ट्रस्ट, पटना से प्रकाशित 190 पृष्ठों के इस हिंदी गीत-संग्रह का मूल्य 299 रुपये है।

पुस्तक के रचनाकार सुनील कुमार तंग (तंग इनायतपुरी) उर्दू-भोजपुरी हास्य-व्यंग्य के ऐसे लब्धप्रतिष्ठ कवि हैं, जिन्होंने देश-विदेश के अनेक कवि-सम्मेलनों एवं मुशायरों में काव्य-पाठ एवं मंच-संचालन किया है। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन्हें अनेक पुरस्कार/सम्मान मिले हैं। इनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं – ‘केहू मन पड़ल'(भोजपुरी काव्य-संग्रह, 2013), ‘कमाल है साहब'(उर्दू मजाहिया शाइरी, 2016), ‘बात के बतंगड़’ ( भोजपुरी व्यंग्य आलेख, 2018) और ‘सियासत में गजब बा नाम राउर'(भोजपुरी ग़ज़ल संग्रह, 2020)।

सुनील कुमार तंग जी का 2025 में प्रकाशित हिंदी गीत-संग्रह ‘उतरी हुई नदी का पानी’ हिंदी में भी उनकी श्रेष्ठ रचनाशीलता का उदाहरण है। वस्तुत: ‘नदी’ जीवन और प्रवाह का प्रतीक है और ‘पानी’ में जल के साथ ही प्रतिष्ठा, लाज एवं चमक का अर्थ अंतर्निहित है। उतरी हुई नदी तो वही है, जिसका पानी उफान में नहीं हो, जलस्तर घट गया हो और नदी शांत हो गई हो। ‘उतरी हुई नदी का पानी’ उस सकारात्मक संयम का प्रतीक है, जहाँ विध्वंसात्मक आवेग नहीं, बल्कि सर्जनात्मक विवेक ही प्रधान है!

इस गीत-संग्रह में 116 गीत संगृहीत हैं और संग्रह से सम्बद्ध सम्मति सुप्रसिद्ध कवि यश मालवीय और उदय प्रताप सिंह ने लिखी है। पुस्तक की भूमिका (सिवान की कविता और कविता का सिवान) विद्वान लेखक और कवि डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र ने लिखी है। भूमिका में डॉ० मिश्र ने सिवान की कविता ( सिवान-निवासी कवि की रचना) और कविता के सिवान (डरेर, सीमा-रेखा, boundary, limitation) का छंद और गीत-परंपरा की दृष्टि से रोचक विश्लेषण किया है। वे लिखते हैं –

“हिन्दी काव्यमंच को जादुई आकर्षण गीतकारों ने ही दिया, चाहे वे गोपाल सिंह नेपाली हों या बलवीर सिंह रंग या हरिवंश राय बच्चन या गोपाल दास नीरज । इनके अलावा जिन गीतकारों की कवि सम्मेलनों में तूती बोलती थी, उनमें दिवंगत कवियों में शम्भुनाथ सिंह, शिवमंगल सिंह सुमन, बीरेन्द्र मिश्र, रमानाथ अवस्थी, रामावतार त्यागी और नरेंद्र शर्मा के नाम अग्रगण्य हैं। सुनील तंग की पहचान यदि गीतकार के रूप में हुई होती, तो आज वे सोम ठाकुर, माहेश्वर तिवारी, सत्यनारायण आदि (इस ‘आदि’ में मैं भी हूँ) की पंक्ति में खड़े होते।

‘उतरी हुई नदी का पानी’ आधुनिक चेतना के गीतों का विलक्षण संग्रह है। इसके गीत यों ही नहीं लिख दिए गए हैं। इनके पीछे गहरा चिंतन है, जीवन का सूक्ष्म विवेचन है और आज के दौर पर कवि का एक सटीक वक्तव्य भी है। ये सारे गीत मिलकर एक कोलाज बनाते हैं, जिसमें आज के समाज का यथार्थ परिदृश्य दृष्टिगोचर होता है।” ( भूमिका, पृष्ठ -15/16)

अब बात पुस्तक में संगृहीत रचनाओं की..! पहली रचना में ही कवि भौतिक वस्तुओं के प्रति स्वामित्व (ownership) और लालच (greed) के बजाय अनासक्ति (detachment) की बात करता है, ठीक उसी तरह जैसे ईशोपनिषद् का ऋषि “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” (त्याग की भावना से उपभोग) की बात करता है –
तृष्णा के इस महा समर में अब क्या पाना खोना
सोना मिट्टी लगता है और मिट्टी लगती सोना

