बिहार में प्रचंड जीत के क्या मायने हैं
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

बिहार में NDA की प्रचंड जीत के अपने मायने हैं। यहाँ NDA जीत जाएगी, यह तो सभी मान रहे थे, पर इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी। इस जीत के बाद यह कहा जा सकता है कि बिहार में भाजपा का किला मजबूत हुआ है।
भाजपा की इस जीत के कारणों की तलाश करें तो सबसे पहले आपको मानना ही होगा कि भाजपा चुनावों में सबसे अधिक मेहनत करने वाली पार्टी है। उन्होंने एक एक सीट को लेकर अपनी योजना बनाई और उसे जीतने के लिए अपना सबकुछ झोंक दिया। यदि किसी सीट पर कोई एक जाति का वोट कटता हुआ दिखा तो अगले दिन वहाँ उसी जाति के किसी बड़े नेता का रोड शो कराया गया है। दूसरे राज्यों के भाजपाई मुख्यमंत्री और सारे केंद्रीय मंत्री जिस तरह से इस चुनाव में लगाए गए थे, उसने इस जीत की राह आसान की है।
बिहार के चुनावों में जाति सबसे बड़ा फैक्टर होती है, और इस बार भी यह फैक्टर बना रहा है। गैर यादव ओबीसी और सवर्ण भाजपा गठबंधन के पारंपरिक वोटर हैं और उन्होंने खुल कर वोट किया है। बिहार में अबतक सवर्णों का वोट कम पड़ता था, आधी महिलाएं भी बूथ तक नहीं जाती थीं। पर इस बार यह ट्रेंड बदला है। सवर्णों ने भी अपना एक एक वोट गिराया है।
यहाँ आप इस बात को भी नकार नहीं सकते कि चुनाव पूर्व लागू की गईं योजनाएं जैसे ग्यारह सौ रुपये की पेंशन, हर महिला के खाते में दस हजार रुपये और राशन आदि का भी बड़ा प्रभाव पड़ा है। इसके साथ एक महत्वपूर्ण फैक्टर यह भी रहा कि अमित शाह भाजपा के लगभग सभी बागियों को मना लेने में सफल रहे हैं। किसी भी सीट पर कोई भी बागी उम्मीदवार भाजपा को परेशान नहीं कर पाया है।
मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश की छवि निर्विवाद है। इसमें कोई संदेह नहीं कि विपक्ष का कोई चेहरा उनके आगे टिक नहीं पाता। उनके विरोधी भी उनके ऊपर कोई बड़ा आरोप नहीं लगा पाते। बच्चों की साइकिल, छात्रवृति, पोशाक राशि, हर घर को राशन, नल-जल, आदि योजनाओं के कारण गरीब तबका लगातार उनके साथ बना हुआ है। उनकी अपनी इस छवि ने भी उनकी सरकार को लौटाने में भूमिका निभाई है।
दूसरी ओर तेजस्वी यादव की पार्टी के माथे पर जंगल राज का दाग है जो धुलता नहीं दिख रहा। उनकी पार्टी कार्यकर्ताओं का व्यवहार भी इस जंगलराज के भय को मजबूत करता दिखा है। चुनाव के पूर्व उनकी प्रवक्ताओं ने टीवी चैनलों पर जो तेवर दिखाए वह भी उनके विरुद्ध गया है। सोशल मीडिया में भी राजद समर्थकों के जो बड़े हैंडल हैं, वहाँ से जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया गया वह उनके खिलाफ माहौल बनाने में काम आया है। सत्ता पक्ष के इस नैरेटिव कि ‘राजद की सरकार आई तो जंगलराज आ जायेगा’ को राजद ने ही मजबूत कर दिया जिसका नुकसान हुआ है।
राजद की पराजय के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि महागठबंधन अंत अंत तक सीट बंटवारे की लड़ाई में उलझा रहा। उनके अधिकांश प्रत्याशियों का टिकट नॉमिनेशन के अंतिम दिन फाइनल हुआ है। इस बार कांग्रेस और मुकेश सहनी को मनाने में ही तेजस्वी का पसीना छूटता रहा है। उसके अनेक प्रत्याशी हर गाँव का दौरा तक नहीं कर सके हैं। बिहार में कांग्रेस या मुकेश सहनी का अपना कोई वोटबैंक नहीं है।
कुछ विशेष स्थानों को छोड़ दें तो कम्युनिस्ट पार्टियों का भी जनाधार नहीं है। जो जनाधार है वह राजद का ही है। ऐसे में यह कहा जाय कि सहयोगी दलों से राजद को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ तो गलत न होगा।
राजद की ओर से एक गलती यह भी हुई कि उनका पूरा चुनाव कैम्पेन नकारात्मक रहा। चौकीदार चोर है, वोट चोर गद्दी छोड़ जैसे नारों ने उनका नुकसान ही किया है। ऐसे नारे तब सफल होते हैं जब सचमुच बहुसंख्यक जनता सरकार के विरुद्ध हो। सरकार का अपना वोटबैंक जो बीस साल की सरकार के बाद उदासीन होता या उससे दूर जाता, वह इन नकारात्मक नारों के कारण भी वापस लौट गया है।
यही कारण है कि अधिकांश सीटों पर सीधी लड़ाई हुई है। कुल मिला कर बात यह है कि महागठबंधन की कुछ कमजोरियां और भाजपा के अथक परिश्रम ने इस जीत की नींव रखी है।
आभार- सर्वेश तिवारी श्रीमुख, गोपालगंज, बिहार

