विश्व जलपक्षी दिवस केवल पक्षियों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व का प्रतीक है

विश्व जलपक्षी दिवस केवल पक्षियों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व का प्रतीक है

विश्व जलपक्षी दिवस  पर विशेष

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श्रीनारद मीडिया सेंट्रल डेस्क

विश्व जल पक्षी दिवस हर वर्ष 17 जनवरी को मनाया जाता है, जो जलपक्षी; जैसे बत्तख, हंस, कलहंस और उनके आवासों के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाता है। वैसे तो विश्व प्रवासी पक्षी दिवस का एक अलग दिन है, जो साल में दो बार (मई और अक्टूबर के दूसरे शनिवार को) मनाया जाता है और प्रवासी पक्षियों के संरक्षण पर केंद्रित है, जिसके लिए जागरूकता बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र का समर्थन प्राप्त है।
विश्व जलपक्षी दिवस 17 जनवरी को मनाया जाता है, क्योंकि यह जल के पक्षियों और उनके निवास स्थानों के बारे में जागरूकता और समझ बढ़ाने के लिए मनाया जाता है, इसलिये इसे जल पक्षी दिवस के रूप में मनाते हैं।

जहाँ विश्व प्रवासी पक्षी दिवस 2024 से मई और अक्टूबर के दूसरे शनिवार को (साल में दो बार) प्रवासी पक्षियों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाने लिये एक अभियान के तहत मनाया जाता है, वहीं जल पक्षी दिवस की शुरुआत: 2006 में ही हो गई थी।
इन दोनों में मुख्य अंतर: यह है कि जलपक्षी दिवस विशिष्ट जलपक्षी प्रजातियों (जैसे हंस, बत्तख) पर केंद्रित है। जब कि प्रवासी पक्षी दिवस सभी प्रवासी पक्षियों (न केवल जलपक्षी) और उनके प्रवास मार्गों पर ध्यान केंद्रित करता है।

संक्षेप में, यदि आप बत्तखों और हंसों जैसे पक्षियों के बारे में बात कर रहे हैं, तो वह 17 जनवरी है; यदि आप दूर-दूर तक प्रवास करने वाले पक्षियों की बात कर रहे हैं, तो वह मई और अक्टूबर में होता है।

हर वर्ष 17 जनवरी को विश्व जलपक्षी दिवस मनाया जाता है. यह प्रकृति संरक्षण की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण दिवस है. विश्व जलपक्षी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि जलाशयों और आर्द्रभूमियों में रहने वाले पक्षी केवल जैव विविधता का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि पारिस्थितिकी संतुलन और मानव जीवन के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं.

जलपक्षी उन पक्षियों को कहा जाता है जिनका जीवन मुख्य रूप से जल निकायों जैसे झीलों, नदियों, तालाबों और आर्द्रभूमि पर निर्भर करता है. इन पक्षियों में बतख, हंस, बगुले, सारस, राजहंस और अन्य जलपक्षी शामिल हैं।

जलपक्षी केवल जलाशयों की शोभा नहीं बढ़ाते, बल्कि वे पर्यावरण के स्वास्थ्य के संकेतक भी होते हैं. ये पक्षी जलीय कीड़ों की आबादी को नियंत्रित रखते हैं और अपनी यात्रा के दौरान पौधों के बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाकर जैव विविधता को बढ़ावा देते हैं. जलपक्षी खाद्य श्रृंखला का एक अनिवार्य हिस्सा हैं. वे शिकार और शिकारी दोनों के रूप में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं.उनके अपशिष्ट जलाशयों में महत्वपूर्ण पोषक तत्व प्रदान करते हैं, जो जलीय पौधों और मछलियों के विकास में सहायक होते हैं.

विश्व स्तर पर आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए रामसर संधि (वर्ष 1971) एक महत्वपूर्ण पहल रही है. इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए विभिन्न देशों में जलपक्षियों के संरक्षण हेतु जागरूकता दिवस मनाया जाने लगा. भारत में भी जलपक्षियों का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है जैसे- हंस को ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है.

जलपक्षी दिवस का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी पक्षियों को समर्पित है. हर वर्ष लाखों पक्षी साइबेरिया, यूरोप और मध्य एशिया के ठंडे इलाकों से उड़कर भारत और अन्य गर्म देशों की आर्द्रभूमि में आते हैं. भारत इस फ्लाईवे का एक प्रमुख हिस्सा है. प्रवासी पक्षियों का आना यह दर्शाता है कि हमारे जल स्रोत अभी भी जीवन को सहारा देने में सक्षम हैं.

वर्तमान समय में जलपक्षियों के अस्तित्व पर गहरा संकट मंडरा रहा है. इसके कई कारण है जैसे –  शहरीकरण और खेती के विस्तार के कारण झीलों और दलदली इलाकों को भरा जा रहा है, जिससे पक्षियों के प्राकृतिक आवास छिन रहे हैं. औद्योगिक कचरा, प्लास्टिक और कृषि रसायनों के कारण जल स्रोत जहरीले हो रहे हैं. तापमान में बदलाव और अनिश्चित मानूसन के कारण पक्षियों के प्रवास चक्र और प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ रहा है. कई क्षेत्रों में आज भी इन पक्षियों का मांस या मनोरंजन के लिए शिकार किया जाता है.

विश्व जलपक्षी दिवस हमें याद दिलाता है कि यदि हमने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो ये प्रजातियाँ केवल किताबों तक सीमित रह जाएंगी. जब तक स्थानीय लोग जलपक्षियों के महत्व को नहीं समझेंगे, तब तक संरक्षण अधूरा है. ‘बर्ड वॉचिंग’ जैसे पर्यटन को बढ़ावा देकर आय के साधन और जागरूकता दोनों पैदा किए जा सकते हैं. साथ ही जलाशयों में कचरा फेंकना बंद करना और आर्द्रभूमि के पास रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करना आवश्यक है.

विश्व जलपक्षी दिवस केवल पक्षियों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व का प्रतीक है. उनकी रक्षा करना केवल प्रकृति प्रेम नहीं, बल्कि भविष्य में मानव अस्तित्व को बचाने के लिए एक आवश्यक निवेश है.

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