जैसे कोई जीत चुका हो
जीवन का संग्राम,
होठ पर आया तेरा नाम। (पृष्ठ-31)

मेरा-तेरा का चक्कर सीमाओं में संकुचित करता है।

कबीर ने कहा है, “रे यामैं क्या मेरा क्या तेरा?
लाज न मरहि कहत घर मेरा!
इसी भावभूमि पर एक गीत की पंक्तियाँ पढ़ें –
चाहे जितना धरती बाँटें
चिड़ियों का सारा अम्बर है।
नील गगन में उड़ते पंछी, गिनते रहते हैं ये बच्चे
ये मन के निश्छल ही ठहरे, वो भी मन के सच्चे-सच्चे
अन्तहीन दोनों की दुनिया
बस तेरा मेरा चक्कर है। (पृष्ठ-37)

इसे पढ़ते हुए पूर्व में पढ़े श्लोक का स्मरण हो आता है, “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥” (यह अपना है और यह अपना नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदारचित्त वालों के लिए पूरी धरती ही अपनी है।)

यथार्थ का स्वीकारबोध ही जीवन को संतुलित कर पुनः जीने की शक्ति देता है। कवि के शब्द हैं –

धूप तो है धूप
अब तो छाँव में भी जल रहा हूँ!

सांत्वना के शब्द पर जीना कभी सम्भव नहीं है,
सत्य जीवन का यही है सिर्फ ये अनुभव नहीं है।
(पृष्ठ -40)

‘रे मेघा, हेरत नयन पथराये’ गीत में प्रकृति-चित्रण पुनः पुनः पठनीय है –
दिन भर सूरज धरती पर जब आग उगलता जाये
लू ऐसी कि साँय-साँय सन्नाटा शोर मचाये
कोई तो बादल का टुकड़ा आसमान में छाये
रे मेघा, हेरत नयन पथराये ! (पृष्ठ-41)

कवि मोह-माया, प्रेम और साधना के परस्पर संबंध को दार्शनिक दृष्टि से देखता है। मन जब मंदिर हो जाए तो दृष्टि को देवत्व के दर्शन होंगे ही! साधना का दायित्व भी सफल और सार्थक होगा –
मोह-माया के बिना इस सृष्टि की परिकल्पना क्या
रूप से अनभिज्ञ हो उस दृष्टि की परिकल्पना क्या
मन को मैं मन्दिर करूँ तुम रूप को देवत्व दे दो
साधना को फिर नये अंदाज़ से दायित्व दे दो!
(पृष्ठ -43)

जब कहीं छोटे बच्चों के लिए स्थिति यह हो कि “ना इसके पेट में रोटी है ना इसके तन पर कपड़ा है” (इब्ने इंशा) तो “फटा सुथन्ना पहने” (रघुवीर सहाय) ‘हरचरना’ को कमाने बाहर जाना होगा और घर पर बूढ़ा बाप हथेली पर सुरती लिये शून्य में निहारता बैठेगा! अभावग्रस्त बस्ती का जीवंत चित्रण करती पंक्तियाँ हैं –

वृद्धों का है गाँव, जवानी कहाँ गयी
सपनों की रंगीन कहानी कहाँ गयी?

बूढ़ी आँखे सुरती लिये हथेली पर
ताक रही हैं निर्जन में खामोश नज़र
चहल-पहल दिन-रात सुहानी कहाँ गयी
सपनों की रंगीन कहानी कहाँ गयी?
(पृष्ठ -46)

कुछ मजदूरों के भाग्य में वह शुभ मुहूर्त ही नहीं है कि वे दो पल आराम कर सकें –
सूरज के संग निकल पड़े जब सुबह हुई
शाम हुई तो सूरज के संग डूब गए

मेहनतकश मजदूरों की कैसी दुनिया
शाम-सुबह और सुबह शाम जैसी दुनिया
देर रात को घर अपने वो खूब गये
शाम हुई तो सूरज के संग डूब गये!(पृष्ठ-48)

और विस्थापन का दर्द तो जैसे उनकी नियति ही बन गयी हो –
ये कबूतर क्या उड़े
सूनी हवेली कर गये
जैसे अपने गाँव के
मजदूर अमृतसर गये!(पृष्ठ-53)

