विश्व हिंदी दिवस और वेनेजुएला संकट
हिंदी पारंपरिक ज्ञान की वाहक होने के साथ-साथ तकनीकी नवाचारों में भी सक्षम है
विश्व अभिभावक की भूमिका संदिग्ध
संयुक्त राष्ट्र संघ हुआ उभयलिंगी
✍🏻 राजेश पाण्डेय
श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

भारत पूरे विश्व में प्रत्येक वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मानता है। इस वर्ष विश्व हिंदी दिवस की थीम ‘हिंदी पारंपरिक ज्ञान से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक है’ इसका उद्देश्य है कि हिंदी पारंपरिक रूप से एक भाषा होने के साथ तकनीक की दुनिया में भी आगे है, इस भाषा का कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में उपयोग किया जा सकता है।
विश्व हिंदी दिवस की शुरुआत 1975 में नागपुर से हुई थी लेकिन 10 जनवरी 2006 से इसे प्रत्येक वर्ष पूरे विश्व में मनाएं जाने लगा अर्थात भारत के बाहर जितने भी दूतावास एवं सांस्कृतिक संगठन अवस्थित हैं वहां इस दिवस को मनाया जाता है। क्योंकि हिंदी समन्वय करना सिखाती है। यह अपने संस्कृति से संबद्ध होने का संदेश देती है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद कहा करते थे कि “राष्ट्रीयता का भाषा एवं साहित्य के साथ बहुत गहरा संबंध है जो हमें हिंदी देती है।” हिंदी भाषा ही नहीं अपने भाव के अभिव्यक्ति है।
हिंदी के बारे में भाषाविद सुनीति कुमार चाटुजर्या का कहना था कि “हिंदी भाषा को संपूर्ण मानवता के लिए बहुत बड़ी उत्तरदायित्व संभालना है।”
हिंदी को सुदृढता अपनी अठारह बोलियां से मिलेगा, उसे विश्व के साहित्य से अनावश्यक बोझिल होने की आवश्यकता नहीं है। इसमें आत्म दीपों भव: की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है।
वहीं इस समय विश्व वेनेजुएला संकट से जूझ रहा है। इसमें सबसे बड़ा प्रश्न यह उभर कर आता है कि इस विश्व व्यवस्था का अभिभावक कौन है ?क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ उभयलिंगी हो गया है। वहीं वेनेजुएला एक अपवाद नहीं वरन् एक पूर्वाभ्यास है। सनद रहे कि लीग ऑफ नेशन के होते हुए द्वितीय विश्व युद्ध हुआ, जिसमें हिटलर द्वारा साठ लाख यहूदियों को मार डाला गया, पर्ल हार्बर एवं अमेरिका का जापान पर परमाणु बम गिराया जाना था। अमेरिका ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली कहावत चरितार्थ करता रहा है।
बहरहाल वर्तमान दौर में कानून बौना साबित हुआ है। अंतरराष्ट्रीय संगठन एवं न्याय औपचारिकता की कोठरी में कैद है। गग्रेरियन कैलेंडर की शुरुआत अमेरिका ने वेनेजुएला पर 3 जनवरी को आक्रमण करते हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिका ले गए। यही नहीं अब तक अमेरिका दक्षिण अमेरिका में 41 बार शासन अध्यक्ष को अपदस्त करने की भूमिका निभाई है। इस तरह की कार्रवाई 1989 में पनामा देश पर भी हस्तक्षेप करके उसने किया था।

शक्ति की राजनीति, संसाधनों पर कब्जा, वैश्विक वैचारिक संघर्ष एवं अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र के अंतर विरोधों का यह मिला-जुला रूप है। लोकतंत्र के हिमायती एवं मानविधिकार की अपील गुम हो गई है। वैचारिक संघर्ष में हम नवउदारवादी विचार में वैश्विक तंत्र से पृथक मार्ग देखते हैं। अमेरिका इस कार्रवाई से इतिहास तो बना सकता है, भविष्य कतई नहीं।
विश्व बिरादरी को संयम से काम लेना होगा वरना मानवता खतरे में पड़ जाएगी। इस मौके पर हमारी हिंदी यही सीख देती है कि हमें अपनी सभ्यता,संस्कृति,संस्कार एवं परंपरा के अनुसार मानवता के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए।
अमेरिका अपने कुकृत्य से रोमन, ऑटोमन साम्राज्य नहीं हो जाएंगे। जिन्होंने दशकों तक राज किया। धन वैभव व संपत्ति आएगा जाएगा, परन्तु अपना संस्कार समाप्त नहीं होना चाहिए। लेकिन अमेरिका का संस्कार यही है। क्योंकि जिसका कोई इतिहास, भूगोल, साहित्य एवं भाषा नहीं है उसका क्या कहना है! अमेरिका का शासन ट्रंप नहीं चलाते, वरन पूंजीपति चलाते हैं जिनकी कुछ वर्षों में जेब ढीली हो गई है। रेस, रिलिजन, जेंडर एवं विचारधारा के ऊपर वहां विमर्श होता है उसे विश्व बिरादरी से कोई मतलब नहीं है। दुनिया चकाचौंध में अमेरिका को तरजीह दे रही है।
हिंदी का साहित्य भाव का संवाहक है भाषा कभी विवाद नहीं होती वह संवाद का कारक होती है विश्व के विवादों का हल करना है तो संवाद का सेतु स्थापित करना होगा। सहज,सरल व मृदु हिंदी हमारे मन की भाषा है जबकि ट्रंप जो वेनेजुएला में कर रहे हैं वह धन की भाषा है। अगर हमारा मन स्वतंत्र है तो हम सारे समस्याओं का हल कर सकते हैं।
हिंदी भाषा में निविष्ट ऐसी उपयोगी विषय हैं जो विश्व से असमानता, गरीबी एवं युद्ध को समाप्त कर सकती है। हिंदी भाषा में स्थापित साहित्य विश्व को अवदान है। बानगी के तौर पर प्रेमचंद की ‘गोदान’, जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ और अज्ञेय की ‘शेखर एक जीवनी’ जैसी कृति में हम इसका प्रतिरुप देख सकते हैं।
विश्व में फ्रांस देश ने समाज का दर्शन दिया तो जर्मनी ने धर्म की तुलनात्मक अध्ययन के क्रम में दर्शन का प्रतिपादन किया वहीं इटली ने धर्म दिया जबकि रूस ने आंदोलन के संदर्भ में क्रांति को जन्म दिया और सबसे बढ़कर ब्रिटेन ने वाणिज्यवाद, उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता एवं विखंडनवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन किया तो अमेरिका ने बाजार दिया, बाजार ने पूंजी को जन्म दिया, पूंजी ने शोषण के कई आयामों को जन्म दिया जिसका एक रूप हम वेनेजुएला संकट के रूप में देख सकते हैं।
जबकि भारतीय संस्कृति ने पूरे विश्व को अध्यात्म दिया। सत्यमेव जयते, सत्य ही ईश्वर हैं, पंच तत्व के रूप में क्षितिज, जल, पवन, गगन, समीरा अर्थात पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश और मनुष्य के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जैसे विचारों को प्रतिपादित करने का संकल्प दोहराया।
अंततः विश्व हिंदी दिवस पर भारत की संस्कृति यह संवाद प्रेषित करती है कि वसुधैव कुटुंबकम, सर्वे भवन्तु सुखिन:, जिओ और जीने दो से हमसभी का कल्याण सुनिश्चित हैं। हम और हमारी भाषा, हिंदी का साहित्य साकारात्मक है।

