अजित पवार के बाद सुनेत्रा को पार्टी का नेता क्यों बनाया गया?
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का प्लेन क्रैश में निधन होने के बाद राज्य की सियासत भी बदल गई है। अब उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम बनी.
पवार परिवार में आई इतनी बड़ी त्रासदी के बीच अजित पवार के राजनीतिक उत्तराधिकारी चुनने के लिए दिखाई गई इतनी जल्दबाजी कई लोगों को हैरान कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषक इसके पीछे की मुख्य वजह शरद पवार की एनसीपी और अजित पवार की एनसीपी के होने वाले विलय को मानते हैं। इसे जल्द ही लागू करना है। अजित पवार के खेमे के नेताओं को डर था कि अगर विलय होता है तो शरद पवार का गुट पार्टी पर हावी हो जाएगा और इससे उनका प्रभाव कम हो जाएगा।
महाराष्ट्र में हुए बड़े राजनीतिक बदलाव
हादसे के तीसरे दिन महाराष्ट्र में बड़े राजनीतिक बदलाव शुरू हो गए। अजित पवार की एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल और सुनील तटकरे जैसे सीनियर नेता मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिले और उन्हें सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री बनाने के अपने फैसले के बारे में बताया।
उसी शाम सीनियर नेताओं की एक मीटिंग हुई, जिसमें सुनेत्रा पवार ऑनलाइन माध्यम से शामिल हुईं। यह तय किया गया कि उन्हें वे सभी तीन जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी जो उनके पति अजित पवार के पास थीं। इनमें डिप्टी सीएम पद, एनसीपी अध्यक्ष पद और एनसीपी विधायक दल के नेता का पद शामिल है।
अब क्या होगा?
सुनेत्रा पवार उन सभी मंत्रालयों की भी इंचार्ज होंगी जो अजित पवार के पास महायुति सरकार में थे। सिवाय वित्त मंत्रालय के, जो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अपने पास रखेंगे। इस मंत्रालय के बदले एनसीपी को कोई दूसरा मंत्रालय दिया जाएगा।
पार्टी नेता छगन भुजबल ने पत्रकारों को बताया कि यह पार्टी की सर्वसम्मत इच्छा थी कि सुनेत्रा पवार ये जिम्मेदारियां संभालें, इसीलिए उनका नाम प्रस्तावित किया गया।
शरद पवार का बहिष्कार
दिलचस्प बात यह है कि सुनेत्रा को ये जिम्मेदारियां सौंपने का फैसला करते समय शरद पवार से सलाह नहीं ली गई। शनिवार सुबह बारामती में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने नाराजगी भरे लहजे में कहा कि यह फैसला प्रफुल्ल पटेल (कार्यकारी अध्यक्ष) और सुनील तटकरे (प्रदेश अध्यक्ष) ने लिया था और सुनेत्रा पवार को दिए गए पदों के बारे में उन्हें पहले से कोई जानकारी नहीं थी।
इस प्रक्रिया से शरद पवार को बाहर रखने से एनसीपी नेताओं की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। माना जा रहा है कि इसकी वजह 17 जनवरी को शरद पवार और अजित पवार के बीच हुआ विलय का समझौता था, जिसकी घोषणा 12 फरवरी को होने वाली थी।
सीनियर नेताओं को डर है कि अगर पार्टी फिर से एक हो जाती है तो जुलाई 2023 के विद्रोह के बाद शरद पवार के प्रति वफादार रहे नेताओं का दबदबा बढ़ जाएगा, जिससे अजित पवार के साथ जाने वाले नेताओं का महत्व कम हो जाएगा।
सत्ता खोने का डर
अजित पवार की एनसीपी के नेताओं के फिर से एक होने को लेकर सावधान रहने का एक और कारण है। शरद पवार ने हाल ही में कहा था कि वह किसी भी हालत में भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे।
इससे यह डर पैदा हो गया कि एक साथ आने के बाद एनसीपी केंद्र में एनडीए और राज्य में महायुति गठबंधन से बाहर हो सकती है, जिससे इन नेताओं को सत्ता गंवानी पड़ सकती है।
कानूनी पचड़े
इसके अलावा, महायुति में शामिल होने से पहले इनमें से कई नेता सीबीआई, ईडी और एंटी-करप्शन ब्यूरो जैसी एजेंसियों द्वारा जांच किए जा रहे आपराधिक मामलों में फंसे हुए थे। गठबंधन में शामिल होने से उन्हें न सिर्फ सत्ता मिली, बल्कि इन कानूनी कार्रवाइयों से भी राहत मिली। अब इन नेताओं को डर है कि अगर एकजुट एनसीपी महायुति से बाहर निकल जाती है तो उनकी कानूनी मुश्किलें फिर से सामने आ सकती हैं।
दूसरी ओर सुनेत्रा पवार राजनीति में नई हैं। उन्होंने राजनीति में एंट्री 2024 में की जब उन्होंने बारामती से शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वह हार गईं। इसलिए इन नेताओं का मानना है कि सुनेत्रा के नेतृत्व में पार्टी के फैसलों को प्रभावित करना और अपना दबदबा बनाए रखना आसान होगा।
हालांकि, महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष बनाना सिर्फ एक अस्थायी इंतजाम है। माना जा रहा है कि दोनों एनसीपी गुटों का विलय कभी न कभी जरूर होगा, जिसके बाद सुनेत्रा पवार की भूमिका में बड़ा बदलाव आ सकता है।