अर्थशास्त्र ने समाजशास्त्र को कैसे प्रभावित किया है, इन पंक्तियों में देख सकते हैं –
रोटी की आस लिये
भूख और प्यास लिये
शहरों में आया है गाँव
सुनी है बरगद की छाँव!
रात की उदासी और दिन की मजदूरी
सपने और आँखों में कितनी है दूरी!(पृष्ठ-60)

शीर्षक गीत की लयात्मकता और अर्थपरकता का पाठकों पर एक अलग ही प्रभाव पड़ता है –
उतरी हुई नदी का पानी
ये बूढ़ी आँखें
उम्र सिमट आई हो जैसे
कैद किनारों में !

यादों में हैं बीते दिन के
पल-पल बुरे-भले
यश-अपयश की गठरी ले
सागर की ओर चले
सुख-दुख दोनों लुप्त हुए
निर्लिप्त नजारो में ! (पृष्ठ-58)

समय के प्रभाव-दुष्प्रभाव के बावजूद, गाँवों में अब भी अपनत्व की भावना है –
सब मुझे अपने मिले/जब गाँव आया लौट कर !/आदमी के जंगलों में/ मैं भटकता था वहाँ /अपने आँगन की चमेली /राह तकती थी यहाँ /भागती दुनिया से/ अपने ठाँव आया लौट कर!/ सब मुझे अपने मिले/ जब गाँव आया लौट कर!/ (पृष्ठ133)

और घर जाना जरूरी है, विशेषकर गाँव के घर! क्यों? इसलिए कि निदा फ़ाज़ली साहब कहते हैं –
तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं
देर न करना घर जाने में वरना घर खो जायेंगे

कवि वर्तमान संदर्भ में प्रजातंत्र का अवलोकन करता है तो पाता है कि आज का प्रजातंत्र लिंकन द्वारा परिभाषित “जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा” (Democracy is the government of the people, for the people and by the people.) नहीं है। कह सकते हैं, तनिक परिवर्तित है ( off/ far/buy) और कवि की दृष्टि में –
प्रजातंत्र में प्रजा कहाँ है कोई तो बतलाये
राजधर्म का अर्थ निरर्थक दिन-दिन होता जाये
वोट बैंक है नाम हमारा
कोई हो सरकार
खड़ा है लोकतंत्र लाचार!(पृष्ठ-163)

कवि जीवन की समस्याओं से हार नहीं मानता। उसे कवि-कर्म से जीवन-दृष्टि मिली है –
सुबह हुई तो घर से निकले
शाम हुई तो घर जाना है
सारा जीवन गीत है पगले,
गाते हुए गुज़र जाना है।(पृष्ठ-167)

कवि की एक रचना की अर्थव्याप्ति देखें, जो वर्तमान वैश्विक माहौल में संयुक्त राज्य अमेरिका, वेनुजुएला और ग्रीनलैंड के संदर्भ में भी प्रासंगिक है –
शांतिदूत बन गए शिकारी, निर्बल गए छले,
अपना उपवन छोड़ के पंछी जाने कहाँ चले।

इस उपवन में दावेदारी की है जंग छिड़ी,
सिर्फ शिकारी और शिकारी की है जंग छिड़ी
देख रहे हैं सभी तमाशे, बैठे बने भले ।
(पृष्ठ179)

और अंत में, कम शब्दों में कहें कि ‘उतरी हुई नदी का पानी’ गीत-संग्रह को क्यों पढ़ना चाहिए तो बकौल उदय प्रताप सिंह, “उनकी (सुनील कुमार तंग) शायरी का प्रशंसक तो मैं था ही, लेकिन इनके भीतर का गीतकार इनके मजाहिया शाइर से बड़ा और गंभीर है।” यश मालवीय के अनुसार, “इस संग्रह में प्यास केवल जल की नहीं, बल्कि जीवन, समय और सपनों की है। सामान्य पाठक की आँखों में जो उम्मीदें तैरती हैं, वे इन गीतों में आकार लेती हैं।”
मुझे एक पाठक के तौर पर लगता है कि यह पुस्तक दो कारणों से पढ़ी जानी चाहिए! गीतकार के गीतों के लिए और डॉ० बुद्धिनाथ मिश्र जी की भूमिका के लिए।

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